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Panch pyare हिम्मत राय हिम्मत सिंह
प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार-सिख हीरो)

खालसा पंथ निर्माण में ओडिशा की ऐतिहासिक भूमिका

पणा संक्रांति (बैसाखी) पर विशेष 

‘पाँच प्यारे’ में से एक हमारे पुरी के हिम्मत राय भी थे। गुरु जी ने इन्हीं पाँच रणबांकुरो से खालसा पंथ की स्थापना कर दी। इन्हें अमृतपान करवाया। इन्हें सिंह बना दिया। अब हिम्मत राय हिम्मत सिंह हो गये। 7 दिसम्बर 1705 को पंजाब के चमकौर साहिब में गुरू गोविन्द सिंह जी के नेतृत्व में मुगलों से लोहा लेते हुए पुरी के हिम्मत सिंह ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना बलिदान दे दिया।

लेखक-डा समन्वय नंद, भुवनेश्वर

dr samnway nand

पणा संक्रांति को ओडिशा में नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। इसलिए इसका बहुत सामाजिक सांस्कृतिक महत्व है, लेकिन पणा संक्रांति का ऐतिहासिक महत्व का एक दूसरा कारण भी है जिसे आजकल ओडिशा ने कुछ सीमा तक भुला दिया है। इतिहास के विद्यार्थी जानते हैं कि आज से लगभग तीन सौ पच्चीस साल पहले 1699 में पणा संक्रांति (जिसे पंजाब में वैशाखी कहा जाता है) के दिन सप्त सिन्धु क्षेत्र में सतलुज नदी के किनारे एक विशाल राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन हुआ था।

यह आयोजन दशगुरु परम्परा के दशम गुरु श्री गोविन्द राय ने किया था। मध्य एशिया से आए आक्रमणकारी मुगलों ने देश पर कब्जा किया हुआ था। औरंगज़ेब का शासन था। वह भारतीयों को बलपूर्वक इस्लाम पंथ में मतान्तरित कर रहा था। पुरी में जगन्नाथ मंदिर भी अनेक बार इन्हीं विदेशी हमलावरों का शिकार हुआ था। श्रीश्री जगन्नाथ जी को किसी तरह जान हथेली पर रखकर यहां के लोगों ने मंदिर से बाहर निकाल कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया था। मंदिर की आरती और दूसरे कर्मकांड अवरुद्ध हो गए थे। उन दिनों ही दशगुरु परम्परा के प्रथम गुरू श्री नानक देव जी पुरी आए थे। तब उन्होंने कहा था जगन्नाथ जी की आरती को कौन रोक सकता है? यह सारी प्रकृति ही तो जगन्नाथ जी की आरती गा रही है। आकाश के तारे जगन्नाथ जी के आगे जल रहे दीपक हैं। मलयानल से आने वाली सुगन्धित वायु जगन्नाथ जी के आगे जल रहा धूप है। उन्हीं गुरू नानक देव की परम्परा के दशम गुरू गोविन्द राय ने देशभर के युवाओं को देश और धर्म की रक्षा की रणनीति बनाने के लिए पंजाब में बुलाया था।

उनका यह संदेश ओडिशा तक भी पहुँचा था। सारे पूर्व में नई हलचल होने लगी थी। ओडिशा में भी गुरु जी का यह संदेश गांव गांव में पहुँच रहा था। देश और धर्म की रक्षा के लिए मुग़लों को भगाने का अवसर आ गया था। सारे देश को एकजुट होना है। युवाओं में नया जोश भर रहा था। जगन्नाथ पुरी में भी हलचल होने लगी थी। पुरी में जगन्नाथ जी के लिए पानी लाने सेवा के लिए नित्य प्रति कुंए से पानी निकालने का पावन कार्य करने वाले हिम्मत राय ने इस राष्ट्रीय सम्मेलन में जाने का निर्णय कर लिया। और भी अनेक युवा वहां जाने का मन बना चुके थे। पूरे ओडिशा से अनेक युवा अलग अलग जत्थों में पंजाब की ओर जा रहे थे। लेकिन एक ध्यान रखा जा रहा था। मुगल शासकों और उनके जासूसों को कानों कान ख़बर न हो। हिम्मत राय और उसके साथी भी चल पड़े। वे जगन्नाथ मंदिर में आए। माथा निभाया। नई शक्ति का संचार हुआ। जय जगन्नाथ !! लेकिन कल जगन्नाथ जी के लिए मंदिर से पानी कौन निकालेगा? हिम्मत राय ने स्वयं ही उत्तर दिया। जगन्नाथ जी व्यवस्था स्वयं कर लेंगे।

