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श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन भारतीय जीवन मूल्यों और प्रकृति संरक्षण का दिया संदेश
पुरी। श्रीजगन्नाथ धाम पुरी के एक निजी होटल में परमशक्ति पीठ की ओर से आयोजित श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव के पांचवें दिन कथाव्यास पद्मभूषण विभूषिता साध्वी ऋतम्भरा ने भारतीय संस्कृति, सामाजिक जीवन और प्रकृति संरक्षण पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन सामाजिक व्यवस्था आपसी प्रेम, सहयोग और संस्कारों पर आधारित थी, लेकिन पश्चिमी जीवनशैली की नकल करते-करते समाज अपनी मूल पहचान और पारिवारिक मूल्यों से दूर होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत’ की छाती पर ‘इंडिया’ को बैठा दिया और पश्चिम के तौर-तरीकों की नकल करने लग गए, यही हमारा दुर्भाग्य है।
कथा के पांचवें दिन कांकरोली राजस्थान निवासी पवन शर्मा एवं उनकी पत्नी सरोज शर्मा तथा नोएडा निवासी राजेश खंडेलवाल एवं उनकी पत्नी ने व्यासपीठ का पूजन-अर्चन कर कथा का शुभारंभ किया।
संबित पात्र ने साध्वी ऋतम्भरा के योगदान को सराहा
मुख्य अतिथि के रूप में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं लोकसभा सदस्य संबित पात्र कथा में शामिल हुए और साध्वी ऋतम्भरा का आशीर्वाद प्राप्त किया। उन्होंने कहा कि उनके लिए यह सौभाग्य की बात है कि वे उस मंच पर उपस्थित हैं, जहां साध्वी ऋतम्भरा जैसी संत विराजमान हैं। उन्होंने अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में साध्वी ऋतम्भरा की भूमिका को याद करते हुए कहा कि उनकी वाणी ने देशभर में जनजागरण पैदा किया।
पात्र ने पुरी की आध्यात्मिक विशेषता का उल्लेख किया
संबित पात्र ने पुरी की आध्यात्मिक विशेषता का उल्लेख करते हुए कहा कि जगन्नाथ धाम में शक्ति और नारायण की परंपरा का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। उन्होंने सनातन समाज को एकजुट रखने और जातिगत विभाजन से ऊपर उठकर सनातन की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान किया।
विशिष्ट अतिथि के रूप में कुटुंब प्रबोधन के राष्ट्रीय सह-संयोजक मनसुख सेठिया और माहेश्वरी समाज के संरक्षक लालचंद मेहता ने भी व्यासपीठ पर साध्वी ऋतम्भरा का स्वागत कर आशीर्वाद प्राप्त किया। कथा के सह-संयोजक उमेश खंडेलवाल ने परिवार के साथ व्यासपीठ को नमन किया।
कृष्ण की लीलाओं से प्रकृति संरक्षण का संदेश
साध्वी ऋतम्भरा ने भगवान श्रीकृष्ण के गोकुल पहुंचने, बाल लीलाओं, पूतना वध, ऊखल बंधन, गोकुल से वृंदावन प्रस्थान और कालिया मर्दन जैसे प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण की लीलाओं में प्रकृति संरक्षण का भी गहरा संदेश छिपा है। गोवर्धन धारण और यमुना को कालिया के विष से मुक्त कराने के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने लोगों से नदियों को स्वच्छ और अविरल बनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया।
विकास का अर्थ प्रकृति का विनाश नहीं
उन्होंने रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक खाद के प्रयोग तथा प्रकृति से अनावश्यक छेड़छाड़ रोकने की अपील की। उन्होंने कहा कि विकास का अर्थ प्रकृति का विनाश नहीं हो सकता। नदियों और जलस्रोतों को प्रदूषित करने वाली पूजन सामग्री तथा रासायनिक तत्वों के विसर्जन से बचना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि पूजन सामग्री को भूमि में दबाकर प्राकृतिक रूप से नष्ट किया जा सकता है।
भजनों पर श्रद्धालु भावपूर्ण नृत्य करते नजर आए
कथा के दौरान श्रीकृष्ण जन्म, गोकुल में आनंदोत्सव और अन्य प्रसंगों की संगीतमय प्रस्तुतियों ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। भजनों पर श्रद्धालु भावपूर्ण नृत्य करते नजर आए। आरती के साथ कथा के पांचवें दिन का समापन हुआ। कार्यक्रम की जानकारी संयोजक साध्वी शिरोमणि दीदी एवं सह-संयोजक उमेश खंडेलवाल ने दी।
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