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हाईकोर्ट की सख्ती के आगे झुकी ओडिशा सरकार

  •     14 साल बाद सेवानिवृत्त अधिकारी को आखिरकार मिला पेंशन लाभ

  •     वेतन रोकने और कलेक्टर की पेशी के आदेश के बाद हरकत में आया प्रशासन

कटक ओडिशा उच्च न्यायालय की लगातार सख्त टिप्पणियों और कड़े निर्देशों के बाद कलाहांडी जिले के एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी को सेवानिवृत्ति के लगभग 14 वर्ष बाद आखिरकार पेंशन का लाभ मिला है। मामले में अदालत ने एक समय दो वरिष्ठ अधिकारियों का वेतन रोकने का आदेश दिया था और जिला कलेक्टर की व्यक्तिगत उपस्थिति भी सुनिश्चित करने को कहा था।

कलाहांडी में जिला पंचायत अधिकारी के रूप में कार्यरत रहे सुरेंद्र कुमार चौबे नवंबर 2012 में सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें नियमित पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ नहीं मिले। वर्षों तक विभागीय स्तर पर समाधान नहीं मिलने पर उन्होंने अक्टूबर 2025 में न्याय के लिए ओडिशा उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति बिरजा प्रसन्न सतपथी ने राज्य सरकार से बार-बार जवाब मांगा कि आखिर बिना किसी स्पष्ट कारण के एक सेवानिवृत्त अधिकारी को इतने लंबे समय तक पेंशन लाभ से वंचित क्यों रखा गया।

फरवरी में अदालत ने चौबे द्वारा दाखिल शपथपत्र पर विचार किया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि उनके खिलाफ कोई विभागीय या अन्य जांच लंबित नहीं है। इसके बावजूद पेंशन और अन्य देय राशि का भुगतान नहीं किया गया था।

अप्रैल में अधिकारियों ने अदालत को बताया कि सेवा पुस्तिका (सर्विस बुक) के नियमितीकरण में देरी के कारण भुगतान नहीं हो सका। इस पर न्यायमूर्ति सतपथी ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि प्रशासनिक लापरवाही किसी कर्मचारी को लगभग 14 वर्षों तक पेंशन से वंचित रखने का आधार नहीं बन सकती। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि भुगतान में और देरी हुई तो कलाहांडी कलेक्टर को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ेगा।

मामले में 21 मई को अदालत ने और कड़ा रुख अपनाया। जब यह बताया गया कि विजिलेंस क्लीयरेंस का इंतजार किया जा रहा है, तब न्यायालय ने इसे अत्यधिक और अनुचित विलंब बताते हुए पंचायती राज विभाग के निदेशक और कलाहांडी कलेक्टर का वेतन रोकने का आदेश दिया। साथ ही पुलिस अधीक्षक को अगली सुनवाई में कलेक्टर की उपस्थिति सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया गया।

हाईकोर्ट की सख्ती का असर जल्द दिखाई दिया। 17 जून को राज्य सरकार ने अदालत को सूचित किया कि सुरेंद्र कुमार चौबे की पेंशन 1 दिसंबर 2012 से प्रभावी मानते हुए स्वीकृत कर दी गई है। इसके बाद अदालत ने अधिकारियों का वेतन रोकने संबंधी आदेश वापस ले लिया, लेकिन यह भी पूछा कि क्या सभी बकाया और वर्तमान देय राशि का पूर्ण भुगतान कर दिया गया है।

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई जुलाई में निर्धारित की है, जिसमें यह सुनिश्चित किया जाएगा कि चौबे को मिलने वाली सभी वैधानिक बकाया राशि का भुगतान पूरी तरह कर दिया गया है या नहीं।

हाल के वर्षों में ओडिशा उच्च न्यायालय कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि पेंशन कोई दया या अनुग्रह नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 300ए के तहत संरक्षित एक वैधानिक और संपत्ति संबंधी अधिकार है। अदालत ने ऐसे मामलों में अनावश्यक देरी होने पर ब्याज सहित भुगतान के निर्देश भी दिए हैं।

यह मामला एक बार फिर सरकारी तंत्र में लंबित पेंशन मामलों और प्रशासनिक उदासीनता पर सवाल खड़ा करता है, जहां एक सेवानिवृत्त अधिकारी को अपने वैध अधिकार के लिए 14 वर्षों तक इंतजार करना पड़ा और अंततः न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ही राहत मिल सकी।

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