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महाचक्रवात के बाद गंजाम-गजपति में फिर जिंदगी बचाने की जद्दोजहद

  •    कमर तक पानी, सिर पर आसमान और आंखों में अपनों को खोने का डर

  •     त्राहि-त्राहि के बीच छतों पर लोगों ने लिया शरण

  •     चूल्हे बुझे, राशन डूबा, पीने के पानी तक का संकट

  •     घरों में पानी घूसने से रसोई पकाने तक के संकट

  •     अभी तक 20 गांवों में सबसे अधिक जलघेराव

  •     भंजनगर, सोरडा, आस्का, धाराकोट, सानखेमुंडी, दिग्गपहंडी, हिंजिली, शेरगढ़, पात्रपुर और चिकिटि प्रखंड और एनसी सबसे अधिक प्रभावित

  •     1990 के महाचक्रवात के बाद पहली बार ऐसा मचा है तांडव

  •     एनडीआरएफ और ओड्राफ के जवान बने संकटमोचक

शिवराम चौधरी, ब्रह्मपुर।

महाचक्रवात के बाद गंजाम-गजपति में साल 2026 में एक बार फिर जिंदगी बचाने की जद्दोजहद चल रही है। चारों तरफ पानी, डूबे हुए घर, सड़कों का नामोनिशान नहीं और सिर पर मंडराता मौत का खतरा। किसी घर की छत पर बैठा परिवार मदद की राह देख रहा है तो कहीं छोटे-छोटे बच्चों को गोद में उठाए महिलाएं सुरक्षित ठिकाने की तलाश में हैं। किसी मां की चिंता अपने बच्चों के भूखे पेट की है तो किसी बुजुर्ग को इस बात का डर सता रहा है कि रात कैसे कटेगी। चक्रवात अर्णव के बाद लगातार हुई मूसलाधार बारिश ने दक्षिण ओडिशा के गंजाम और गजपति जिलों में जनजीवन को बुरी तरह झकझोर दिया है। कई इलाकों में कमर तक पानी भर गया है। घरों में पानी घुसने से लोगों का सामान, अनाज और रोजमर्रा की जरूरतों की सामग्री बर्बाद हो गई है। हालात ऐसे हैं कि जिन घरों में कभी चूल्हा जलता था, वहां अब पानी भरा है और परिवारों के सामने दो वक्त के भोजन का संकट खड़ा हो गया है।

यह केवल बाढ़ की कहानी नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों की पीड़ा है, जिनकी दुनिया कुछ ही घंटों में पानी के सैलाब के बीच सिमटकर रह गई। किसी ने अपने घर की छत को ही सुरक्षित ठिकाना बना लिया है तो किसी ने बच्चों को लेकर ऊंचे स्थानों पर शरण ली है। लगातार बारिश, तेज बहाव और जलभराव के कारण कई गांवों का संपर्क बाहरी दुनिया से टूट गया है। राहत की एक नाव या हेलीकॉप्टर की आवाज इन लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन रही है।

घर की छतों पर कट रही जिंदगी

गंजाम और गजपति के कई प्रभावित इलाकों में लोगों को अपने ही घरों की छतों पर शरण लेनी पड़ी है। जिन परिवारों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने का अवसर नहीं मिला, वे पानी के बीच अपने बच्चों और बुजुर्गों को बचाने की कोशिश में जुटे रहे। कई घरों में पानी घुसने से बिस्तर, कपड़े, अनाज, घरेलू सामान और जरूरी दस्तावेज तक प्रभावित हुए हैं।

सबसे कठिन स्थिति उन परिवारों की है, जिनके पास न तो सुरक्षित स्थान है और न ही भोजन पकाने की व्यवस्था। रसोई में पानी भर जाने से चूल्हे बुझ गए हैं। गैस सिलेंडर और खाद्य सामग्री तक पहुंचना मुश्किल हो गया है। पीने के स्वच्छ पानी की उपलब्धता भी चिंता का विषय बन गई है। ऐसे में राहत शिविरों और बचाव दलों के माध्यम से मिलने वाला भोजन ही अनेक परिवारों का सहारा बना हुआ है।

बच्चों और महिलाओं की पीड़ा सबसे ज्यादा

बाढ़ की सबसे अधिक मार बच्चों, महिलाओं, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों पर पड़ रही है। छोटे बच्चों को गंदे पानी से दूर रखना, उन्हें समय पर भोजन देना और बीमारियों से बचाना अभिभावकों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। जिन परिवारों के घरों में पानी घुस गया है, वहां महिलाओं के सामने भोजन तैयार करने, पीने के पानी की व्यवस्था करने और बच्चों की देखभाल करने जैसी कई मुश्किलें एक साथ खड़ी हो गई हैं।

गर्भवती महिलाओं और बीमार लोगों को अस्पताल तक पहुंचाना भी आसान नहीं है। कई स्थानों पर सड़कें जलमग्न हैं और सामान्य वाहनों की आवाजाही बंद है। ऐसे में नावों और बचाव दलों की मदद से जरूरतमंदों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा रहा है।

बाढ़ के बाद स्वच्छता और स्वास्थ्य संबंधी खतरे भी बढ़ने की आशंका है। दूषित पानी, मच्छरों और संक्रमण से बच्चों तथा बुजुर्गों को बचाना प्रशासन के सामने एक और बड़ी चुनौती है।

