पुरी। स्नान पूर्णिमा के बाद 15 दिनों तक चले अणसर काल की समाप्ति पर मंगलवार को महाप्रभु श्रीजगन्नाथ, महाप्रभु बलभद्र, देवी सुभद्रा और श्रीसुदर्शन ने अपने दिव्य नवयौवन स्वरूप में भक्तों को दर्शन दिए। वार्षिक रथयात्रा से पूर्व होने वाले इस अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान के तहत लंबे इंतजार के बाद महाप्रभु के दर्शन कर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। गर्भगृह के पट खुलते ही मंदिर परिसर “जय जगन्नाथ” के उद्घोष से गूंज उठा और अनेक भक्तों की आंखें श्रद्धा और भावुकता से नम हो गईं।
नियमित रूप से श्रीमंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए 15 दिनों का यह विरह मानो वर्षों की प्रतीक्षा जैसा रहा। महाप्रभु के नवयौवन स्वरूप के प्रथम दर्शन ने भक्तों को आध्यात्मिक आनंद से सराबोर कर दिया।
केवल दो घंटे 15 मिनट तक मिला नवयौवन दर्शन का अवसर
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के बावजूद आम भक्तों को नवयौवन दर्शन के लिए केवल दो घंटे 15 मिनट का समय ही मिल सका। सीमित अवधि के कारण मंदिर परिसर और सिंहद्वार के बाहर बैरिकेड्स पर घंटों से प्रतीक्षा कर रहे हजारों श्रद्धालु दर्शन से वंचित रह गए।
श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने दोपहर 2 बजे दर्शन शुरू करने की योजना बनाई थी, लेकिन चतुर्दशी की नीतियों में विलंब के कारण कार्यक्रम लगभग तीन घंटे देर से प्रारंभ हुआ। शाम 5 बजे परिमाणिक (विशेष) दर्शन आरंभ हुआ, जबकि लगभग आधे घंटे बाद सामान्य श्रद्धालुओं के लिए दर्शन खोला गया। शाम 7:15 बजे तक दर्शन जारी रहा, जिसके बाद नियमित मंदिर नीतियां शुरू कर दी गईं।
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए जय-विजय द्वार खोला गया तथा भीतर काठ के निकट परिमाणिक दर्शन और साहाणमेला दर्शन की विशेष व्यवस्था की गई।
बारिश के बावजूद उमड़ी श्रद्धालुओं की भारी भीड़
दिनभर रुक-रुक कर हुई बारिश भी श्रद्धालुओं की आस्था को डिगा नहीं सकी। अनुमान के अनुसार सीमित समय में 50 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने महाप्रभु के नवयौवन स्वरूप के दर्शन किए। हालांकि, दर्शन का समय समाप्त होने के बाद सैकड़ों श्रद्धालुओं को बिना दर्शन किए ही लौटना पड़ा।
सामान्य दर्शन शुरू होने की घोषणा होते ही तीनों रथों के निकट एकत्र श्रद्धालुओं की भीड़ अचानक सिंहद्वार बैरिकेड्स की ओर उमड़ पड़ी। भीड़ को नियंत्रित करना पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा, हालांकि पूरे आयोजन को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराया गया।
15 दिनों के अणसर काल का हुआ समापन
नवयौवन दर्शन के साथ ही महाप्रभु के 15 दिनों तक चले अणसर काल का समापन हो गया। श्रीमंदिर की परंपरा के अनुसार स्नान पूर्णिमा पर महाअभिषेक के बाद महाप्रभु अस्वस्थ हो जाते हैं और अणसर गृह में विश्राम एवं उपचार करते हैं। इस दौरान श्रद्धालुओं के लिए दर्शन बंद रहता है।
महाप्रभु के प्रथम दर्शन को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष भावुकता देखने को मिली। कई भक्तों ने कहा कि ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो महाबाहु स्वयं अपने भक्तों को आलिंगन देने के लिए बाहें फैलाए खड़े हों।
सुबह से देर शाम तक चली विशेष धार्मिक नीतियां
मंगलवार को सुबह से ही मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम जारी रहा। सुबह 8:45 बजे झुण बाहर की नीति पूरी होने के बाद दत्त महापात्र सेवक सुबह 9:15 बजे बनकलागी सेवा के लिए अणसर गृह में प्रवेश किए।
दोपहर 1:35 बजे खड़ी प्रसाद बीजे की नीति संपन्न हुई। इसके बाद क्रमशः चका अपसर, मंगल आरती, मैलम, अवकाश पूजा तथा दशावतार ठाकुर की बाहुड़ा बीजे जैसी महत्वपूर्ण नीतियां संपन्न की गईं। शाम लगभग 4:45 बजे अणसर ताटी खोले जाने के बाद दक्षिण द्वार से श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए प्रवेश दिया गया। सार्वजनिक दर्शन समाप्त होने के बाद मंदिर की नियमित दैनिक नीतियां पुनः प्रारंभ कर दी गईं।
15 दिनों तक चली महाप्रभु की गुप्त उपचार परंपरा
नीलाद्रि महोदय के अनुसार स्नान पूर्णिमा के बाद महाप्रभु के स्वास्थ्य लाभ के लिए 15 दिनों तक अनेक गुप्त उपचार एवं धार्मिक नीतियां संपन्न की जाती हैं। इनमें फूलुरी तेल, ओष लागी, दशमूल लागी, सर्वांग चंदन, राजप्रसाद बीजे, खली बीजे तथा खड़ी प्रसाद बीजे जैसी विशेष सेवाएं शामिल हैं।
मंदिर परंपरा के अनुसार ये सभी अनुष्ठान महाप्रभु के स्वास्थ्य लाभ और पुनः नवयौवन प्राप्त करने के प्रतीक माने जाते हैं। देर रात दत्त महापात्र सेवकों द्वारा बनकलागी सेवा संपन्न की गई, जिसके साथ रोष होम, यात्रांगी महास्नान, मैलम और तड़पलागी जैसी प्राचीन धार्मिक परंपराओं का भी विधिवत निर्वहन किया गया।
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