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संगीत हमेशा ही गायक से बड़ा होता है: उषा उत्थुप

नई दिल्ली, अस्सी के दशक में भारतीय पॉप संगीत में लोकप्रियता के शिखर पर रहीं पार्श्वगायिका उषा उत्थुप का मानना है कि संगीत हमेशा ही गायक से कहीं बड़ा होता है और अभिमान, संगीत का दुश्मन होता है।
उषा उत्थुप ने दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) में सोमवार को शुरू हुए दिल्ली अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (डीआईएफएफ) के दूसरे दिन मंगलवार को यहां संवाददाता सम्मेलन में यह बात कही। इस अवसर पर डीआईएफएफ के राम किशोर पारचा और आईजीएनसीए के मीडिया प्रमुख अनुराग पुनेठा भी मौजूद थे।
उषा उत्थुप ने गर्व से कहा, “मेरे सबसे बड़े हिट गाने पंजाबी में हैं। यह मुझे एक ‘पूर्ण भारतवासी’ और दुनिया का एक ‘पूर्ण नागरिक’ बनाता है। मेहमाननवाजी और प्यार बिना किसी जाति, रंग या लिंग के भेदभाव के होना चाहिए।”
उषा उत्थुप ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्लेबैक सिंगर के रूप में नहीं बल्कि एक ‘नाइट क्लब सिंगर’ के रूप में की थी। लोग सोचते हैं कि नाइट क्लब में गाने वाले बुरे होते हैं, लेकिन आप खुद वहां का माहौल बदल सकते हैं। जब मैंने साड़ी पहनकर अंग्रेजी गाने गाए, तो लोग दंग रह गए। मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि आप कितने ‘ओरिजिनल’ (वास्तविक) हैं। अगर आप ओरिजिनल हैं, तो आप हमेशा टिके रहेंगे।
70 के दशक के पार भी अपनी ऊर्जा का राज साझा करते हुए उन्होंने हरियाणवी गाने की पंक्तियां सुनाईं “मजे करो भरी जवानी में, बुढ़ापा किसने देखा सै…”। उनका मानना है कि जो करना है अभी करो और शान से करो। उन्होंने मीडिया के माध्यम से लोगों से अपील की कि वे सिनेमाघरों में जाकर फिल्में देखें, क्योंकि फिल्में ही हमें सपने देखना सिखाती हैं।
उषा उत्थुप भारतीय पॉप संगीत की वह अनोखी आवाज़ हैं, जिन्होंने अस्सी के दशक में अपनी गहरी और मखमली गायकी से पूरे देश को मंत्रमुग्ध कर दिया था। 1947 में मुंबई में जन्मी उत्थुप ने अपने करियर की शुरुआत नाइट क्लब सिंगर के रूप में की, जहाँ साड़ी पहनकर अंग्रेज़ी गाने गाना उनकी पहचान बन गया। उन्होंने हिंदी, अंग्रेज़ी, बंगाली और पंजाबी सहित कई भाषाओं में गाया और “हरि ओम हरि”, “डार्लिंग”, “रंभा हो” जैसे गीतों से अपार लोकप्रियता हासिल की। उनकी मौलिकता और मंच पर ऊर्जा ने उन्हें भारतीय पॉप संगीत की अग्रणी हस्तियों में शामिल किया। उत्थुप ने यह साबित किया कि पॉप और जैज़ जैसी पश्चिमी शैलियाँ भी भारतीय परिधान और सांस्कृतिक भावभूमि के साथ प्रस्तुत की जा सकती हैं, और इसी कारण वह आज भी भारतीय संगीत जगत में एक विशिष्ट स्थान रखती हैं।
लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड के लिए आभार व्यक्त करते हुए उषा उथुप ने कहा कि उनके लिए इस पुरस्कार का मतलब ‘रिटायरमेंट’ नहीं है। मेरे लिए लाइफटाइम अचीवमेंट का मतलब है कि अभी और भी बहुत कुछ बेहतर करना बाकी है।
बांग्लादेशी गायिका रूना लैला ने कहा कि मेरे लिए हर अवार्ड बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह एक कलाकार को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। लेकिन ‘मीनार-ए-दिल्ली’ अवार्ड मेरे लिए बहुत खास है। मैं खुद को बहुत भाग्यशाली मानती हूं कि मुझे यह सम्मान महान कलाकार ज़ोहरा सहगल के हाथों मिला। यह मेरे लिए बड़े गौरव की बात है। अपने माता-पिता, परिवार, प्रशंसकों और दोस्तों की वजह से आज मैं इस मुकाम पर हूं और मुझे इतना बड़ा सम्मान मिला है।
इस मौके पर डीआईएफएफ के 16वें संस्करण का पोस्टर लॉन्च किया गया, जिसके साथ ही वर्ष 2027 में होने वाले इस भव्य आयोजन के लिए प्रविष्टियों का पोर्टल भी खोल दिया गया है। आईजीएनसीए में 15-19 फरवरी, 2027 को आयोजित होने वाला इस महोत्सव के प्रविष्टि की अंतिम तिथि 31 दिसंबर, 2026 तक है।
इससे पहले, आज ही फिल्म निर्माता एवं दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित अडूर गोपालकृष्णन ने एक अनूठी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस प्रदर्शनी में 50-90 दशक तक के अभिनेता-अभिनेत्री और दिग्गज गायकों द्वारा अलग-अलग विषयों पर दिए गए दुर्लभ विज्ञापनों को प्रदर्शित किया गया।
उल्लेखनीय है कि डीआईएफएफ 2026 का उद्घाटन फिल्म ‘हर स्टोरी’ से किया गया। इसके निर्देशक चीन के शाओ यिहुई हैं। इस महोत्सव का उद्देश्य वैश्विक सिनेमा, कला और साहित्य की विविध अभिव्यक्तियों को एक मंच पर लाना है। इसमें विश्वभर की सांस्कृतिक धाराओं का संगम देखने को मिलेगा।
पांच दिन के इस महोत्सव के दौरान आईजीएनसीए द्वारा निर्मित 5 विशिष्ट फिल्मों और 51 देशों की करीब 178 फिल्मों को दिखाया जाएगा,साथ ही विभिन्न विषयों पर पैनल चर्चाओं का आयोजन किया जाएगा।
इस वर्ष के महोत्सव में चीन, रूस और अफ्रीका को फोकस देश के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, जो वैश्विक सिनेमा के विविध आयामों और सांस्कृतिक संवाद को दर्शाता है। मुख्यधारा के सिनेमा के साथ-साथ महोत्सव में डॉक्यूमेंट्री और सांस्कृतिक फिल्मों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, जो विरासत, परम्पराओं और ज्ञान परम्पराओं के दस्तावेज़ीकरण के साथ-साथ भारत की वैश्विक सांस्कृतिक पहचान को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
साभार – हिस

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