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Financial Rehabilitation: कर्ज का बोझ चिंता की नई लहर

  • financial rehabilitation यानी वित्तीय पुनर्बहाली न सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि पूरे समाज के लिए एक आवश्यक आवश्यकता

HEMANT KUMAR TIWARI
लेखक-हेमन्त कुमार तिवारी

इण्डो एशियन टाइम्स, भुवनेश्वर।

आज भारत की अर्थव्यवस्था चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, आम लोगों के जीवन की खुशहाली कर्ज के बढ़ते बोझ के कारण गंभीर संकट में है। देश में कर्ज का भार बढ़ता जा रहा है, खासकर क्रेडिट कार्ड बकाया और पर्सनल लोन जैसे गैर-गृह ऋणों में तेज़ी से वृद्धि ने वित्तीय तनाव को बढ़ाया है। ऐसे समय में financial rehabilitation यानी वित्तीय पुनर्बहाली न सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि पूरे समाज के लिए एक आवश्यक आवश्यकता बन चुका है।

RBI के आंकड़े बताते हैं चिंताजनक स्थिति

हाल ही में Reserve Bank of India की Financial Stability Report में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार भारत में घरेलू ऋण (household debt) की स्थिति चिंताजनक रूप से बढ़ी हुई है। मार्च 2025 तक घरेलू कर्ज देश की GDP का लगभग 41.3 प्रतिशत हो गया है, जो पिछले पांच साल के औसत से काफी ज्यादा है। इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण उपभोक्ता-उन्मुख ऋण जैसे पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड बकाया और अन्य गैर-हाउसिंग लोन हैं, जो कुल कर्ज का 55.3% हिस्सा बन चुके हैं।

अर्थात्, अब ज्यादा से ज्यादा लोग अपनी ख़रीदारी, दैनिक खर्च और आकस्मिक ज़रूरतों के लिए कर्ज़ पर निर्भर हो रहे हैं, वह भी बिना किसी संपत्ति के अवलंबन के। यही कारण है कि इस भागती हुई कर्ज व्यवस्था से financial stress तेजी से फैल रहा है।

हर व्यक्ति पर बढ़ता हुआ कर्ज़

RBI की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में व्यक्ति-विशेष कर्ज का औसत भार भी लगातार बढ़ रहा है। मार्च 2025 तक औसतन प्रत्येक भारतीय पर लगभग 4.8 लाख का कर्ज दर्ज किया गया, जो मार्च 2023 में 3.9 लाख था, यानी सिर्फ दो वर्षों में लगभग 23% की वृद्धि हुई है।

ये आंकड़े दर्शाते हैं कि भारतीय परिवारों, खासकर युवाओं पर वित्तीय दबाव पहले से कहीं ज़्यादा भारी हो रहा है। बढ़ती महंगाई, सीमित बचत और आसान ऋण उपलब्धता ने गैर-आवश्यक खर्चों और कर्ज़ के बीच एक मुश्किल संतुलन बना दिया है।

क्रेडिट कार्ड बकाया – तेजी से बढ़ता दबाव

क्रेडिट कार्ड का उपयोग अब सामान्य जीवन का हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसका दुष्परिणाम भी सामने आ रहा है। क्रेडिट कार्ड बकाया में भी बड़ी वृद्धि दर्ज हुई है। देश में समय से बिल न चुका पाने वाले खातों पर बकाया राशि एक साल में लगभग 44% बढ़कर 33,886 करोड़ तक पहुंच गई है। ये वे बकाया हैं जो 3 महीने से अधिक समय तक नहीं चुकाए गए, यानी Non-Performing Assets (NPA) का एक बड़ा हिस्सा बन चुके हैं।

क्रेडिट कार्ड का उपयोग अनियंत्रित रूप से बढ़ने से युवाओं को ऊंची ब्याज दरों और बढ़ती मासिक देनों के बोझ में फंसना पड़ता है, जिससे उनका दैनिक जीवन और बचत दोनों प्रभावित होते हैं।

