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कहा-कोटा सुसाइड केंद्र बनता जा रहा, बच्चों को भारतीय दर्शन और जीवन मूल्यों से जोड़ने की जरूरत
भुवनेश्वर। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष रघुराज किशोर तिवारी ने छात्रों में बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि देश में कोचिंग संस्थानों के लिए स्पष्ट नियम और गाइडलाइन बनाए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में विद्यालय और कोचिंग के दोहरे दबाव के कारण बच्चों पर मानसिक तनाव लगातार बढ़ रहा है, जिसका गंभीर प्रभाव उनके जीवन पर पड़ रहा है।
विशेष बातचीत के दौरान तिवारी ने कहा कि आज कई स्थानों पर विद्यालयों में फर्जी उपस्थिति की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। विद्यार्थी विद्यालय में केवल औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराकर कोचिंग संस्थानों पर निर्भर हो रहे हैं।
विद्यालय व कोचिंग सेंटर में मुलभूत अंतर है । विद्यालय में बच्चा पढने के साथ साथ खेलता है, दोस्तों के साथ बातें करता है। कोचिंग सेंटरों में ऐसा नहीं होता है। उन्होंने कहा कि विद्यालय और कोचिंग संस्थानों के अलग-अलग सिलेबस तथा पढ़ाई के दबाव के कारण विद्यार्थियों पर अत्यधिक मानसिक बोझ पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि कोचिंग संस्थानों के पंजीकरण के लिए सख्त नियम बनाए जाएं और उनके संचालन के लिए विस्तृत गाइडलाइन जारी की जाए। इससे विद्यार्थियों पर अनावश्यक दबाव को कम करने में मदद मिलेगी और शिक्षा व्यवस्था अधिक संतुलित बन सकेगी।
तिवारी ने उदाहरण देते हुए कहा कि आज कोटा जैसे शहर, जो कभी शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्रसिद्ध थे, अब आत्महत्या की घटनाओं के कारण चिंता का केंद्र बनते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा, सफलता का दबाव और असफलता का भय विद्यार्थियों को मानसिक रूप से कमजोर बना रहा है।
उन्होंने बताया किव विभिन्न कैंपसेस में छात्र छात्राओं के तनाव से मुक्त रखने के उद्देश्य से अखिल विद्यार्थी परिषद द्वारा शैक्षणिक परिसरों में विद्यार्थियों के स्वस्थ, सकारात्मक और तनाव-मुक्त जीवन के लिए ‘आनंदमय सार्थक छात्र जीवन’ अभियान चलाया जा रहा है
उन्होंने इसके लिए वर्तमान शिक्षा व्यवस्था और मैकाले आधारित सोच को भी जिम्मेदार ठहराया। तिवारी ने कहा कि भारतीय दर्शन, जीवन मूल्य और आध्यात्मिक दृष्टिकोण को शिक्षा प्रणाली से लगभग बाहर कर दिया गया है। इसके कारण बच्चों को जीवन के वास्तविक अर्थ और संघर्षों से लड़ने की मानसिक शक्ति नहीं मिल पा रही है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति और दर्शन हमेशा कर्म पर आधारित रहे हैं। यदि विद्यार्थियों को यह समझाया जाए कि “कर्म करना मनुष्य के हाथ में है और फल देना भगवान के हाथ में”, तो वे असफलता को जीवन का अंत नहीं मानेंगे। उन्होंने कहा कि जब बच्चों को यह ज्ञान मिलेगा कि प्रयास करना ही उनका कर्तव्य है और परिणाम हमेशा उनके नियंत्रण में नहीं होता, तब वे आत्महत्या जैसे कदमों की ओर नहीं बढ़ेंगे।
तिवारी ने कहा कि शिक्षा केवल अंक और परीक्षा तक सीमित नहीं होनी चाहिए। विद्यार्थियों को मानसिक रूप से मजबूत बनाने, जीवन के उतार-चढ़ाव को समझाने और सकारात्मक सोच विकसित करने की भी आवश्यकता है। इसके लिए भारतीय दर्शन, जीवन मूल्य, नैतिक शिक्षा और आध्यात्मिक विचारों को पाठ्यक्रम में शामिल करना बेहद जरूरी है।
उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में धैर्य, संयम, आत्मविश्वास और संघर्ष की शिक्षा दी जाती रही है। इन मूल्यों को आधुनिक शिक्षा प्रणाली से जोड़कर ही विद्यार्थियों को तनावमुक्त और आत्मविश्वासी बनाया जा सकता है।
तिवारी ने कहा कि सरकार, शिक्षा संस्थानों, अभिभावकों और समाज को मिलकर विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीरता से काम करना होगा। केवल परीक्षा आधारित शिक्षा व्यवस्था से आगे बढ़कर विद्यार्थियों के समग्र विकास पर ध्यान देना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
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