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कहा- व्रत की चेतना का जागरण स्वयं से जुडने की एक दिव्य प्रेरणा
कटक। व्रत की चेतना का जागरण स्वयं से जुडने की एक दिव्य प्रेरणा है। व्रत मन की तृप्ति का सर्वोत्तम उपाय है। व्रत व्यक्ति की जीवन शैली में संयम और अध्यात्म के प्रति आस्था का निर्माण करता है।
जो व्रती श्रावक होता है। उसका हृदय पवित्र, कामना से मुक्त तथा भव भ्रमण को परित कर देता है। व्रतों की आराधना से मनुष्य का मनोबल और आत्म बल का विकास होता है। व्रतों के स्वीकरण की भावना से मनुष्य अपनी परिस्थितियो को, वातावरण को बदल देता है। वह बाहरी समस्याओं का समाधान आन्तरिक जगत की शक्ति से खोज लेता है।
ये स्वर मुनि मोहजीत कुमार जी ने पर्युषण महापर्वाराधना के पांचवें दिन व्रत चेतना दिवस पर प्रकट किए। इस दिवस की पृष्ठभूमि को प्रांजल भावों प्रकट करते हुए मुनि जयेश कुमार जी ने कहा कि व्रत का अर्थ है संयम। आज का मानव त्याग को नही भोग को महत्व देता है। आवश्यकता है दो समय रोटी की, कुछेक वस्त्रों की, किंतु करोड़ों के संग्रह के लिए दिन-रात एक करता है। किस लिए? क्या नाम के लिए? नाम किसका कहां तक चला है? चला भी है तो त्यागियों का।
उन्होंने सवाल किया कि भोगी का नाम इतिहास की किस पुस्तक में दर्ज होता है? आज नाम चल रहा है राम का, कृष्ण का, महावीर का, बुद्ध का, आचार्य भिक्षु का, नानक का और इस युग में गांधी का। युगों-युगों से लोग इन्हें आदर के साथ स्मरण करते आ रहे हैं। भोग कभी अमर नहीं बनता। अमर कोई चीज होती है तो वह त्याग और तप है।
तीर्थंकर दर्शन के अंतर्गत मुनि जयेश कुमार जी ने 19वें प्रभु मल्लिनाथ की जीवन कथा का संक्षिप्त वर्णन किया। मुनि भव्य कुमार जी ने आगम सूक्तों की व्याख्या करते हुए जनजीवन को व्रत की संस्कृति को आत्मसात् करने की प्रेरणा प्रदान की।
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