पर्सनल लोन – आसान उपलब्धता, कठिन चुकौती

पर्सनल लोन भी तेजी से बढ़ रहे हैं, खासकर फिनटेक कंपनियों और NBFCs के ज़रिए। FY 2024–25 में फिनटेक कंपनियों द्वारा जारी किए गए पर्सनल लोन की संख्या लगभग 10.9 करोड़ तक पहुंच गई, जिनका कुल मूल्य 1,06,548 करोड़ रुपये से अधिक है। यह दर्शाता है कि आज हर वर्ग में लोन की मांग भारी है।

हालांकि यह लोन आसान और त्वरित वित्तीय सहायता प्रदान करता है, लेकिन इसके कारण ब्याज भार और EMI बोझ भी बढ़ता है, जिससे भुगतान की कठिनाइयाँ और वित्तीय तनाव उत्पन्न होते हैं।

स्थिति गंभीर, ज़रूरत Financial Rehabilitation की

इन आंकड़ों को देखने के बाद यह स्पष्ट होता है कि कर्ज केवल एक व्यक्तिगत समस्या नहीं रह गया है; यह अब राष्ट्रीय वित्तीय स्वास्थ्य का मामला बन चुका है। युवा वर्ग, मध्यम वर्ग और यहां तक कि उच्च आय वर्ग भी आज financial stress के दायरे में आ रहे हैं। इस कर्ज-उन्मुख अर्थव्यवस्था में, जहां आय बढ़ रही है पर बचत और निवेश घट रहे हैं, लोगों को आर्थिक पुनर्बहाली (financial rehabilitation) की आवश्यकता पहले से कहीं ज़्यादा महसूस हो रही है।

वित्तीय पुनर्बहाली का लक्ष्य होना चाहिए:

  1. ऋण पुनर्गठन और पुनर्वित्तीय सहायता: ज़िन लोगों का कर्ज़ बोझ बढ़ गया है, उन्हें ब्याज दरों में राहत, लचीले भुगतान विकल्प और कर्ज पुनर्गठन की सुविधा प्राप्त होनी चाहिए।
  2. शिक्षा और वित्तीय जागरूकता: युवाओं और कर्ज लेने वालों में वित्तीय अनुशासन, बजट प्रबंधन और कर्ज भुगतान के महत्व को समझाने के लिए बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान।
  3. निष्कर्षण नीतियां (Exit Policies) और समयबद्ध सहायता: क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन भुगतानों में कठिनाइयों से गुजर रहे लोगों को financial counseling और समयबद्ध कर्ज़ राहत कार्यक्रम मुहैया कराना।
  4. सख्त लेकिन संवेदनशील नीति: नीतिगत रूप से ऋणदाता और उधारकर्ता दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए एक संतुलनक नीति का निर्माण।

सरकार और RBI की भूमिका महत्वपूर्ण

आज यह आवश्यक है कि केंद्र सरकार, वित्त मंत्रालय और Reserve Bank of India मिलकर financial rehabilitation के लिए ठोस कदम उठाएं। विशिष्ट नीतियां बनाकर लगभग 20 लाख तक के सभी लोन को माफ कर दिया जाना चाहिए। इतना ही नहीं हर व्यक्ति को एक वित्तीय पैकेज दिए जाना मौजूदा परिस्थितियों की मांग है।

यदि देश सबसे बड़ा आर्थिक दृष्टिकोण हासिल कर सकता है, तो उसकी खुशहाली का आधार भी होना चाहिए- आर्थिक रूप से सुदृढ़ और तनाव-मुक्त नागरिक।

आज की वित्तीय चुनौतियों के समय में financial rehabilitation अब सिर्फ़ एक सुझाव नहीं, बल्कि एक आवश्यक कदम बन चुका है, ताकि भारत की युवा ऊर्जा और परिवार आज के आर्थिक दबाव से उबर कर एक स्वस्थ और खुशहाल भविष्य की ओर अग्रसर हो सके।

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