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उत्कल विश्वविद्यालय में डॉ होमी जहांगीर भाभा की स्मृति में आयोजित हुआ स्मारक व्याख्यान
भुवनेश्वर। भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ होमी जहांगीर भाभा की 117वीं जयंती के अवसर पर शुक्रवार को उत्कल विश्वविद्यालय परिसर में एक स्मारक व्याख्यान का आयोजन किया गया। भारतीय भौतिकी शिक्षक संघ की ओडिशा शाखा और विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने डॉ भाभा के वैज्ञानिक योगदान, बहुआयामी व्यक्तित्व और भारत को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के उनके प्रयासों को याद किया।
कार्यक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति एवं अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त इतिहासकार प्रोफेसर चंडी प्रसाद नंद के संरक्षण में आयोजित हुआ। स्नातकोत्तर परिषद के अध्यक्ष प्रोफेसर यज्ञेश्वर दंडपाट ने स्वागत भाषण देते हुए डॉ भाभा की बहुमुखी प्रतिभा और वैज्ञानिक उपलब्धियों पर प्रकाश डाला।
परमाणु विज्ञान में भाभा का योगदान अतुलनीय
मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित उत्कल विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ लंबोदर प्रसाद सिंह तुलसी ने कहा कि डॉ भाभा की असाधारण प्रतिभा बचपन से ही दिखाई देने लगी थी। उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में शोध के दौरान म्यूऑन कणों, कॉस्मिक किरणों के कैस्केड विकास तथा भाभा प्रकीर्णन से जुड़े उनके महत्वपूर्ण वैज्ञानिक योगदानों का उल्लेख किया।
डॉ. सिंह ने कहा कि डॉ. भाभा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के प्रमुख स्वप्नद्रष्टा थे। उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र जैसी संस्थाओं की स्थापना के माध्यम से भारत को परमाणु विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की मजबूत नींव रखी।
उन्होंने बताया कि डॉ भाभा केवल असाधारण वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि संगीत प्रेमी, प्रकृति के उपासक और प्रतिभाशाली चित्रकार भी थे। परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने के लिए जिनेवा में आयोजित प्रथम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की अध्यक्षता भी उन्होंने की थी। डॉ भाभा भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के प्रथम सदस्य-सचिव थे। उन्होंने भारत के परमाणु कार्यक्रम, अंतरिक्ष परियोजनाओं और इलेक्ट्रॉनिक्स मिशन को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
डॉ सिंह ने कहा कि पद्म भूषण से सम्मानित डॉ भाभा और पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री का विमान दुर्घटनाओं में असामयिक निधन स्वतंत्रता के बाद के भारत के इतिहास की अत्यंत दुखद घटनाओं में शामिल है।
परमाणु ऊर्जा का उद्देश्य जनकल्याण होना चाहिए
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के प्रमुख संस्थानों में शामिल भुवनेश्वर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स के निदेशक एवं स्विट्जरलैंड के सीईआरएन के पूर्व संयुक्त प्रवक्ता प्रोफेसर वेदांग महांती ने डॉ. भाभा के बहुआयामी व्यक्तित्व और दूरदर्शी सोच पर प्रकाश डाला।
उन्होंने डॉ. भाभा को परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के विचार का महान और अग्रणी अंतरराष्ट्रीय समर्थक बताया। प्रोफेसर महांती ने कहा कि भारत का परमाणु कार्यक्रम आज बिजली उत्पादन के साथ-साथ चिकित्सा विज्ञान, कैंसर की पहचान एवं उपचार, खाद्य संरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।
उन्होंने परमाणु प्रौद्योगिकी के चिकित्सा क्षेत्र में उपयोग की चर्चा करते हुए बताया कि न्यूक्लियर मेडिसिन और पदार्थों की पहचान में इसके प्रयोग से नई संभावनाएं विकसित हुई हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि ओडिशा स्थित राष्ट्रीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (NISER) का साइक्लोट्रॉन जल्द ही राष्ट्र को समर्पित होगा और जनकल्याण के कार्यों में उपयोगी साबित होगा।
वैज्ञानिक विरासत को आगे बढ़ाने पर जोर
कार्यक्रम में भारतीय भौतिकी शिक्षक संघ की अध्यक्ष प्रोफेसर रीता पाईकराय का संरक्षण एवं मार्गदर्शन रहा। उत्कल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शोधकर्ता डॉ. श्रीरूप गोस्वामी तथा संघ के सचिव डॉ. गौरीशंकर साहू ने कार्यक्रम का समन्वय किया। संघ के कोषाध्यक्ष डॉ. संजय कुमार सुवार ने अतिथियों का परिचय कराया, जबकि विश्वविद्यालय के रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल के निदेशक प्रोफेसर प्रसन्न कुमार पात्र ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
इस अवसर पर डॉ अरुंधती मिश्रा, डॉ शांति स्वरूप साहू, डॉ स्निग्धा दाश, डॉ अजय कुमार बेहरा, डॉ सुशांत बड़माली, डॉ शेषांशु पाल, डॉ हिमाद्री तनया, डॉ चिन्मय रंजन, प्राध्यापक मनोरंजन मोहंती, यश शर्मा, सौभाग्य स्वाईं और जनसंपर्क अधिकारी विकास कुमार सहित बड़ी संख्या में शिक्षाविद, शोधकर्ता एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
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