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पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम
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भक्तों व दुकानदारों के लिए नई गाइडलाइन जारी
भुवनेश्वर। ओडिशा सरकार ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राज्य के सभी मंदिर परिसरों में सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है।
राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, ओडिशा ने प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के तहत नई गाइडलाइन जारी करते हुए श्रद्धालुओं को पॉलिथीन या प्लास्टिक सामग्री में पूजा-सामग्री लाने पर रोक लगा दी है। यह निर्देश पूजा सामग्री, प्रसाद वितरण और खाद्य परोसने में प्लास्टिक के उपयोग को भी प्रतिबंधित करता है।
पर्यावरण अनुकूल विकल्प अपनाने की अपील
बोर्ड ने श्रद्धालुओं को बांस की टोकरी, पत्तों से बने दोने-पत्तल और पुनः उपयोग योग्य टोकरियों का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया है। मंदिर परिसर के अंदर और आसपास के दुकानदारों को प्लास्टिक पैकेजिंग से बचते हुए पर्यावरण अनुकूल विकल्प अपनाने का निर्देश दिया गया है।
मंदिर प्रशासन को भी बांस की टोकरियां और पत्तों से बने पात्र उपलब्ध कराने तथा सूखे और गीले कचरे के लिए अलग-अलग रंग के डस्टबिन लगाने के निर्देश दिए गए हैं। एकत्रित कचरे को नगर निकायों को सौंपना अनिवार्य होगा।
थर्मोकोल और प्लास्टिक कटलरी पर भी रोक
नई गाइडलाइन के अनुसार थर्मोकोल और प्लास्टिक से बने कप, प्लेट, स्ट्रॉ, चाकू, कांटे और चम्मच के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। 120 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक कैरी बैग भी पूरी तरह प्रतिबंधित रहेंगे।
मंदिर प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह नियम केवल मंदिर परिसर तक ही सीमित न रहें, बल्कि आसपास के होटल, रेस्टोरेंट और दुकानदार भी इसका पालन करें। पत्तल, लकड़ी के चम्मच, कागज़ के स्ट्रॉ और कम्पोस्टेबल कटलरी जैसे विकल्प उपलब्ध कराना आवश्यक होगा।
जल प्रदूषण रोकने के लिए विशेष व्यवस्था
तालाबों और जलाशयों में नैवेद्य विसर्जन के लिए निर्धारित और घेराबंद क्षेत्र चिन्हित किए जाएंगे, ताकि बाद में पूजा सामग्री का उचित निपटान किया जा सके और जल प्रदूषण रोका जा सके। श्रद्धालुओं को निर्धारित डस्टबिन और विसर्जन स्थलों का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग करने के लिए जागरूकता अभियान भी चलाया जाएगा।
सामूहिक सहयोग की अपील
राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि मंदिर परिसरों की स्वच्छता और धार्मिक स्थलों की पवित्रता बनाए रखने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के लिए श्रद्धालुओं, दुकानदारों और मंदिर प्रशासन का सामूहिक सहयोग अत्यंत आवश्यक है। यह निर्णय धार्मिक आस्था और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
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