काठमांडू। नेपाल के मिथिलांचल सहित भारतीय सीमा से जुड़े जिलों में आज चैत्र नवरात्र के बीच में आने वाले चैती छठ पूजा के क्रम में संध्या अर्घ्य अर्पण किया गया।
जनकपुरधाम के ऐतिहासिक सरोवर— गंगासागर, धनुषसागर और अरगजा सर के किनारों पर व्रतधारियों की भीड़ देखने को मिली है। हाथों में अर्घ्य सामग्री लिए श्रद्धालु व्रती और मंगल ध्वनि के बीच मिथिलांचल का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया है।
रविवार से शुरू हुआ चैती छठ आज अपने तीसरे दिन में है। व्रती अस्त होते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर ‘संध्या अर्घ्य’ मना रहे हैं। जलाशयों के पानी में खड़े होकर सूर्यास्त की प्रतीक्षा कर रहे श्रद्धालु षष्ठी माता का ध्यान करते हुए ठेकुआ, भुसवा, केला, गन्ना और नारियल से युक्त प्रसाद अर्पित करेंगे।
कार्तिक महीने में मनाए जाने वाले ‘बड़का छठ’ की तुलना में चैती छठ करने वालों की संख्या कुछ कम होती है, लेकिन पिछले वर्षों में इसकी लोकप्रियता और विस्तार लगातार बढ़ रहा है। हालांकि, दोनों छठ पर्वों की विधि और प्रक्रिया समान होती है।
चार दिनों तक चलने वाले इस कठिन व्रत के पहले दिन व्रतियों ने ‘नहाय–खाय’ कर शुद्ध भोजन ग्रहण किया था, जबकि सोमवार (पंचमी) को ‘खरना’ मनाया गया। खरना के दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं और शाम को चंद्रमा के उदय के बाद खीर, केला और फलों का प्रसाद चढ़ाकर फलाहार करते हैं।
मंगलवार शाम को सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रती पूरी रात जागरण करेंगे। इसके बाद बुधवार (सप्तमी) की सुबह ‘भोर का अर्घ्य’ यानी उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ यह महान लोकपर्व विधिवत संपन्न होगा।
सूर्य उपासना पर आधारित इस पर्व में जलाशयों के किनारे बैठकर संतान सुख, परिवार की समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है। जनकपुर के प्रमुख सरोवर ही नहीं, बल्कि पूरे तराई–मधेस क्षेत्र के गांव-गांव में नदियों और जलाशयों के किनारे छठ पर्व का उल्लास देखने को मिल रहा है।
साभार -हिस
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