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प्रदर्शनी, वृत्तचित्र और विद्वानों की परिचर्चाओं के माध्यम से महान सम्राट को दी गई श्रद्धांजलि
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कपिलेंद्र देव ओडिशा की गौरवशाली विरासत के प्रतीक – मंत्री सूर्यवंशी सूरज
भुवनेश्वर। ओडिशा के महान गजपति सम्राट कपिलेंद्र देव की 591वीं राजतिलक वर्षगांठ सोमवार को भुवनेश्वर स्थित उत्कल विश्वविद्यालय के एमकेसीजी सभागार में ‘गजपति दिवस’ के रूप में धूमधाम से मनाई गई। इस अवसर पर इतिहासकारों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों और विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिष्ठित हस्तियों ने मध्यकालीन भारत के महानतम शासकों में से एक कपिलेंद्र देव को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके राजनीतिक, सैन्य और सांस्कृतिक योगदान को याद किया।
इस कार्यक्रम का संयुक्त आयोजन ओडिशा साहित्य अकादमी और बियॉन्ड हेरिटेज ट्रस्ट द्वारा किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं ओड़िया भाषा, साहित्य और संस्कृति मंत्री सूर्यवंशी सूरज ने दीप प्रज्ज्वलित कर समारोह का उद्घाटन किया। उन्होंने इस अवसर पर “वार, एम्परर एंड इटरनल: गजपति कपिलेंद्र देव” शीर्षक विशेष प्रदर्शनी का भी उद्घाटन किया, जिसमें सम्राट कपिलेंद्र देव के जीवन, सैन्य अभियानों, प्रशासनिक क्षमता और ऐतिहासिक विरासत को चित्रों, दस्तावेजों और अन्य सामग्री के माध्यम से प्रस्तुत किया गया।
‘कपिलेंद्र देव साहस, दूरदर्शिता और सांस्कृतिक गौरव के प्रतीक’
अपने संबोधन में मंत्री सूर्यवंशी सूरज ने कहा कि सम्राट कपिलेंद्र देव केवल एक महान विजेता ही नहीं, बल्कि दूरदर्शी शासक और ओडिशा की सांस्कृतिक अस्मिता के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने कहा कि उनके शासनकाल ने ओडिशा की राजनीतिक पहचान को नई मजबूती प्रदान की और ओडिया भाषा, संस्कृति, परंपराओं तथा विरासत के संरक्षण एवं विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने कहा कि कपिलेंद्र देव का शासन ओडिशा के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है और उनकी उपलब्धियां आज भी नई पीढ़ी को प्रेरित करती हैं।
वृत्तचित्र के माध्यम से दिखाई गई गौरवशाली यात्रा
समारोह के दौरान “लाखे राजा र मौड़ा मणि: द ग्लोरियस स्टोरी ऑफ गजपति” नामक वृत्तचित्र का प्रदर्शन किया गया। इस फिल्म में सम्राट कपिलेंद्र देव के जीवन, उनके साम्राज्य विस्तार, सैन्य सफलताओं तथा ऐतिहासिक उपलब्धियों को विस्तार से प्रस्तुत किया गया।
वृत्तचित्र ने दर्शकों को गजपति साम्राज्य के उत्कर्ष और ओडिशा के गौरवशाली अतीत से परिचित कराया।
ओडिशा के इतिहास पर शोध बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर
कार्यक्रम में दो महत्वपूर्ण परिचर्चाओं का भी आयोजन किया गया। पहली परिचर्चा का विषय था “ओडिशा के गौरवशाली इतिहास के संदर्भ में शोध और शिक्षा का पुनर्जीवन”, जबकि दूसरी चर्चा “क्षेत्रीय नायक से राष्ट्रीय प्रतीक तक” विषय पर केंद्रित रही।
इन परिचर्चाओं में विद्वानों ने ओडिशा के समृद्ध इतिहास, सांस्कृतिक धरोहर और भारतीय सभ्यता में उसके योगदान पर अधिक व्यापक शोध को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि राज्य के ऐतिहासिक नायकों और उनकी उपलब्धियों को राष्ट्रीय स्तर पर उचित पहचान दिलाने के लिए अकादमिक अनुसंधान और दस्तावेजीकरण को और मजबूत किया जाना चाहिए।
कई प्रतिष्ठित हस्तियां रहीं मौजूद
इस अवसर पर कटक के सांसद भर्तृहरि महताब, पद्मश्री सम्मानित मूर्तिकार अद्वैत गड़नायक, इतिहासकार प्रो कुलदीप चंद अग्निहोत्री, राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के पूर्व निदेशक प्रो प्रफुल्ल कुमार मिश्र, उत्कल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो चंडी प्रसाद नंद तथा ओडिशा साहित्य अकादमी के सचिव डॉ चंद्रशेखर होता सहित अनेक शिक्षाविद, इतिहासकार और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
गौरवशाली इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प
कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि सम्राट कपिलेंद्र देव जैसे महान शासकों की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि ओडिशा के गौरवशाली इतिहास, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण तथा उनके व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए ऐसे आयोजन भविष्य में भी निरंतर किए जाने चाहिए, ताकि राज्य की समृद्ध ऐतिहासिक धरोहर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उचित पहचान मिल सके।
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