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जय जगन्नाथ के जयघोष से गूंजा श्रीक्षेत्र
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पहंडी बिजे, छेरा पहंरा और रथारोहण के दिव्य अनुष्ठानों के बीच लाखों श्रद्धालुओं ने किए महाप्रभु के दर्शन
पुरी। पुरीधाम में आयोजित विश्वविख्यात श्रीजगन्नाथ रथयात्रा-2026 दिव्य भक्ति में सराबोर रही। 15 जुलाई की शाम से हो रही मूसलाधार वर्षा और गुरुवार को दिनभर जारी बारिश भी महाप्रभु के भक्तों की आस्था को तनिक भी डिगा नहीं सकी। ओडिशा ही नहीं, बल्कि देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र तथा देवी सुभद्रा के दिव्य दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते रहे।
मानो स्वयं इंद्रदेव भगवान जगन्नाथ की इस विश्वव्यापी यात्रा में पुष्पों के स्थान पर वर्षा की बूंदों से अभिषेक कर रहे हों। भक्तों के लिए यह वर्षा कोई बाधा नहीं, बल्कि महाप्रभु का प्रसाद और दिव्य आशीर्वाद बन गई। चारों ओर “हरि बोल”, “जय जगन्नाथ” और महिलाओं के मंगलमय हुलहुली स्वर से पूरा श्रीक्षेत्र भक्तिरस में डूब गया।
प्रातःकाल से ही श्रीमंदिर में वैदिक विधि-विधान और शताब्दियों पुरानी परंपराओं के अनुसार रथयात्रा के अनुष्ठान आरंभ हुए। भोगमंडप में धूप नीति के बाद देवताओं की यात्रा की तैयारियां पूरी की गईं। इसके उपरांत भगवानों की दिव्य पहंडी बिजे की रस्म आरंभ हुई।
सबसे पहले भगवान के सुदर्शन चक्र को देवी सुभद्रा के दर्पदलन (देवदलन) रथ पर विराजमान कराया गया। इसके बाद भगवान बलभद्र की भव्य पहंडी संपन्न हुई और वे अपने तालध्वज रथ पर विराजित हुए। फिर देवी सुभद्रा को उनके रथ पर स्थापित किया गया।
इसके बाद वह अलौकिक क्षण आया, जिसका करोड़ों श्रद्धालु पूरे वर्ष प्रतीक्षा करते हैं। श्रीमंदिर के सिंहद्वार से भगवान जगन्नाथ अपने विशाल और मनोहारी ताहिया धारण कर झूमते हुए बाहर आए। घंटा, काहली, मर्दल और शंखध्वनि के बीच महाप्रभु की दिव्य चाल ने भक्तों को भावविभोर कर दिया। “जय जगन्नाथ” और “हरिबोल” के गगनभेदी उद्घोष के बीच बड़दांड सचमुच आस्था के महासागर में परिवर्तित हो गया।
अनेक सांस्कृतिक दलों ने भगवान के स्वागत में पारंपरिक प्रस्तुतियां दीं। विशेष रूप से ओडिसी नृत्यांगनाओं ने वर्षा के बीच नृत्य प्रस्तुत कर यह संदेश दिया कि जब हृदय में भगवान के प्रति प्रेम हो, तब कोई भी परिस्थिति साधना और सेवा में बाधा नहीं बन सकती।
चारों धामों के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने भी रथों पर विराजमान चतुर्धामूर्ति के दर्शन कर श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक संदेश दिया। इसके पश्चात पुरी के गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव ने सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार छेरा पहंरा अनुष्ठान संपन्न किया। श्वेत वस्त्र धारण कर रजत पालकी में पहुंचे गजपति महाराजा ने स्वर्ण झाड़ू से तीनों रथों की सफाई की तथा सुगंधित जल और चंदन मिश्रित पवित्र जल का छिड़काव किया।
छेरा पहंरा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति का महान संदेश है कि भगवान के समक्ष सभी समान हैं। यहां राजा और सामान्य जन के बीच कोई भेद नहीं रहता। यही श्रीजगन्नाथ संस्कृति की समरसता, समानता और लोककल्याण की भावना का मूल स्वरूप है।
सभी धार्मिक अनुष्ठानों के पूर्ण होने के बाद भक्तों की वर्षों की प्रतीक्षा समाप्त हुई और रथों को खींचने का शुभारंभ हुआ। सबसे पहले भगवान बलभद्र का तालध्वज रथ, उसके बाद देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ तथा अंत में भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ लाखों श्रद्धालुओं के हाथों और “जय जगन्नाथ” के गगनभेदी जयघोष के बीच गुंडिचा मंदिर की ओर अग्रसर हुआ। रस्सियों को स्पर्श करना भी भक्त अपने जीवन का परम सौभाग्य मानते रहे।
रथयात्रा के सफल आयोजन के लिए प्रशासन ने भी व्यापक तैयारियां की थीं। लगभग 13 हजार सुरक्षाकर्मियों के साथ राज्य पुलिस, केंद्रीय सुरक्षा बल, भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल को तैनात किया गया था। भीड़ नियंत्रण, यातायात व्यवस्था, चिकित्सा सेवाओं और जलभराव से निपटने के विशेष प्रबंध किए गए, जिससे प्रतिकूल मौसम के बावजूद सभी अनुष्ठान परंपरा और मर्यादा के अनुरूप संपन्न हो सके।
जयघोष के बीच शुरू हुआ रथों का खींचना
अनुष्ठानों के पूर्ण होने के बाद रथों का खींचना प्रारंभ हुआ। “जय जगन्नाथ” और “हरिबोल” के जयघोष के बीच सबसे पहले भगवान बलभद्र का तालध्वज रथ खींचा गया। इसके बाद देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ और अंत में भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ श्रद्धा और भक्ति के साथ खींचा गया।
कड़ी सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक तैयारी
इस विशाल आयोजन के सफल संचालन के लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। करीब 13,000 सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया, जिनमें राज्य पुलिस, केंद्रीय बल, भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल शामिल थे।
भीड़ नियंत्रण, यातायात प्रबंधन और आपातकालीन सेवाओं पर विशेष ध्यान दिया गया। प्रशासन ने जलभराव की समस्या से निपटने के लिए भी विशेष इंतजाम किए, जिससे रथ यात्रा मार्ग पर सुचारु रूप से आयोजन हो सके।
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