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दक्षिण मोड़ा नीति से बाहुड़ा यात्रा की शुरुआत

पुरी। मंगलवार को पवित्र ‘आज्ञा माला बिजे’ रस्म पूरी की गई। इसके साथ ही ‘दक्षिण मोड़ा’ की शुरुआत हुई। भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन की श्री जगन्नाथ मंदिर वापसी यात्रा से पहले तीनों रथों को दक्षिण दिशा की ओर मोड़ा जाता है।

‘दक्षिण मोड़ा’ रस्म ‘हेरा पंचमी’ समारोह के एक दिन बाद निभाई जाती है, जो रथयात्रा के पांचवें दिन होता है। यह देवताओं की श्रीमंदिर वापसी यात्रा के लिए तीनों रथों की तैयारी का प्रतीक है।

रथयात्रा के दिन ‘सरधाबली’ पहुंचने के बाद से ही रथ गुंडिचा मंदिर के सामने उत्तर दिशा की ओर मुंह करके खड़े रहते हैं। वापसी यात्रा से पहले, उन्हें दक्षिण दिशा में जगन्नाथ मंदिर की ओर मोड़ना होता है। इसी वजह से इस रस्म का नाम ‘दक्षिण मोड़ा’ (दक्षिण की ओर मुड़ना) पड़ा है।

परंपरा के अनुसार, तीन पूजापंडा सेवायत आज्ञा माला को देवताओं के पास से रथों तक ले जाते हैं। यह माला रथों को औपचारिक रूप से मोड़ने की अनुमति देती है।

तय रीति-रिवाजों के अनुसार, सबसे पहले देवी सुभद्रा के रथ ‘दर्पदलन’ को मोड़ा जाता है, उसके बाद भगवान बलभद्र के रथ ‘तालध्वज’ को, और अंत में भगवान जगन्नाथ के रथ ‘नंदीघोष’ को मोड़ा जाता है। इस रस्म के बाद, तीनों रथों को गुंडिचा मंदिर के पूर्वी द्वार के पास खड़ा किया जाता है।

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