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वाणी व्यक्तित्व का दर्पण है–मुनि मोहजीत कुमार

कटक,जैन परंपरा के महान आध्यात्मिक पर्व पर्युषण महापर्व के अंतर्गत चल रही आराधना एवं साधना की श्रृंखला में चतुर्थ दिन तेरापंथ भवन,कटक में वाणी संयम दिवस के रूप में मनाया गया।
इस अवसर पर मुनि मोहजीत कुमार ने कहा कि भाषा का प्रयोग मानव-मानव में संबन्ध स्थापित करता है। बोलना एक कला है परन्तु मौन एक तप है। बोलने से न बोलने का मूल्य अधिक है। वाणी का संयम दीनता नहीं, साधना है। वाणी व्यक्तित्व का दर्पण है। इसे साफ और पवित्र रखें।
कौन व्यक्ति कैसा है इसकी पहचान उसका व्यवहार है।गाली देने वाला गाली नहीं वह अपना परिचय देता है। मधुर वाणी, सुसंस्कृतवाणी का श्रृंगार सारे संसार को अपनी ओर खींच लेता है।
मुनि जयेश कुमार ने घटना-प्रसंग के माध्यम से अयाचित एवं असंयमित वाणी के दुष्प्रभावों को समझाया। उन्होंने कहा कि अभिमानी व्यक्ति दूसरों को सुनना नहीं चाहता, वह केवल स्वयं बोलना चाहता है। उन्होंने प्रसंग के माध्यम से बताया कि एक गोष्ठी में पांच व्यक्ति एकत्रित हुए। सभी की इच्छा थी कि वे कुछ ऐसा बोलें जिससे दूसरे उनसे प्रभावित हों। परिणाम यह हुआ कि कोई भी दूसरे की बात को ध्यानपूर्वक सुनने के लिए तैयार नहीं था।
उन्होंने कहा कि आज के समय में यह प्रवृत्ति हमारे व्यक्तिगत जीवन से लेकर सामाजिक जीवन तक दिखाई देती है। हम अक्सर दूसरे की बात पूरी होने से पहले ही अपना उत्तर तैयार करने लगते हैं। जबकि जब तक हम दूसरों के विचारों, भावनाओं और दृष्टिकोण को समझने का प्रयास नहीं करते, तब तक हमारा ज्ञान अधूरा रहता है। इसके लिए सुनने की कला विकसित करना आवश्यक है और सही ढंग से सुनने के लिए वाणी पर संयम होना जरूरी है।
मुनि जयेश कुमार ने कहा कि हमें बोलने से पहले विचार करना चाहिए और “बोलें तो तोलकर बोलें।” हमारी एक छोटी-सी बात किसी के मन को प्रसन्न कर सकती है और वही बात असावधानी से कही जाए तो किसी के मन को आहत भी कर सकती है। उन्होंने कहा कि विद्वान व्यक्ति सोच-समझकर बोलता है, जबकि मूर्ख व्यक्ति जो कुछ सोचता है, उसे बिना विचार किए बोल देता है। इसलिए आवश्यक है कि हमारे भीतर वाणी-संयम के साथ-साथ भाषा का विवेक और शब्दों की मर्यादा भी जागृत हो।
तीर्थंकर दर्शन की कड़ी में मुनि जयेश कुमार ने जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ के जीवनवृत्त का संक्षिप्त वर्णन किया।
इस अवसर पर मुनि भव्य कुमार ने आगम सूत्रों के संदर्भ में वर्तमान सामाजिक एवं व्यावहारिक परिस्थितियों पर सारगर्भित विचार व्यक्त किए।
पर्युषण की इस आध्यात्मिक साधना के क्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं को तप, संयम और आत्मशुद्धि की प्रेरणा दी गई। इस अवसर पर मुनिश्री ने अनेक तपस्वियों को तप का प्रत्याख्यान करवाया। तपस्वियों ने श्रद्धा एवं उत्साह के साथ तप-साधना के संकल्प को स्वीकार किया।

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