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भुवनेश्वर में आयोजित संवाद कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने साझा किए समाधान
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बढ़ते ताप संकट को केवल मौसम नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और शासन से जुड़ी चुनौती बताया
भुवनेश्वर। प्रेस क्लब ऑफ ओडिशा, सोक्रेटस फाउंडेशन फॉर कलेक्टिव विजडम, ओडिशा एनवायरनमेंट कांग्रेस और असर सोशल इम्पैक्ट एडवाइजर्स की ओर से भुवनेश्वर में हीटवेव, स्वास्थ्य जोखिम और मौसम रिपोर्टिंग विषय पर एक संवादात्मक कार्यशाला आयोजित की गई।
कार्यक्रम में पत्रकारों, जलवायु विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों और मीडिया प्रतिनिधियों ने भाग लेकर बढ़ती गर्मी, स्वास्थ्य जोखिमों और जिम्मेदार रिपोर्टिंग की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की।
हीटवेव को बहुआयामी संकट के रूप में देखने की जरूरत
कार्यक्रम की शुरुआत एएसएआर सोशल इम्पैक्ट एडवाइजर्स के विराट सिंह और सोक्रेटस फाउंडेशन के सिद्धांत ने की। उन्होंने कहा कि हीटवेव को केवल मौसम की घटना के रूप में नहीं, बल्कि जलवायु, स्वास्थ्य, आजीविका और प्रशासन से जुड़ी जटिल चुनौती के रूप में समझने की आवश्यकता है।
कार्यशाला में दो तकनीकी सत्र और एक विशेष परिचर्चा आयोजित की गई, जिसमें मौसम विज्ञान, जलवायु शासन, जनस्वास्थ्य और मीडिया क्षेत्र के विशेषज्ञों ने भाग लिया।
अत्यधिक गर्मी से शरीर पर पड़ता है गंभीर असर
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान भुवनेश्वर के प्रोफेसर देबदत्त स्वाईं ने हीटवेव की वैज्ञानिक समझ पर प्रकाश डालते हुए वास्तविक तापमान और महसूस होने वाले तापमान के अंतर को समझाया। उन्होंने बताया कि लंबे समय तक अत्यधिक गर्मी के संपर्क में रहने से शरीर की स्वयं को ठंडा रखने की क्षमता प्रभावित होती है।
उन्होंने कहा कि शरीर को ठंडा करने के प्रयास में हृदय अधिक रक्त पंप करता है, जिससे धड़कन बढ़ने और हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने वेट बल्ब तापमान और ड्राई बल्ब तापमान के अंतर को भी स्पष्ट किया तथा कहा कि गर्मी के धीमे और संचयी स्वास्थ्य प्रभावों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
शहरीकरण से बढ़ रहा तापमान
ऑरास्योर के डॉ आशुतोष आचार्य ने आंकड़ों और दृश्य प्रस्तुतीकरण के माध्यम से बताया कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और कंक्रीटीकरण के कारण भुवनेश्वर के विभिन्न वार्डों में तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उन्होंने “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव की चर्चा करते हुए कहा कि पत्रकार आंकड़ों, दृश्य तकनीकों और स्थानीय कहानियों के माध्यम से लोगों तक गर्मी से जुड़े जोखिमों को बेहतर तरीके से पहुंचा सकते हैं।
हीट एक्शन प्लान को समुदाय आधारित बनाने पर जोर
परिचर्चा में भारतीय मौसम विभाग भुवनेश्वर की निदेशक मनोरमा मोहंती, डेवलपमेंट एंड एनवायरनमेंट फ्यूचर्स ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ अरविंद मिश्र तथा वरिष्ठ पत्रकार भवानी त्रिपाठी ने भाग लिया। परिचर्चा का संचालन अनुज दास ने किया।
विशेषज्ञों ने कहा कि हीट एक्शन प्लान केवल तापमान आधारित दस्तावेज नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे जलवायु-स्वास्थ्य जोखिम प्रबंधन ढांचे के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। उन्होंने स्थानीय समुदायों, पंचायतों, विश्वविद्यालयों, युवा समूहों और सामाजिक संगठनों को इस प्रक्रिया में संस्थागत भागीदार बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
बाहरी श्रमिक सबसे अधिक प्रभावित
विशेषज्ञों ने कहा कि निर्माण श्रमिक, सफाई कर्मचारी, डिलीवरी कर्मी, सड़क विक्रेता, किसान और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक लंबे समय तक खुले में काम करने के कारण सबसे अधिक हीट स्ट्रेस और हीट स्ट्रोक के खतरे में रहते हैं।
डॉ अरविंद मिश्र ने कहा कि बच्चों पर गर्मी का प्रभाव अलग तरीके से पड़ता है, जिससे त्वचा संबंधी समस्याएं, नींद में बाधा और मानसिक तनाव जैसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं। उन्होंने दिन और रात के तापमान के बीच घटते अंतर को भी बच्चों के स्वास्थ्य और बौद्धिक विकास के लिए चिंता का विषय बताया।
जिम्मेदार रिपोर्टिंग और जनजागरूकता की जरूरत
आईएमडी की निदेशक मनोरमा मोहंती ने मीडिया से डर पैदा करने वाली खबरों से बचने और जिम्मेदार रिपोर्टिंग करने की अपील की। उन्होंने कहा कि मौसम चेतावनी, निगरानी प्रणाली और तैयारी संबंधी दिशानिर्देशों को लोगों तक सही तरीके से पहुंचाना जरूरी है।
विशेषज्ञों ने कहा कि जलवायु और हीटवेव से जुड़ी पत्रकारिता में भाषा और संवाद की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। रिपोर्टिंग ऐसी होनी चाहिए, जो लोगों में जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना पैदा करे, न कि अनावश्यक भय।
इट्स ओनली 47 डिग्री सेल्सियस फिल्म का प्रदर्शन
कार्यक्रम के दौरान अभिनेता नसीरुद्दीन शाह द्वारा निर्मित लघु फिल्म “इट्स ओनली 47 डिग्री सेल्सियस” का विशेष प्रदर्शन भी किया गया। फिल्म में ट्रैफिक कर्मियों, रिक्शा चालकों, डिलीवरी कर्मियों, किसानों और अन्य कमजोर वर्गों पर बढ़ती गर्मी के असमान प्रभाव को दिखाया गया।
कार्यक्रम का समापन ओडिशा एनवायरनमेंट कांग्रेस के सुदर्शन दास के संबोधन के साथ हुआ। उन्होंने कहा कि बढ़ते ताप संकट से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास, जनभागीदारी और दीर्घकालिक जलवायु अनुकूलन योजना बेहद आवश्यक है।
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