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सेंच्यूरियन विश्वविद्यालय में ‘युवाओं को सशक्त बनाने और राष्ट्रवाद को जागृत करने’ पर विशेष सत्र
भुवनेश्वर। भारत के युवाओं की सोच और आकांक्षाओं में तेजी से बदलाव आया है। आज की युवा पीढ़ी केवल भागीदारी तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि वैश्विक स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर नेतृत्व करने की आकांक्षा रखती है। यह बात प्रख्यात लेखक एवं वक्ता रतन शारदा ने भुवनेश्वर स्थित सेंच्यूरियन विश्वविद्यालय में लोकतंत्र रिसर्च फाउंडेशन के सहयोग से आयोजित विशेष सत्र ‘युवाओं को सशक्त बनाना, राष्ट्रवाद को जागृत करना: विकसित भारत 2047 की दिशा में मार्ग प्रशस्त करना’ के दौरान कही। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सुप्रिया पटनायक भी उपस्थित थीं ।
शारदा ने कहा कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, खेल और अन्य क्षेत्रों में भारतीय युवाओं की उपलब्धियां देश में बढ़ते आत्मविश्वास का प्रमाण हैं। स्क्वैश, हॉकी, तीरंदाजी, क्रिकेट, रिले दौड़ और अन्य खेलों में भारतीय खिलाड़ियों की अंतरराष्ट्रीय सफलताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज का युवा केवल प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के बजाय जीतने और विश्वस्तरीय नेतृत्व करने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है।
राष्ट्रीय आत्मविश्वास में बदलाव
शारदा ने कहा कि लंबे समय तक भारत को पराजय, निर्भरता और पिछड़ेपन के नजरिए से देखने की प्रवृत्ति रही। उनके अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में देश के आत्मविश्वास और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण बदलाव आया है।
उन्होंने 1965 के युद्ध के दौरान गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता की विमान दुर्घटना में मृत्यु और भारतीय वायुसेना के अधिकारी अभिनंदन वर्धमान की पाकिस्तान से वापसी जैसे प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की राष्ट्रीय प्रतिक्रिया और आत्मविश्वास में व्यापक परिवर्तन आया है। उन्होंने 1971 के युद्ध में भारत की विजय और लगभग 93,000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों के संदर्भ का भी उल्लेख किया।
इतिहास और सभ्यतागत विरासत को जानने पर जोर
शारदा ने कहा कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास के निर्माण के लिए युवाओं को भारत के इतिहास और सभ्यतागत विरासत से परिचित कराना आवश्यक है। उन्होंने कलिंग, चोल और अहोम शासकों के साथ-साथ जनजातीय वर्ग स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को अधिक प्रमुखता से सामने लाने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने भास्कराचार्य, सुश्रुत और चरक जैसे विद्वानों का उल्लेख करते हुए कहा कि गणित, चिकित्सा, खगोल विज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में भारत की ऐतिहासिक उपलब्धियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है।
भारत की सांस्कृतिक एकता और ओडिशा की समुद्री विरासत
ओडिशा की प्राचीन समुद्री परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने बालियात्रा को कलिंग के दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ पुराने व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक एकता राजनीतिक सीमाओं से कहीं व्यापक रही है।
उन्होंने तीर्थ परंपराओं, ज्योतिर्लिंगों, शक्तिपीठों, उत्तरापथ और दक्षिणापथ जैसी अवधारणाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की विविधता के भीतर एक गहरी सांस्कृतिक निरंतरता दिखाई देती है। उन्होंने ‘धर्म’ को केवल धार्मिक पहचान तक सीमित न रखते हुए कर्तव्य, जिम्मेदारी, न्याय और नैतिक आचरण से जोड़ा।
पर्यावरण संरक्षण और जिम्मेदार जीवनशैली
शारदा ने जलवायु परिवर्तन की चुनौती पर भी युवाओं का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि पृथ्वी के संसाधन सीमित हैं और इसलिए अनावश्यक उपभोग को कम करना जरूरी है। प्लास्टिक का कम इस्तेमाल, पानी की बर्बादी रोकना और जरूरत के अनुसार ही वस्तुओं की खरीद जैसे छोटे कदम सामूहिक रूप से बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
उन्होंने प्रयागराज के कुंभ मेले का उदाहरण देते हुए सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से पुन: उपयोग योग्य वस्तुओं के इस्तेमाल को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रभावी पहल बताया।
डिग्री से आगे कौशल विकास जरूरी
तेजी से बदलती प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में युवाओं को लगातार नए कौशल सीखने की आवश्यकता है। शारदा ने कहा कि केवल पारंपरिक शैक्षणिक डिग्री अब पर्याप्त नहीं हो सकती। युवाओं को सीखने, नई तकनीकों को अपनाने और समय के साथ स्वयं को पुनः कौशलयुक्त बनाने के लिए तैयार रहना होगा।
उन्होंने कहा कि अनिश्चितता को भय या निराशा के रूप में देखने के बजाय अवसर में बदलने की जरूरत है। राष्ट्रीय विकास में युवाओं की भूमिका केवल रोजगार प्राप्त करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन्हें समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी समझना चाहिए।
शारदा ने कहा कि 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक और तकनीकी शक्ति से पूरा नहीं होगा, बल्कि इसके लिए जिम्मेदार नागरिकता, राष्ट्रीय आत्मविश्वास, सामाजिक सहभागिता, पर्यावरण संरक्षण और निरंतर कौशल विकास भी आवश्यक होगा।
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