अब जगन्नाथ का आदेश पंजाब में होने वाले इस राष्ट्रीय यज्ञ में जाने का ही है। महीनों लम्बी यात्रा थी। यह कठिन यात्रा कर किसी तरह हिम्मत राय अपने साथियों सहित पंजाब में शिवालिक के चरणों में बहती सतलुज के किनारे वैशाखी से कुछ दिन पहले ही पहुँच गए थे। देश के कोने कोने से लोग आ रहे थे। गुरू जी सभी के साथ मंत्रणा कर रहे थे। हर क्षेत्र के लोग अपने अपने क्षेत्रों मुगलों के अत्याचारों की कथाएं सुना रहे थे। मंदिर कोड़े जा रहे थे। ओडिशा के लोगों से ज्यादा इस बात को कौन जानता था। हिम्मत राय का ख़ून खौलने लगता था। हिम्मत राय ने गोविन्द राय जी का नाम तो बहुत सुना था लेकिन उनके दर्शन पहली बार किए थे। सप्त सिन्धु क्षेत्र की ख़बरें छन छन कर पुरी भी पहुंचती रहती थीं। अनेक लोग जाट, बलोच, सिन्धी, पश्तून पुरी में सदियों पहले जगन्नाथ पुरी आते रहते थे से आते रहे थे। उन दिनों बलोच और पश्तून भी भगवान बुद्ध के उपासक थे।

गुरू नानक देव की चर्चा तो अब जगन्नाथ मंदिर के इतिहास का हिस्सा बन गया था। गोविन्द राय जी के चेहरे के तेज को देख कर हिम्मत राय को विश्वास होने लगा था कि ये देश को मुगलों से आज़ाद करवा सकते हैं। पणा संक्रांति (वैसाखी) के दिन गोविन्द राय जी देश भर से उमड़ी इस युवाओं की भीड़ को सम्बोधित करने के लिए मंच पर आए। मानों नया सूर्य उग आया हो। अग्नि देव स्वयं ही प्रकट हो गए हों।

गुरु जी अपनी खड्ग हाथ में लेकर गरजे कि क्या कोई देश और धर्म की रक्षा के लिए मातृभूमि को अपने प्राण अर्पित करने के लिए तैयार है? गुरु जी की यह सिंह गर्जना सुन कर सन्नाटा छा गया था। फिर एक एक कर पूरे देश भर से पाँच रणबाँकुरे मातृभूमि के लिए अपने प्राण देने के लिए मंच पर आ गए। इतिहास में यही गुरु जी के ‘पाँच प्यारे’ कहलाए।

इनमें से एक हमारे पुरी के हिम्मत राय भी थे। जय जगन्नाथ। गुरु जी ने इन्हीं पाँच रणबांकुरो से खालसा पंथ की स्थापना कर दी। इन्हें अमृतपान करवाया। इन्हें सिंह बना दिया। अब हिम्मत राय हिम्मत सिंह हो गये और गुरु जी स्वयं भी गोविन्द राय से गोविन्द सिंह हो गए। गुरु जी ने पूरे देश में नई चेतना जगा दी थी। जाति पाति को भूल कर सारे देश को एक होना है तभी मातृभूमि को मुगलों से मुक्त करवाया जा सकता है। पंजाब में देश भर से एकत्रित हुए युवा गुरु जी का यह संदेश देने अपने अपने क्षेत्रों ओर चल पड़े। हिम्मत सिंह के साथ पुरी से गए युवा भी वापस जाने की तैयारी करने लगे, लेकिन अब हिम्मत सिंह वापीस नहीं लौटेंगे। अब उसके कन्धों पर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी आ गई थी। देश को विदेशी मुगलों के कब्जे से आज़ाद करवाने की ज़िम्मेदारी। सभी ने गीली आँखों से विदा ली। जय जगन्नाथ। 7 दिसम्बर 1705 को पंजाब के चमकौर साहिब में गुरू गोविन्द सिंह जी के नेतृत्व में मुगलों से लोहा लेते हुए पुरी के हिम्मत सिंह ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना बलिदान दे दिया। जय जगन्नाथ। लेकिन ओडिशा अपने इस बहादुर सपूत को शायद भूल गया। आज उस की स्मृति को समस्त ओडिया समाज का नमन।

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