20 से अधिक गांवों में गंभीर जलघेराव, कई प्रखंडों में जनजीवन अस्त-व्यस्त

गंजाम जिले में भंजनगर, सोरडा, आस्का, धाराकोट, सानखेमुंडी, दिग्गपहंडी, हिंजिली, शेरगढ़, पात्रपुर और चिकिटी सहित कई प्रखंड और एनसी बाढ़ से प्रभावित बताए जा रहे हैं। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, कम से कम 20 गांवों में जलघेराव की स्थिति गंभीर है। कई गांवों में घरों और सड़कों पर पानी भरने से आवागमन बाधित हुआ है।

गजपति जिले के भी निचले और पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार बारिश का असर दिखाई दे रहा है। कुछ स्थानों पर भूस्खलन और सड़क अवरोध ने मुश्किलें बढ़ाई हैं। ग्रामीण इलाकों में राहत सामग्री पहुंचाने के लिए प्रशासन को अतिरिक्त प्रयास करने पड़ रहे हैं।

इन क्षेत्रों में सबसे बड़ी जरूरत उन परिवारों तक तत्काल भोजन, पेयजल, दवाइयां और अन्य आवश्यक सामग्री पहुंचाने की है, जिनका संपर्क पूरी तरह टूट गया है।

एनडीआरएफ और ओड्राफ के जवान बने देवदूत

इस कठिन परिस्थिति में राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ), ओडिशा आपदा त्वरित कार्रवाई बल (ओड्राफ), अग्निशमन सेवा और जिला प्रशासन के जवान प्रभावित लोगों के लिए देवदूत बनकर सामने आए हैं। अपनी जान जोखिम में डालकर ये जवान पानी से घिरे घरों तक पहुंच रहे हैं और बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों तथा बीमार लोगों को सुरक्षित निकाल रहे हैं।

कई स्थानों पर नावों के जरिए लोगों को राहत शिविरों तक पहुंचाया जा रहा है। दुर्गम क्षेत्रों में हेलीकॉप्टरों के माध्यम से खाद्य सामग्री के पैकेट गिराए जा रहे हैं। बचाव अभियान के दौरान गर्भवती महिलाओं और जरूरतमंद मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए भी विशेष प्रयास किए जा रहे हैं।

गंजाम के ब्रह्मपुर में ओड्राफ की टीम ने 35 वर्षीय गर्भवती महिला बनलता बेहरा को विजय बिहार इलाके से सुरक्षित निकालने के लिए लगभग 1.2 किलोमीटर तक उठाकर पहुंचाया और फिर सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया। यह घटना बताती है कि आपदा के इस कठिन समय में राहतकर्मी केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं निभा रहे, बल्कि इंसानियत की मिसाल भी पेश कर रहे हैं।

जिलाधिकारी ने गांवों और राहत शिविरों में पहुंचकर सुनी पीड़ितों की पीड़ा

गंजाम जिले के गोसाणी ब्लॉक में चक्रवात अर्णव और भारी बारिश के कारण उत्पन्न बाढ़ की स्थिति का जिलाधिकारी ने निरीक्षण किया। उन्होंने बाढ़ प्रभावित महिलाओं से मुलाकात की और उनकी परेशानियों, जरूरतों तथा मौजूदा हालात की जानकारी ली।

इसके बाद जिलाधिकारी गंधाहाटी सरकारी उच्च विद्यालय में बनाए गए राहत शिविर पहुंचे। वहां रह रहे लोगों से बातचीत कर भोजन की उपलब्धता, अन्य जरूरी सुविधाओं और उनकी कठिनाइयों का जायजा लिया। उन्होंने जिला प्रशासन को आपदा की स्थिति में तत्काल राहत एवं बचाव कार्यों में तेजी लाने और प्रभावित लोगों तक जरूरी सहायता पहुंचाने के सख्त निर्देश दिए।

राहत शिविरों में केवल भोजन उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है। बच्चों के लिए दूध और जरूरी सामग्री, महिलाओं के लिए स्वच्छता संबंधी सुविधाएं, बुजुर्गों के लिए दवाइयां और बीमार लोगों के लिए चिकित्सा व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।

1990 के बाद 2026 में पहली बार ऐसी तबाही का एहसास

दक्षिण ओडिशा के लोगों के लिए यह आपदा 1990 के महाचक्रवात की भयावह यादें ताजा कर रही है। स्थानीय स्तर पर लोग इस बार के जलप्रलय को पिछले कई दशकों की सबसे कठिन प्राकृतिक आपदाओं में से एक बता रहे हैं। लगातार बारिश, नदियों का उफान, गांवों में जलभराव, सड़क संपर्क टूटना और भूस्खलन ने स्थिति को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

हालांकि, 1990 के महाचक्रवात और वर्तमान आपदा की प्रकृति अलग-अलग है, लेकिन दोनों घटनाओं की भयावहता ने लोगों के मन में पुरानी आशंकाएं फिर जगा दी हैं।

राहत के साथ पुनर्वास की भी बड़ी चुनौती

तत्काल राहत पहुंचाने के बाद सरकार और प्रशासन के सामने प्रभावित परिवारों को दोबारा सामान्य जीवन में लौटाने की बड़ी चुनौती होगी। घरों में घुसे पानी के निकलने के बाद सफाई, पेयजल की व्यवस्था, क्षतिग्रस्त मकानों की मरम्मत, नष्ट हुए अनाज और घरेलू सामान की भरपाई तथा किसानों की फसल क्षति का आकलन जरूरी होगा।

सबसे पहले उन परिवारों की पहचान करनी होगी, जिनके मकान पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए हैं या जिनकी आजीविका का साधन बाढ़ में नष्ट हो गया है। राहत शिविरों में रह रहे लोगों को सुरक्षित घर लौटने की व्यवस्था होने तक भोजन, चिकित्सा और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना भी जरूरी है।

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