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आपसी सहमति से आगे बढ़ीं ओडिशा-छत्तीसगढ़ सरकारें
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ओडिशा के हितों से समझौता नहीं होगा : एडवोकेट जनरल
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महानदी बचाओ आंदोलन ने जल आंकड़ों की समीक्षा की मांग उठाई
भुवनेश्वर। वर्षों से चले आ रहे ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच महानदी जल विवाद के समाधान की दिशा में बड़ी प्रगति होती दिखाई दे रही है। लंबे कानूनी गतिरोध के बाद अब दोनों राज्य आपसी सहमति के जरिए विवाद सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ओडिशा के एडवोकेट जनरल पितांबर आचार्य ने घोषणा की है कि महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण ने दोनों राज्यों को आपसी समझौते के माध्यम से समाधान निकालने की अनुमति दे दी है।
उन्होंने कहा कि यह कदम लंबे समय से चल रहे विवाद को सहयोगात्मक तरीके से समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। पितांबर आचार्य ने स्पष्ट किया कि इस पूरी प्रक्रिया में ओडिशा के हितों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी। उन्होंने कहा कि देश में इस प्रकार के अंतरराज्यीय जल विवादों का व्यावहारिक समाधान आपसी सहमति से ही संभव है और हम उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
15 बैठकों के बाद तैयार हुई तकनीकी रिपोर्ट
एडवोकेट जनरल ने बताया कि दोनों राज्यों की संयुक्त तकनीकी समिति ने अब तक 15 बैठकें कीं और महानदी के वार्षिक जल प्रवाह तथा हीराकुद जलाशय के ऊपरी हिस्से में उपलब्ध जल की मात्रा पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की।
यह रिपोर्ट 1980-81 से 2018-19 तक के जल प्रवाह आंकड़ों और महानदी बेसिन के विभिन्न बिंदुओं के अध्ययन पर आधारित है। दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस रिपोर्ट को मंजूरी दे दी है और इसे औपचारिक रूप से न्यायाधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किया गया है।
उन्होंने कहा कि भारत में अब तक कोई भी अंतरराज्यीय जल विवाद केवल न्यायाधिकरण के फैसले से पूरी तरह हल नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि आपसी समझ ही इसका एकमात्र प्रभावी माध्यम है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि समाधान प्रक्रिया में कुछ समझौते करने पड़ सकते हैं, लेकिन ओडिशा के हितों की अनदेखी कभी नहीं की जाएगी।
सात वर्षों तक अटका रहा समाधान
पितांबर आचार्य ने कुछ राजनीतिक तत्वों पर भी निशाना साधते हुए कहा कि केंद्र सरकार द्वारा पहले दिए गए अदालत के बाहर समाधान के प्रस्ताव को अस्वीकार कर मामला न्यायालय तक ले जाया गया, जिससे समाधान प्रक्रिया करीब सात वर्षों तक ठप रही।
गौरतलब है कि 24 अप्रैल को संयुक्त तकनीकी समिति की बैठक में दोनों पक्ष महत्वपूर्ण जल संबंधी आंकड़ों पर सहमत हुए थे। इसके बाद न्यायाधिकरण ने दोनों राज्यों के संयुक्त प्रस्ताव का स्वागत करते हुए अदालत के बाहर समाधान प्रक्रिया को मंजूरी दी।
महानदी बचाओ आंदोलन ने उठाए सवाल
हालांकि इस प्रगति के बीच महानदी बचाओ आंदोलन ने सरकार के समक्ष गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आंदोलन की ओर से मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी को पत्र लिखकर न्यायाधिकरण में प्रस्तुत जल आंकड़ों की तत्काल समीक्षा की मांग की गई है।
आंदोलन का आरोप है कि प्रस्तुत आंकड़े जमीनी वास्तविकता को नहीं दर्शाते और छत्तीसगढ़ द्वारा महानदी के ऊपरी हिस्से में बनाए गए अनेक बांधों के कारण हीराकुद में उत्पन्न गंभीर जल संकट को नजरअंदाज किया गया है।
आंदोलन के नेता सुदर्शन दास ने सरकार को 20 मई तक चर्चा आयोजित करने का अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इस मुद्दे पर बातचीत नहीं की तो मुख्यमंत्री आवास के सामने शांतिपूर्ण सत्याग्रह शुरू किया जाएगा।
निचले क्षेत्रों में अब भी जल संकट
महानदी बचाओ आंदोलन का कहना है कि सरकारी आंकड़े भले ही महानदी में पर्याप्त जल उपलब्धता दर्शाते हों, लेकिन ओडिशा के निचले क्षेत्रों के किसान और स्थानीय निवासी विशेषकर गर्मी और कम वर्षा वाले मौसम में गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि विवाद का स्थायी समाधान तभी संभव होगा जब तकनीकी आंकड़ों के साथ जमीनी परिस्थितियों और प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक जरूरतों को भी समान महत्व दिया जाए।
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