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स्नान पूर्णिमा के बाद अणसर काल प्रारंभ
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महाप्रभु के विश्राम के दौरान अलारनाथ के रूप में हो रहे हैं दर्शन
पुरी/ब्रह्मगिरि। स्नान पूर्णिमा के भव्य अनुष्ठान और भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र तथा देवी सुभद्रा के दिव्य गजानन वेश के दर्शन के उपरांत अब श्रीजगन्नाथ संस्कृति का सबसे रहस्यमय और आध्यात्मिक चरण अणसर काल प्रारंभ हो गया है। इसके साथ ही पुरी जिले के ब्रह्मगिरि स्थित प्रसिद्ध अलारनाथ मंदिर में दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा है।
मान्यता है कि इस अवधि में श्रीजगन्नाथ स्वयं भगवान विष्णु के अलारनाथ स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इसलिए श्रीमंदिर में दर्शन बंद रहने के दौरान श्रद्धालु अलारनाथ मंदिर पहुंचकर प्रभु के दर्शन कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।
108 कलशों के पवित्र स्नान के बाद बीमार पड़ते हैं महाप्रभु
स्नान पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा का 108 कलशों के पवित्र जल से महाअभिषेक किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिव्य स्नान के बाद तीनों देव विग्रह अस्वस्थ हो जाते हैं और उन्हें ज्वर हो जाता है।
इसके बाद उन्हें श्रीमंदिर के अनासार घर में लगभग 15 दिनों के लिए विश्राम हेतु ले जाया जाता है। इस दौरान आम श्रद्धालुओं के लिए श्रीमंदिर में उनके प्रत्यक्ष दर्शन बंद रहते हैं। दैतापति सेवक इस अवधि में महाप्रभु की आयुर्वेदिक उपचार पद्धति के अनुसार सेवा, औषधि और विशेष अनुष्ठान करते हैं।
अलारनाथ मंदिर बन जाता है श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र
जगन्नाथ परंपरा के अनुसार इस दौरान भगवान जगन्नाथ भगवान अलारनाथ के रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि पुरी से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित ब्रह्मगिरि का अलारनाथ मंदिर इन दिनों श्रद्धालुओं का प्रमुख तीर्थ बन जाता है।
मान्यता है कि अणसर के दौरान अलारनाथ के दर्शन करने से वही आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है जो श्रीजगन्नाथ के प्रत्यक्ष दर्शन से मिलता है। इसी विश्वास के चलते ओडिशा ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न राज्यों से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंच रहे हैं।
श्री चैतन्य महाप्रभु से जुड़ी है अलारनाथ की पौराणिक मान्यता
अलारनाथ मंदिर का संबंध वैष्णव परंपरा के महान संत श्री चैतन्य महाप्रभु से भी जुड़ा हुआ है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जब अणसर काल में उन्हें श्रीजगन्नाथ के दर्शन नहीं मिले, तब वे ब्रह्मगिरि स्थित अलारनाथ मंदिर पहुंचे और गहन भक्ति से भगवान की आराधना की।
कहा जाता है कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर जिस पत्थर पर वे दंडवत हुए थे, वह पिघल गया और उस पर उनके शरीर की छाप आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है।
प्रसिद्ध खीर का भोग और विशेष पूजा-अर्चना
अलारनाथ मंदिर में प्रतिदिन विशेष पूजा-अर्चना और विविध धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। भगवान को विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं, जिनमें मंदिर की प्रसिद्ध खीर को अत्यंत पवित्र प्रसाद माना जाता है। इस प्रसाद को ग्रहण करने के लिए भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं।
नवयौवन दर्शन तक जारी रहेगा अणसर काल
अणसर काल लगभग पंद्रह दिनों तक चलता है। इसके बाद नवयौवन दर्शन के अवसर पर भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा नए तेजस्वी स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इसके तुरंत बाद विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा का शुभारंभ होता है, जब महाप्रभु अपने भाई-बहन के साथ रथों पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देने निकलते हैं।
गजानन वेश के दिव्य दर्शन से अभिभूत हुए श्रद्धालु
सोमवार को स्नान पूर्णिमा के अवसर पर महाप्रभु के हाथी वेश (गजानन वेश) के दर्शन के लिए पुरी में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। देश के विभिन्न हिस्सों से आए भक्तों ने इस दिव्य दर्शन को जीवन का अविस्मरणीय आध्यात्मिक अनुभव बताया।
भुवनेश्वर से आए एक श्रद्धालु ने कहा कि वह कई वर्षों से पुरी आ रहे हैं, लेकिन हाथी वेश के दर्शन हर बार उनके मन को नई भक्ति और शांति से भर देते हैं।
पुरी एक श्रद्धालु ने कहा कि पूरे वर्ष इंतजार के बाद हाथी वेश के दर्शन करना अत्यंत आनंददायक और आध्यात्मिक अनुभव रहा। भारी भीड़ के बावजूद उन्हें ऐसा लगा मानो स्वयं महाप्रभु ने दर्शन का मार्ग सरल बना दिया।
कटक से आए एक अन्य श्रद्धालु ने कहा कि इतनी भीड़ होने के बावजूद उन्हें सहज दर्शन प्राप्त हुए और भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र तथा देवी सुभद्रा के हाथी वेश का दर्शन उनके लिए परम सौभाग्य का क्षण रहा।
पश्चिम बंगाल से आए एक श्रद्धालु ने बताया कि वह अपने परिवार के साथ पूरी रात यात्रा कर केवल इस दिव्य अवसर के लिए पुरी पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि महाप्रभु के दर्शन करते ही सारी थकान दूर हो गई और उन्होंने सभी के सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की।
अनवसर में ‘पट्टी दिअं’ परंपरा से जीवित रहती है श्रद्धा
अणसर काल के दौरान जब काष्ठ विग्रहों के दर्शन संभव नहीं होते, तब श्रीमंदिर में ‘पट्टी दिअं’ अर्थात हाथ से चित्रित पवित्र कपड़े के स्वरूपों की पूजा की जाती है। ये भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा का प्रतीकात्मक स्वरूप होते हैं और इन्हीं के माध्यम से श्रद्धालु दर्शन एवं पूजा करते हैं।
इतिहासकारों के अनुसार यह परंपरा कई शताब्दियों पुरानी है। इसका उल्लेख ‘नीलाद्रि महोदय’ जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। इन पवित्र चित्रों का निर्माण पुरी के केवल तीन चित्रकार परिवारों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी किया जाता है।
चित्रकार सेवक कठोर धार्मिक अनुशासन का पालन करते हुए प्राकृतिक रंगों, शंख चूर्ण, हिंगुल, हरिताल, गेरू और कैथा गोंद जैसे पारंपरिक पदार्थों से इन चित्रों का निर्माण करते हैं। स्नान पूर्णिमा के दिन पहले इनकी पूजा चित्रकार परिवार के घर पर होती है, जिसके बाद विशेष शोभायात्रा के साथ इन्हें श्रीमंदिर लाया जाता है।
अणसर अवधि में यही पट्टी दिअं श्रीमंदिर में पूजा का मुख्य केंद्र बन जाते हैं, जबकि अणसर घर में दैतापति सेवक महाप्रभु के उपचार और गोपनीय अनुष्ठानों का निर्वहन करते हैं।
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