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केंद्र और राज्य सरकारों से कानून बनाने की मांग
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पिता के सम्मान और भावनाओं से जुड़ा मुद्दा, अभिभावकों ने कहा– शिक्षक का सम्मान हो, लेकिन बच्चों पर ‘फादर’ कहने की बाध्यता नहीं
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छत्तीसगढ़ में 2014 और 2015 में इस मुद्दे पर हो चुका है विवाद
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बस्तर में प्राचार्य और उपप्राचार्य जैसे संबोधन पर बनी थी सहमति, महासमुंद में जिला शिक्षा अधिकारी ने जारी किया था परिपत्र
भुवनेश्वर। देश के कॉन्वेंट और मिशनरी स्कूलों में प्रधानाचार्यों तथा पादरियों को ‘फादर’ कहकर संबोधित करने की परंपरा को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। कई अभिभावकों ने इस परंपरा में बदलाव की मांग करते हुए केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय और सभी राज्य सरकारों से हस्तक्षेप करने की अपील की है। उनका कहना है कि विद्यालयों में किसी भी बच्चे को किसी विशेष धार्मिक या पारिवारिक संबोधन का इस्तेमाल करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। इसके लिए केंद्र सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट नीति बनानी चाहिए और राज्य सरकारों को भी आवश्यक कानूनी प्रावधान करने चाहिए।
अभिभावकों का कहना है कि ‘फादर’ शब्द केवल एक सामान्य संबोधन नहीं है, बल्कि इसका सीधा अर्थ पिता होता है। भारतीय परिवार व्यवस्था में पिता का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और भावनात्मक होता है। एक पिता अपने बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा, सुरक्षा और भविष्य के निर्माण के लिए जीवनभर संघर्ष करता है। ऐसे में जब किसी बच्चे से स्कूल में अपने शिक्षक, प्रधानाचार्य या संस्थान प्रमुख को ‘फादर’ कहकर संबोधित करने की अपेक्षा की जाती है, तो कुछ अभिभावकों को यह सहज नहीं लगता। उनका सवाल है कि शिक्षक का सम्मान करने के लिए ‘सर’, ‘शिक्षक’, ‘आचार्य’ और ‘प्राचार्य’ जैसे सम्मानजनक संबोधन उपलब्ध हैं, फिर ‘फादर’ कहलवाने की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए?
छत्तीसगढ़ में 2014 में उठा था बड़ा विवाद
यह मुद्दा नया नहीं है। वर्ष 2014 में छत्तीसगढ़ के बस्तर और जगदलपुर क्षेत्र में कैथोलिक मिशनरी स्कूलों में प्रधानाचार्यों को ‘फादर’ कहकर संबोधित करने की परंपरा को लेकर बड़ा विवाद सामने आया था। 24 नवंबर 2014 को प्रकाशित द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व हिंदू परिषद और कैथोलिक समुदाय के प्रतिनिधियों के बीच हुई बैठक के बाद बस्तर के मिशनरी स्कूलों में प्रधानाचार्यों के लिए ‘फादर’ के स्थान पर ‘प्राचार्य’, ‘उपप्राचार्य’ या ‘सर’ संबोधन इस्तेमाल करने की सहमति संबंधी संयुक्त बयान जारी किया गया था।
उस समय बस्तर क्षेत्र में कैथोलिक समुदाय द्वारा संचालित 22 स्कूलों का उल्लेख किया गया था। इस विवाद में यह तर्क सामने आया था कि पिता का स्थान परिवार में विशिष्ट है और किसी शिक्षक को पिता के रूप में संबोधित करने से कुछ विद्यार्थियों तथा अभिभावकों को असहजता हो सकती है। हालांकि, कैथोलिक समुदाय की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया था कि किसी पर ‘फादर’ कहने का दबाव नहीं बनाया जाता। इस प्रकरण ने देशभर में स्कूलों के संबोधन और धार्मिक परंपराओं को लेकर बहस छेड़ दी थी।
2015 में महासमुंद के जिला शिक्षा अधिकारी ने जारी किया था परिपत्र
इस मामले में वर्ष 2015 में छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में प्रशासनिक स्तर पर भी कदम उठाया गया था। द इंडियन एक्सप्रेस की 15 मई 2015 की रिपोर्ट के अनुसार, महासमुंद के जिला शिक्षा अधिकारी ने 11 मई 2015 को जिले के 14 मिशनरी स्कूलों को परिपत्र जारी कर संस्थान प्रमुख के लिए ‘फादर’ संबोधन का इस्तेमाल बंद करने तथा उसके स्थान पर ‘प्राचार्य’ या ‘सर’ जैसे शब्दों का प्रयोग करने को कहा था। इससे पहले फरवरी 2015 में कांकेर जिले में भी इसी तरह का परिपत्र जारी किए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी।
उस समय महासमुंद के तत्कालीन जिलाधिकारी ने अखबार को बताया था कि विद्यार्थियों को शिक्षकों को ‘फादर’ कहने के लिए बाध्य किए जाने की शिकायतें मिली थीं और किसी को इस तरह संबोधित करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। हालांकि, इस प्रशासनिक कदम का ईसाई संगठनों ने विरोध भी किया था। उनका तर्क था कि धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थानों को संविधान के तहत अपने संस्थानों के संचालन और प्रबंधन का अधिकार प्राप्त है।
