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भाषा हमारी विरासत, परंपरा और पहचान की जीवंत प्रतिछवि : विश्व ओड़िया परिवार
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मातृभाषा के संरक्षण के लिए घर-घर ओड़िया के प्रयोग और नई पीढ़ी को जोड़ने का आह्वान
भुवनेश्वर। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी विरासत, परंपरा, संस्कृति और पहचान की जीवंत प्रतिछवि है। मातृभाषा और संस्कृति के प्रति बढ़ती उपेक्षा भाषायी अस्मिता के लिए गंभीर चिंता का विषय है। घरों में ओड़िया भाषा के घटते प्रयोग और सार्वजनिक जीवन में विदेशी भाषा के बढ़ते प्रभाव के बीच मातृभाषा के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सामूहिक पहल की आवश्यकता है।
यह चिंता रविवार को भुवनेश्वर स्थित गीत गोविंद सदन में विश्व ओड़िया परिवार की ओर से आयोजित ‘मां और मातृभाषा’ विषयक परिचर्चा में व्यक्त की गई। परिचर्चा में साहित्यकारों, भाषाविदों, शिक्षाविदों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने मातृभाषा को दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने तथा आने वाली पीढ़ी में ओड़िया के प्रति गर्व और सम्मान की भावना विकसित करने का आह्वान किया।
विश्व ओड़िया परिवार के अध्यक्ष सज्जन शर्मा की अध्यक्षता में आयोजित परिचर्चा में वक्ताओं ने मातृ भाषा के संरक्षण और संवर्धन का संकल्प लिया। वक्ताओं ने कहा कि कोई भाषा तभी जीवित रहती है, जब वह केवल पुस्तकों तक सीमित न रहकर घरों, दैनिक बातचीत, रचनात्मक अभिव्यक्ति और आने वाली पीढ़ियों के जीवन का हिस्सा बनी रहे।
अपनी भाषा बोलने में गर्व महसूस करना
उन्होंने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात अपनी भाषा बोलने में गर्व महसूस करना है। मातृ भाषा को केवल अतीत की विरासत के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य में ज्ञान और रोजगार का माध्यम बनाने की दिशा में भी प्रयास किया जाना चाहिए। भाषा का संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, शिक्षक, विद्यार्थी, साहित्यकार, कलाकार, मीडिया और समाज के प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपने-अपने स्तर पर भाषा का निरंतर उपयोग किए जाने से ही वह जीवंत और समृद्ध रह सकती है।
मातृभाषा के घटते प्रयोग पर चिंता
परिचर्चा में वक्ताओं ने कहा कि मातृभाषा जाने-अनजाने विकृति और पतन की ओर बढ़ रही है। घरों में ओड़िया के प्रयोग में कमी आ रही है, जबकि निमंत्रण, विज्ञापन और अन्य सूचनाओं में विदेशी भाषा का वर्चस्व लगातार बढ़ रहा है।
वक्ताओं ने कहा कि जिस स्थिति की कल्पना पराधीनता के दौर में भी नहीं की जा सकती थी, वह आज देखने को मिल रही है। शहरी जीवन के प्रभाव से भाषा, संस्कृति और परंपरा पर प्रतिकूल असर पड़ा है। ऐसे समय में पूर्वजों के संघर्ष और बलिदान को याद करते हुए मातृभाषा के संरक्षण के लिए व्यक्तिगत स्तर पर पहल करने की आवश्यकता है।
इस अवसर पर गह्मा पूर्णिमा के दिन रक्षा सूत्र बांधने का संकल्प लेने का निर्णय किया गया। इसके साथ ही ओड़िया में हस्ताक्षर करने, निमंत्रण और विज्ञापनों सहित अधिक से अधिक सूचनाएं ओड़िया भाषा में उपलब्ध कराने तथा भाषा और संस्कृति के संरक्षण को पवित्र कर्तव्य मानकर कार्य करने का आह्वान किया गया।
विश्व ओड़िया परिवार के अध्यक्ष सज्जन शर्मा ने लोगों से इन संकल्पों को अपने दैनिक जीवन में अपनाने की अपील की।
मातृभाषा में शिक्षा से बेहतर होता है बौद्धिक विकास
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य मातृभाषा का संरक्षण, प्रसार और नई पीढ़ी के बीच इसके प्रति आकर्षण एवं सम्मान को बढ़ाना था। कार्यक्रम में राज्य के अनेक प्रमुख साहित्यकार, भाषाविद, बुद्धिजीवी और शिक्षाविद शामिल हुए। मुख्य वक्ता एवं बहुभाषी कवि संजय रथ ने कहा कि जीवन में जन्मदात्री मां और मातृभाषा का स्थान सर्वोच्च है। मुख्य अतिथि, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार श्रीराम दाश ने कहा कि बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा और उनकी सोच के विकास को मातृभाषा के माध्यम से अधिक प्रभावी ढंग से विकसित किया जा सकता है। उन्होंने आधुनिक समाज में अंग्रेजी भाषा के बढ़ते प्रभाव के बावजूद ओड़िया भाषा की गरिमा और महत्व को बनाए रखने का आह्वान किया।
साहित्यकारों और विशिष्ट व्यक्तित्वों का सम्मान
परिचर्चा के दौरान प्रसिद्ध गायिका सुस्मिता दाश, डॉ किशोर मोहंती, सुधीर दास, सुरेश चंद्र सामंतराय, स्तंभकार जयश्री महापात्र, मंजुश्री बराल, आशुकवि हेमंत जेना, बाबाजी महंत और विश्व प्रसाद आचार्य को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर संगीता दास, शकुंतला महारणा, द्रौपदी पटेल, सुप्रिया शतपथी, विजयलक्ष्मी प्रहराज, मंजुश्री बराल, कृष्ण चंद्र मिश्रा, डॉ बंशीधर दास, निरंजन मिश्रा और अंजन देवता ने भी अपने विचार रखे।
कार्यक्रम के अंत में विश्व ओड़िया परिवार के संचालन प्रमुख भवानी प्रसाद मिश्रा ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम में संस्था के पदाधिकारी सुजीत दास, सुब्रत किशोर नायक, डॉ हाड़िबंधु पाणिग्राही, अक्षय बलियार सिंह, प्रदीप साहू, स्वागतिक धल और सुरेश कुमार साहू सहित अन्य उपस्थित रहे।
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