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खेती और छोटे व्यवसाय से लक्ष्मी ने शुरू की नई जिंदगी
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सिर पर था 5 लाख रुपये का इनाम
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पति की मौत और लगातार अभियानों के बाद चुना आत्मसमर्पण का रास्ता
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ओडिशा समेत पांच राज्यों में रही थी सक्रिय
भुवनेश्वर। कभी एके-47 के साथ जंगलों में सक्रिय रहने वाली और सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती मानी जाने वाली माओवादी नेता पोडियम लक्ष्मी ने हिंसा का रास्ता छोड़कर अब खेती को अपनी नई पहचान बना लिया है। एक समय आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में सक्रिय रही लक्ष्मी आज अपने पैतृक गांव भद्राद्री कोठागुडेम जिले के रल्लापुरम में खेतों में मेहनत कर आत्मनिर्भर जीवन जीने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
लक्ष्मी कभी माओवादी संगठन की डिवीजनल कमेटी सदस्य थीं और आंध्र प्रदेश के कोठागुडेम तथा अल्लूरी सीताराम राजू क्षेत्रों में उनका खासा प्रभाव था। सरकार ने उनकी गिरफ्तारी पर 5 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था। हथियारबंद दस्ते का नेतृत्व करने वाली लक्ष्मी वर्षों तक एके-47 के साथ विभिन्न राज्यों के जंगलों में सक्रिय रहीं।
पति की मौत के बाद बदली जिंदगी
लक्ष्मी के जीवन में बड़ा मोड़ तब आया, जब उनके पति की कर्रेगुट्टा जंगल में पुलिस अभियान के दौरान मौत हो गई। इसके बाद सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों और कई वरिष्ठ माओवादी नेताओं के मारे जाने से उन्होंने हिंसा के रास्ते पर पुनर्विचार करना शुरू किया।
आखिरकार इस वर्ष जनवरी में उन्होंने तेलंगाना के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। आत्मसमर्पण के समय उन्होंने स्वीकार किया कि जंगल का जीवन अब असंभव हो चुका था और उन्होंने अपने सामने बहुत अधिक मौतें देखी हैं।
अब खेती और वन उपज से कमा रही हैं आजीविका
आत्मसमर्पण के बाद लक्ष्मी अपने गृह गांव रल्लापुरम लौट आईं। अब वह अपनी छोटी कृषि भूमि पर खेती कर रही हैं और जंगल से मिलने वाली वन उपज एकत्र कर बाजार में बेचती हैं। जिन हाथों में कभी एके-47 हुआ करती थी, उन्हीं हाथों में आज हल और खेती के औजार हैं।
लक्ष्मी स्वीकार करती है कि उन्होंने अतीत में गलत रास्ता चुना था। अब उनका उद्देश्य सम्मानपूर्वक जीवन जीना और अपने पैरों पर खड़ा होना है। पुनर्वास योजना के तहत मिलने वाली आर्थिक सहायता से वह एक छोटा व्यवसाय शुरू करने की भी योजना बना रही हैं।
परिवार बना नई शुरुआत का सहारा
लक्ष्मी की इस नई यात्रा में उनकी मां और भाई उनका पूरा साथ दे रहे हैं। उनका कहना है कि अब वह किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं और मेहनत के बल पर आत्मनिर्भर बनकर समाज की मुख्यधारा में सम्मानजनक जीवन जीना चाहती हैं।
पूर्व माओवादी नेता से किसान बनी लक्ष्मी की यह कहानी इस बात का उदाहरण है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, सही निर्णय, इच्छाशक्ति और समाज के सहयोग से जीवन को नई दिशा दी जा सकती है।
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