इस प्रकार छत्तीसगढ़ में एक दशक से अधिक समय पहले उठ चुका यह मुद्दा आज भी शिक्षा व्यवस्था, अभिभावकों की भावनाओं और संस्थागत परंपराओं के बीच संतुलन की आवश्यकता की ओर ध्यान आकर्षित करता है।
केंद्र सरकार बनाए राष्ट्रीय नीति, राज्य सरकारें करें कानूनी व्यवस्था
अभिभावकों की मांग है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय इस विषय को राष्ट्रीय शिक्षा नीति और विद्यालयों के संचालन संबंधी दिशा-निर्देशों के संदर्भ में देखे। देशभर के सरकारी, निजी, कॉन्वेंट और मिशनरी स्कूलों के लिए ऐसा स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए कि किसी विद्यार्थी को किसी विशेष धार्मिक या पारिवारिक संबोधन का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर नहीं किया जाए।
उनका कहना है कि केंद्र सरकार इस विषय पर राज्यों से विचार-विमर्श करे और आवश्यक कानूनी व्यवस्था तैयार करे। वहीं राज्य सरकारों को अपने शिक्षा विभागों के माध्यम से स्कूलों के लिए दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए। यदि किसी स्कूल में विद्यार्थियों पर विशेष संबोधन के इस्तेमाल का दबाव बनाया जाता है, तो अभिभावकों को शिकायत करने और उसका समाधान प्राप्त करने की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान, लेकिन बच्चों को मिले संबोधन की स्वतंत्रता
अभिभावकों का कहना है कि उनकी मांग किसी धर्म, समुदाय या धार्मिक संस्था के विरुद्ध नहीं है। कैथोलिक चर्च में पादरियों को ‘फादर’ कहना एक पुरानी धार्मिक परंपरा है और उसका सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन धार्मिक परंपरा और विद्यालय में विद्यार्थियों के लिए संबोधन की अनिवार्यता दो अलग-अलग विषय हैं।
उनका सुझाव है कि यदि किसी पादरी या धार्मिक पदाधिकारी को उनके धार्मिक समुदाय के लोग ‘फादर’ कहते हैं, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन दूसरे धर्मों और सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों को भी अपनी सहजता के अनुसार ‘सर’, ‘प्राचार्य’, ‘आचार्य’ या अन्य सम्मानजनक संबोधन इस्तेमाल करने का अधिकार मिलना चाहिए। किसी भी बच्चे को ऐसा संबोधन अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए, जिससे वह या उसके अभिभावक असहज महसूस करें।
भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा को भी मिले सम्मान
भारत में गुरु और शिक्षक को सदैव विशेष सम्मान दिया गया है। प्राचीन काल से गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय शिक्षा और संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। गुरु, आचार्य, अध्यापक और शिक्षक जैसे संबोधन इसी परंपरा की पहचान हैं। अभिभावकों का कहना है कि विद्यालयों में इन संबोधनों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। शिक्षक का सम्मान उसके ज्ञान, मार्गदर्शन और विद्यार्थियों के भविष्य निर्माण में योगदान से होता है, न कि किसी एक विशेष संबोधन से।
सरकारों के सामने कई सवाल
अब इस विषय पर केंद्र और राज्य सरकारों के सामने कुछ महत्वपूर्ण सवाल हैं। क्या विद्यालयों में किसी बच्चे के लिए किसी विशेष धार्मिक संबोधन का इस्तेमाल अनिवार्य किया जा सकता है? क्या अभिभावकों को अपने बच्चों के लिए वैकल्पिक सम्मानजनक संबोधन चुनने की स्वतंत्रता नहीं मिलनी चाहिए? क्या स्कूलों के नियम बनाते समय स्थानीय संस्कृति और सामाजिक भावनाओं को भी पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाना चाहिए?
अभिभावकों की मांग है कि सरकारें इस विषय को राजनीतिक या धार्मिक विवाद बनाने के बजाय विद्यार्थियों की स्वतंत्रता, अभिभावकों की भावनाओं और शिक्षा संस्थानों की जिम्मेदारी के रूप में देखें। उनका कहना है कि देश में किसी भी धार्मिक समुदाय की परंपराओं को समाप्त करने की जरूरत नहीं है, लेकिन किसी दूसरे समुदाय के बच्चे पर उस परंपरा के अनुरूप संबोधन अपनाने की बाध्यता भी नहीं होनी चाहिए।
अब समय है कि केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, शिक्षा बोर्ड और स्कूल प्रबंधन इस विषय पर खुलकर संवाद करें और ऐसी व्यवस्था बनाएं, जिसमें शिक्षक का सम्मान भी बना रहे, धार्मिक स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे और पिता के साथ जुड़े पारिवारिक रिश्ते की भावनात्मक गरिमा का भी सम्मान हो।
अभिभावकों का स्पष्ट आग्रह है कि ‘फादर’ संबोधन किसी की धार्मिक पहचान का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसे प्रत्येक विद्यार्थी के लिए अनिवार्य नहीं बनाया जाना चाहिए।
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