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बाहुड़ा यात्रा में उमड़ा आस्था का सैलाब

  •  महाप्रभु की एक झलक पाने को पुरी में जुटे लाखों श्रद्धालु

  •  ‘जय जगन्नाथ‘ के गगनभेदी जयघोष के बीच श्रीगुंडिचा मंदिर से श्रीमंदिर के लिए रवाना हुए तीनों रथ

  •  पहंडीछेरा पहंरा के बाद शुरू हुई रथ खींचने की परंपरा

पुरी। श्रीगुंडिचा मंदिर में नौ दिवसीय प्रवास पूर्ण करने के बाद महाप्रभु श्रीजगन्नाथभगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा शुक्रवार को पवित्र बाहुड़ा यात्रा के तहत अपने-अपने रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर की ओर रवाना हुए। “जय जगन्नाथ” के गगनभेदी जयघोषशंखध्वनि और भक्ति गीतों के बीच पुरी की बड़दांडा आस्था के महासागर में बदल गईजहां महाप्रभु के दर्शन और रथ खींचने के लिए लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा।

बाहुड़ा यात्रा की शुरुआत पारंपरिक पहंडी बीजे अनुष्ठान से हुई। महाप्रभु श्रीजगन्नाथभगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को सेवायतों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ उनके रथों पर विराजमान कराया। भगवान बलभद्र और श्रीजगन्नाथ को धाड़ी पहंडी‘ तथा देवी सुभद्रा व सुदर्शन को सुन्या पहंडी‘ के माध्यम से क्रमशः तलध्वजनंदीघोष और दर्पदलन रथ पर स्थापित किया गया।

इसके बाद गजपति महाराजाजिन्हें भगवान जगन्नाथ का प्रथम सेवक माना जाता हैने स्वर्ण झाड़ू से छेरा पहंरा अनुष्ठान संपन्न किया। यह परंपरा भगवान के समक्ष समानतासेवा और विनम्रता का संदेश देती है।

अनुष्ठानों के पूरा होने के बाद हजारों श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ तीनों विशाल रथों को रस्सियों से खींचकर श्रीजगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार की ओर बढ़ाया। समाचार लिखे जाने तक रथों की यात्रा जारी थी और बड़दांडा श्रद्धालुओं से खचाखच भरा हुआ था।

शरधाबली क्षेत्र शंखघंटोंमंजीरों और हरिनाम संकीर्तन से गूंज उठा। देश-विदेश से पहुंचे लाखों श्रद्धालुसेवायत और सुरक्षा बल इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक यात्रा के साक्षी बने।

बाहुड़ा यात्रा के दौरान दिन की शुरुआत प्रातः चार बजे गुंडिचा मंदिर में मंगला आरती से हुई। इसके बाद विभिन्न नीतियों के संपन्न होने पर दोपहर करीब 12 बजे पहंडी बीजे आरंभ हुआ। शाम करीब 4:37 बजे सबसे पहले भगवान बलभद्र का तलध्वज रथ रवाना हुआ। इसके बाद देवी सुभद्रा का दर्पदलन और अंत में महाप्रभु श्रीजगन्नाथ का नंदीघोष रथ श्रीमंदिर की ओर बढ़ा।

सिंहद्वार पहुंचने के बाद तीनों देवता रथों पर ही विराजमान रहेंगे। शनिवार को बहुप्रतीक्षित सुनाबेसा में महाप्रभु और उनके सहोदर स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत होंगेजबकि रविवार को अधरपणा अनुष्ठान आयोजित किया जाएगा। रथयात्रा महोत्सव का समापन 27 जुलाई को नीलाद्रि बीजे के साथ होगाजब तीनों देवता पुनः श्रीजगन्नाथ मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करेंगे।

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