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कुशासन की नींव पर खड़ी शिकायतों की भीड़ उपलब्धियों का ताज
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महान वैज्ञानिक न्यूटन बने ‘महान पायलट’
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कर्नाटक पहुंची ओडिशा विधानसभा
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कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को 1,678 गलतियों वाली किताबें देने वाले मास्टर साहब की जय हो…
हेमन्त कुमार तिवारी, भुवनेश्वर।
ओड़िया अस्मिता, भाषा, संस्कृति और गौरव के नाम पर सत्ता तक पहुंची भाजपा सरकार आज अपने दो वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रही है। सरकारी मंचों पर उपलब्धियों की गाथा सुनाई जा रही है, विकास का ढोल पीटा जा रहा है और जनकल्याण के दावों की मालाएं गूंथी जा रही हैं। लेकिन इसी उत्सव के बीच शिक्षा विभाग की एक ऐसी उपलब्धि सामने आई है, जिसे शायद इतिहास लंबे समय तक याद रखेगा-कक्षा 1 से 8 तक की पाठ्यपुस्तकों में 1,678 गलतियां।
ऐसे में सरकार के दो साल पूरे होने पर शायद सबसे पहले शिक्षा विभाग को बधाई देनी चाहिए। आखिर हर सरकार अपने कार्यकाल में कुछ न कुछ नया करती है। किसी ने सड़क बनाई, किसी ने पुल बनाया, लेकिन ओडिशा की वर्तमान व्यवस्था ने बच्चों के लिए ऐसी पाठ्यपुस्तकें तैयार कर दीं जिनमें तथ्य, तस्वीरें, नाम और जानकारियां तक भटक गईं। महान वैज्ञानिक न्यूटन को महान पायलट बना देने की चर्चा हो रही है, ओडिशा विधानसभा कर्नाटक पहुंच गई है, और ओडिशा की पहचान से जुड़े अनेक तथ्य अपनी वास्तविक जगह छोड़कर कहीं और जा पहुंचे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस सरकार ने ओड़िया अस्मिता को अपनी राजनीति का सबसे मजबूत स्तंभ बनाया, उसी सरकार के कार्यकाल में ओडिशा के इतिहास, भूगोल और संस्थाओं से जुड़ी बुनियादी जानकारियां तक सुरक्षित नहीं रह सकीं। यदि ओडिशा विधानसभा की तस्वीर तक सही नहीं पहचानी जा सकी, तो फिर ओड़िया गौरव की रक्षा के दावों का मूल्यांकन किस पैमाने पर किया जाए?
विडंबना यह भी है कि ये गलतियां किसी गोदाम में बंद किताबों में नहीं मिलीं। ये किताबें पहले ही लाखों विद्यार्थियों तक पहुंच चुकी हैं। बच्चे इन्हें पढ़ रहे हैं, याद कर रहे हैं और परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। अब सरकार सुधार सूची जारी कर रही है। यानी पहले गलत पढ़ाओ, फिर बताओ कि यह गलती थी। पहले भ्रम पैदा करो, फिर स्पष्टीकरण दो। शिक्षा का शायद इससे अधिक अनोखा मॉडल कहीं और देखने को न मिले।
अब कक्षा का दृश्य भी बदला-बदला नजर आएगा। शिक्षक गणित, विज्ञान और भाषा पढ़ाने से पहले यह बताएंगे कि किताब में क्या गलत है। विद्यार्थी अध्याय शुरू करने से पहले यह जानेंगे कि कौन-सा तथ्य सही है और कौन-सा नहीं। यदि कोई गलती शिक्षक की नजर से छूट गई तो उसका परिणाम वर्षों तक बच्चे के ज्ञान में दिखाई देगा। लेकिन उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? यह सवाल आज भी अनुत्तरित है।
1,678 गलतियां केवल एक संख्या नहीं है। यह संख्या शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली, गुणवत्ता नियंत्रण और जवाबदेही पर लगा हुआ बड़ा 1,678 प्रश्नचिह्न है। सवाल यह भी है कि आखिर लेखक कौन थे? संपादक कौन थे? विषय विशेषज्ञ कौन थे? समीक्षा समिति में कौन लोग बैठे थे? अंतिम स्वीकृति किसने दी? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न-क्या किसी ने इन पुस्तकों को छपने से पहले पढ़ा भी था?
यदि किसी विद्यार्थी की उत्तरपुस्तिका में इतनी गलतियां मिलतीं तो उसे बिना किसी बहस के अनुत्तीर्ण घोषित कर दिया जाता। लेकिन जब लाखों बच्चों के हाथों में 1,678 गलतियों वाली किताबें पहुंचा दी गईं, तब जिम्मेदार लोगों को केवल स्पष्टीकरण देने का अवसर क्यों मिलना चाहिए? क्या बच्चों के भविष्य के साथ इस स्तर के खिलवाड़ को केवल ‘मानवीय भूल’ कहकर टाला जा सकता है?
आज जब सरकार अपने दो वर्ष पूरे होने पर आत्ममुग्धता के उत्सव में डूबी हुई है, तब अभिभावक पूछ रहे हैं कि आखिर उनके बच्चों को गलत जानकारी देने का अधिकार किसने दिया? क्या करदाताओं के पैसे से तैयार हुई इन पुस्तकों के लिए कोई जवाबदेही तय होगी? क्या संबंधित प्रकाशक को ब्लैकलिस्ट किया जाएगा? क्या लेखक, संपादक, विषय विशेषज्ञ और जिम्मेदार अधिकारियों को भविष्य में किसी भी शैक्षणिक सामग्री के निर्माण से आजीवन प्रतिबंधित किया जाएगा? या फिर यह मामला भी कुछ दिनों की चर्चा के बाद फाइलों में दफन हो जाएगा?
सरकार के दो साल पूरे होने पर अनेक उपलब्धियों की सूची गिनाई जा रही है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था की यह शर्मनाक चूक उन सभी दावों पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है। क्योंकि किसी भी सरकार का मूल्यांकन केवल उसके विज्ञापनों से नहीं होता, बल्कि इस बात से होता है कि वह आने वाली पीढ़ी को क्या दे रही है।
फिलहाल ओडिशा के लाखों विद्यार्थियों के हाथों में 1,678 गलतियों वाली किताबें हैं। ऐसे में सरकार के दो साल पूरे होने पर जनता बस इतना ही कह रही है-“मास्टर साहब की जय हो! पहले बच्चों को गलत पढ़ाओ, फिर सुधार सूची बांटो, और उसके बाद उपलब्धियों का उत्सव मनाओ।”
इतना ही नहीं, जन सुनावाई कार्यक्रम में शिकायत लेकर पहुंचने वाली भीड़ को देखकर मास्टर साहब इतरा रहे हैं कि यह उनके शासन की सफलता है, जब कि मास्टर साहब यह नहीं पढ़ पा रहे हैं कि कुशासन से परेशान लोग फरियाद लेकर यहां आ रहे हैं। अगर सभी शिकायतें सीएम सुनेंगे, तो जमीन स्तर पर अधिकारीगण क्या क्या करें?
लेकिन इतिहास शायद इसे उपलब्धि नहीं, बल्कि ओड़िया अस्मिता, शिक्षा व्यवस्था और बच्चों के भविष्य पर लगे एक ऐसे दाग तथा शासन के विफलता के रूप में याद रखेगा, जिसे मिटाना आसान नहीं होगा मास्टर साहब।
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