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विदेशी चश्मा उतार कर भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास लेखन की आवश्यकता – डा अग्निहोत्री 

भुवनेश्वर। इतिहास हमेशा विजेताओं के दरबारी ही लिखते हैं। इस कारण विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ भारतीयों द्वारा किये गये निरंतर संघर्ष, पराक्रम व शौर्य की गाथा को इतिहास में स्थान नहीं मिल पाया, लेकिन भारत के स्वतंत्र हुए 75 साल बीत जाने के बाद भी हमारे बच्चो को विदेशी सलतनत व अंग्रेजों का इतिहास पढाया जा रहा है। हमारे नायक अब भी हाशिये पर हैं। इसलिए हमें विदेशी चश्मा उतार कर भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास के पुनर्लेखन करने की आवश्यकता है ताकि हमारे नायकों के वीरता व शौर्य से हमारे आने वाली पीढियां प्रेरणा प्राप्त कर सकें। प्रसिद्ध शिक्षाविद तथा हरियाणा संस्कृति व साहित्य बोर्ड के उपाध्यक्ष प्रो कुलदीप अग्निहोत्री ने ये बातेेंकहीं।
उन्होनें कहा कि गजपति कपिलेन्द्र देव भी ऐसे ही एक नायक है जिन्होंने विदेशी आक्रांताओं के छक्के छुडा दिये। बंगाल के नवाब से लेकर बाहमानी के सुलतान तक सभी को उन्होंने पराजित किया तथा संस्कृति व सभ्यता के लिए वह निरंतर कार्य करते रहे। वे कहते थे उत्कल के राजा स्वयं जगन्नाथ हैं और मैं उनका दास हूं। कपिलेन्द्र देव भी ऐसे ही एक नायक हैं जिन्हें हाशिये पर रखा गया है। अब समय आ गया है कि ऐसे ही महानायकों को इतिहास में उनका उचित स्थान प्रदान किया जाए । विश्वविद्यालयों को ऐसे ही हाशिये पर डाल दिये गये महानायकों पर अधिक से अधिक शोध करना चाहिए । उनके बारे में अधिक से अधिक पाठ्य पुस्तकों में लिखा जाए। विदेशी हमलाबरों को इतिहास को कम कर भारतीय नायकों के बारे में अधिक से अधिक पढाय़ा जाए।
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