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स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जन्म शताब्दी महोत्सव का 21 अगस्त से शुभारंभ

भुवनेश्वर,   स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की जन्म शताब्दी के अवसर पर वर्षभर चलने वाले महोत्सव का शुभारंभ 21 अगस्त को तालचेर के गुरुजंगा में होगा। जन्म शताब्दी महोत्सव समिति, ओडिशा के अनुसार, अगस्त 2026 से नवंबर 2027 तक देशभर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। ओडिशा में करीब 25 हजार स्थानों पर महोत्सव मनाने की योजना है।

बुधवार को आयोजित संवाददाता सम्मेलन में समिति के अध्यक्ष स्वामी जीवनमुक्तानंदपुरी और संयोजक विनय कुमार भुइयां ने महोत्सव की विस्तृत रूपरेखा की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 21 अगस्त को उद्घाटन समारोह में कलश यात्रा, गो-पूजन, यज्ञ, नगर परिक्रमा, धर्मसभा, प्रसाद सेवन और शताब्दी कार्यकर्ताओं की बैठक आयोजित की जाएगी। शाम को गांव के विभिन्न स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, भजन संध्या, नृत्य, पाला तथा संतों के प्रवचन होंगे। साथ ही स्वामीजी के जीवन और आदर्शों पर आधारित प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी।

कार्यक्रम में संत ब्रह्मानंद सरस्वती, सच्चिदानंद महाराज, शिवदास बाबा, स्मृति सागर महाराज, जीवन चैतन्य महाराज, सच्चिदानंद दास महाराज, बाबाजी विश्वनाथ दास, श्रद्धानंद सरस्वती, अविनाश बाबा सहित अनेक संत-महात्माओं के उपस्थित रहने की बात कही गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र कार्यवाह दुर्गा प्रसाद साहू तथा राज्य के अन्य प्रमुख व्यक्तित्व भी कार्यक्रम में शामिल होकर मार्गदर्शन करेंगे।

वर्षभर होंगे विभिन्न कार्यक्रम

समिति के अनुसार, 23 अगस्त से 4 सितंबर तक गांवों और बस्तियों में श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की जाएंगी। अक्टूबर 2026 में चकापाद में संस्कृत सम्मेलन और जलेशपटा में महिला सम्मेलन होगा। नवंबर में संबलपुर, ब्रह्मपुर और भुवनेश्वर में क्रमशः तीन महासम्मेलनों का आयोजन किया जाएगा। इसके अलावा हरिद्वार, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोलकाता जैसे प्रमुख शहरों में भी बड़े समागम आयोजित किए जाएंगे।

जनवरी से अप्रैल 2027 तक गांवों और बस्तियों में संतों के नेतृत्व में जागरण यात्राएं निकाली जाएंगी। अप्रैल और मई में प्रखंड तथा शहर स्तर पर विशाल हिंदू सम्मेलनों का आयोजन प्रस्तावित है। महोत्सव का सिलसिला नवंबर 2027 तक जारी रहेगा।

समाजसेवा और शिक्षा के लिए समर्पित रहा जीवन

स्वामी जीवनमुक्तानंदपुरी ने कहा कि स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती ने संन्यासी जीवन के बावजूद केवल व्यक्तिगत साधना तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि देश और समाज सेवा को अपना जीवन समर्पित किया। उनके अनुसार, स्वामीजी ने किशोरावस्था में स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और 1962 के चीन तथा 1965 के पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान युद्ध प्रभावित लोगों की सेवा की।

उनके प्रयासों से कंधमाल में दो संस्कृत विद्यालय और दो महाविद्यालय तथा तुलसीपुर में एक उच्च विद्यालय की स्थापना हुई। उन्होंने महिलाओं के लिए रात्रि पाठशालाएं शुरू करने के साथ योग और व्यायाम को भी प्रोत्साहित किया। कंधमाल के कतिंगिया में आयुर्वेद स्वास्थ्य केंद्र तथा रायगढ़ा में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना में भी उनकी भूमिका बताई गई।

स्वामीजी ने जैविक कृषि और गोपालन को बढ़ावा दिया तथा स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण दिया। छोटे चेक डैम बनाकर सिंचाई की व्यवस्था, कृषि सहकारी समिति की स्थापना, जंगल संरक्षण और प्लास्टिक के उपयोग से बचने के लिए जनजागरूकता जैसे कार्य भी किए। उन्होंने घर-घर तुलसी लगाने, गांव-गांव में कीर्तन मंडलियां गठित करने तथा धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों को प्रोत्साहित किया। कंधमाल और गजपति में मंदिर निर्माण तथा महिलाओं की कीर्तन मंडलियों की स्थापना में भी उनका योगदान बताया गया।

गो-संरक्षण और धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका

समिति के पदाधिकारियों के अनुसार, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती ने 1966 में दिल्ली में करपात्रीजी महाराज के नेतृत्व में हुए गो-संरक्षण आंदोलन में भाग लिया और जेल गए। 1967 में ओडिशा में भी उन्होंने गो-संरक्षण आंदोलन का नेतृत्व किया और कारावास भुगता।

समिति ने कहा कि स्वामीजी ने धर्मांतरण के खिलाफ जनजागरूकता तथा अपने धर्म में वापस लौटने वाले लोगों के पुनर्वास के लिए भी कार्य किया। 2008 में जन्माष्टमी के दिन कंधमाल के जलेशपटा आश्रम में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार सहयोगियों की हत्या कर दी गई थी।

पांच संकल्पों को आगे बढ़ाने का आह्वान

जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर समिति ने स्वामीजी के जीवन और विचारों से प्रेरणा लेते हुए पांच संकल्पों को जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया है। इनमें धर्मांतरण रोकने के लिए जागरूकताघर-घर गोपालनवृक्षारोपणमां-माटी-मातृभाषा की रक्षा और भारतीय संस्कृति का संरक्षण शामिल हैं।

समिति के संयोजक विनय कुमार भुइयां ने लोगों से इन पांच संकल्पों को अपने जीवन और समाज में लागू करने तथा स्वामीजी के सेवा, संस्कार और सामाजिक जागरण के संदेश को आगे बढ़ाने की अपील की।

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