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पूर्व आईएएस अधिकारी जगन्नाथ प्रसाद दास ने 90 साल में ली अंतिम सांस
भुवनेश्वर। ओड़िया साहित्य जगत के प्रख्यात कवि, नाटककार, कला इतिहासकार, अनुवादक तथा पूर्व आईएएस अधिकारी जगन्नाथ प्रसाद दास (जेपी दास) का बुधवार रात भुवनेश्वर स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। वह 90 वर्ष के थे।
उनके निधन से ओडिशा ने साहित्य, संस्कृति, कला और लोक प्रशासन के क्षेत्र में योगदान देने वाली अपनी एक विशिष्ट एवं सम्मानित विभूति को खो दिया है। जेपी दास उन विरले व्यक्तित्वों में थे, जिन्होंने प्रशासनिक सेवा और रचनात्मक साहित्य दोनों क्षेत्रों में समान रूप से अपनी अमिट छाप छोड़ी।
भीषण अकाल में राहत कार्यों का किया था प्रभावी संचालन
26 अप्रैल 1936 को पुरी जिले में जन्मे जेपी दास ने वर्ष 1958 में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में प्रवेश किया। अपने प्रशासनिक जीवन के दौरान उन्होंने वर्ष 1965-66 के भीषण अकाल और सूखे के समय कलाहांडी के जिलाधिकारी के रूप में राहत कार्यों के प्रभावी संचालन से व्यापक प्रशंसा अर्जित की।
सृजनात्मक गतिविधियों के लिए नौकरी छोड़ी
वर्ष 1984 में अपने प्रशासनिक करियर के उत्कर्ष पर रहते हुए उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर स्वयं को पूर्णतः साहित्य और सृजनात्मक गतिविधियों के लिए समर्पित कर दिया। इसके बाद वे आधुनिक ओड़िया साहित्य के प्रमुख स्तंभों में शामिल हो गए और अपनी वैचारिक गहराई, नवोन्मेषी लेखन शैली तथा सांस्कृतिक दृष्टि के लिए व्यापक सम्मान प्राप्त किया।
प्रतिष्ठित सरस्वती सम्मान से सम्मानित
उनके प्रमुख काव्य संग्रहों में प्रथम पुरुष, अह्निक और परिक्रमा शामिल हैं, जिन्हें आधुनिक ओड़िया कविता की महत्वपूर्ण कृतियों में गिना जाता है। साहित्य के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2006 में प्रतिष्ठित सरस्वती सम्मान से सम्मानित किया गया था।
ऐतिहासिक रहा उपन्यास देश काल पात्र
अपने सिद्धांतों के प्रति अडिग रहने वाले जेपी दास ने वर्ष 1990 में साहित्य अकादमी पुरस्कार स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। कविता के अलावा उन्होंने सूर्यास्त पूर्वरु और सुंदरा दास जैसे प्रयोगधर्मी एवं आधुनिक नाटकों के माध्यम से ओड़िया रंगमंच को नई दिशा दी। उनका ऐतिहासिक उपन्यास देश काल पात्र ओड़िया साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों में माना जाता है।
ओड़िया साहित्य को कई भाषाओं के पाठकों तक पहुंचाया
साहित्यकारों के हितों के लिए सदैव सक्रिय रहने वाले जेपी दास ने पोएट्री सोसाइटी (इंडिया) की स्थापना की और 14 वर्षों तक इसके अध्यक्ष रहे। एक द्विभाषी लेखक और कुशल अनुवादक के रूप में उन्होंने ओड़िया साहित्य को स्वीडिश, उर्दू, फ्रेंच और अंग्रेजी सहित विभिन्न भाषाओं के पाठकों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चित्रकार और कला इतिहास के विद्वान भी थे जेपी
जेपी दास एक कुशल चित्रकार और कला इतिहास के विद्वान भी थे। ओडिशा की कलात्मक विरासत पर उनकी पुस्तकें पुरी पेंटिंग्स (1982) और पाम-लीफ मिनिएचर्स (1991) आज भी शोधकर्ताओं और कला अध्येताओं के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती हैं।
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