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पांडुलिपि विज्ञान कार्यशाला का शुभारंभ
भुवनेश्वर। किसी राष्ट्र की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं, राजनीतिक इतिहास या आर्थिक समृद्धि से नहीं होती, बल्कि उसकी संरक्षित ज्ञान परंपरा, सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक विरासत से निर्धारित होती है। पांडुलिपियाँ और प्राचीन ग्रंथ इस विरासत के सबसे प्रामाणिक एवं जीवंत दस्तावेज हैं। यह बात प्रख्यात पांडुलिपि विशेषज्ञ तथा राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के पूर्व निदेशक प्रोफेसर डॉ प्रफुल्ल कुमार मिश्र ने पांडुलिपि विज्ञान (मैन्युस्क्रिप्टोलॉजी) विषयक कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर कही।
ओडिशा वर्चुअल अकादमी द्वारा आयोजित इस कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए अकादमी के सचिव डॉ प्रदीप कुमार राउत ने कहा कि कार्यक्रम का उद्देश्य पांडुलिपि संसाधनों की पहचान, सर्वेक्षण, संरक्षण, डिजिटलीकरण, वर्णनात्मक सूचीकरण, संपादन, प्रकाशन तथा अनुसंधान को प्रोत्साहित करना है।
मुख्य वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ पांडुलिपि विद्वान प्रोफेसर हरेकृष्ण मिश्र ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का संरक्षण और संवर्धन पांडुलिपियों के समुचित अध्ययन, पठन और व्याख्या के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने कहा कि इस कार्यशाला का उद्देश्य केवल पांडुलिपियों के बारे में सामान्य जानकारी प्रदान करना नहीं, बल्कि पांडुलिपि अध्ययन को एक सुव्यवस्थित शैक्षणिक अनुशासन के रूप में स्थापित करना है।
कार्यशाला के पाठ्यक्रम निदेशक तथा राजधानी कॉलेज के संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रोफेसर विभूति भूषण महापात्र ने बताया कि कार्यक्रम में पांडुलिपि विज्ञान, पुरालिपि विज्ञान (पेलियोग्राफी), कोडिकोलॉजी, पाठ-वाचन एवं पाठ-व्याख्या, पाठालोचना, आलोचनात्मक संपादन, वर्णनात्मक सूची निर्माण, डिजिटल संरक्षण तथा अनुसंधान पद्धति जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर प्रशिक्षण दिया जाएगा।
ओडिशा वर्चुअल अकादमी की ओर से वरिष्ठ प्रबंधक स्मृति रंजन मिश्र ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन देवानंद भंज ने किया, जबकि श्रीनिवास मिश्र एवं अन्य तकनीकी विशेषज्ञों ने सहयोग प्रदान किया।
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