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कहा-भारत में अनुसंधान की परंपरा दुनिया की सबसे प्राचीन
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इतिहास को गलत ढंग से प्रस्तुत कर लोगों को किया गया गुमराह
भुवनेश्वर। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो रघुराज किशोर तिवारी ने कहा है कि भारत की शिक्षा और अनुसंधान परंपरा दुनिया की सबसे प्राचीन और समृद्ध परंपराओं में से एक रही है, लेकिन इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत कर देश की नई पीढ़ी को लंबे समय तक भ्रमित किया गया। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति इसी ऐतिहासिक भूल को सुधारने और भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
विशेष बातचीत के दौरान तिवारी ने कहा कि भारत में शिक्षा केवल नौकरी प्राप्त करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि जीवन निर्माण, कौशल विकास, चरित्र निर्माण और समाज निर्माण का आधार थी। उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में गुरुकुल व्यवस्था के माध्यम से विज्ञान, गणित, दर्शन, चिकित्सा, खगोल, युद्धकला और सामाजिक जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों पर व्यापक अनुसंधान होता था। यही कारण है कि भारत को विश्व गुरु कहा जाता था।
उन्होंने कहा कि इतिहासकारों ने भारत के गौरवपूर्ण अतीत को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया। कई ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें गलत ढंग से स्थापित कर दिया गया। उन्होंने कहा कि “अकबर महान” जैसी अवधारणाओं को इतिहास में स्थापित किया गया, जबकि भारत के अनेक वीर योद्धाओं और सांस्कृतिक नायकों के योगदान को अपेक्षित स्थान नहीं मिला। इसी प्रकार सिकंदर और पौरस के युद्ध का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इतिहास में यह स्थापित कर दिया गया कि “जो जीता वही सिकंदर”, जबकि वास्तविकता यह है कि पौरस के साहस और संघर्ष ने सिकंदर को पीछे हटने पर मजबूर किया था।
तिवारी ने कहा कि अंग्रेजों की मैकाले शिक्षा नीति का उद्देश्य भारत को मानसिक रूप से गुलाम बनाना था। उन्होंने कहा कि जब मैकाले भारत आया था, तब यहां लाखों गुरुकुल संचालित हो रहे थे। धर्मपाल द्वारा लिखित पुस्तक “द ब्यूटीफुल ट्री” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस पुस्तक में दस्तावेजी प्रमाण दिए गए हैं कि जब ब्रिटेन में पहला विद्यालय खुला था, उस समय भारत में लगभग साढ़े तीन लाख गुरुकुल संचालित हो रहे थे। इससे स्पष्ट होता है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था कितनी विकसित और व्यापक थी।
उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को फिर से मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया जा रहा है। भारतीय संस्कृति, विज्ञान, दर्शन, साहित्य और गौरवपूर्ण इतिहास को सिलेबस में शामिल करने की आवश्यकता है ताकि नई पीढ़ी अपने वास्तविक इतिहास और परंपरा से परिचित हो सके। उन्होंने कहा कि भारत के वीरता पूर्ण इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम के अनसुने नायकों और प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियों को शिक्षा प्रणाली में उचित स्थान मिलना चाहिए।
तिवारी ने कहा कि वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बहु-विषयक शिक्षा प्रणाली को बढ़ावा देना है। विद्यार्थियों को केवल एक विषय तक सीमित रखने के बजाय उन्हें विभिन्न विषयों को पढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति इसी दिशा में काम कर रही है, जहां कौशल, अनुसंधान और शिक्षा को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इससे विद्यार्थियों का समग्र विकास संभव होगा।
उन्होंने विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य नई शिक्षा नीति को प्रभावी तरीके से लागू करना और शिक्षा व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाना है। साथ ही राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन के माध्यम से देश में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए एकीकृत व्यवस्था विकसित की जा रही है, ताकि विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को बेहतर मंच मिल सके।
हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि नई शिक्षा नीति को लागू करने में कई चुनौतियां मौजूद हैं। स्थायी शिक्षकों की कमी, विद्यालयों और महाविद्यालयों में आधारभूत संरचना का अभाव तथा नई प्रणाली को अपनाने में आ रही कठिनाइयां इसके प्रमुख अवरोध हैं। उन्होंने कहा कि इन समस्याओं को दूर किए बिना शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन संभव नहीं है।
तिवारी ने कहा कि नई शिक्षा नीति भारत को फिर से ज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में विश्व नेतृत्व की ओर ले जा सकती है। इसके लिए समाज, शिक्षकों, विद्यार्थियों और नीति निर्माताओं को मिलकर कार्य करना होगा। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा को आधुनिक आवश्यकताओं के साथ जोड़कर ही विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
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