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पुलिसकर्मियों को बाल अधिकार, मानसिक स्वास्थ्य, पॉक्सो कानून और संवेदनशील जांच प्रक्रिया की दी गई विशेष ट्रेनिंग
भुवनेश्वर। ओडिशा पुलिस की क्राइम अगेंस्ट वूमेन एंड चिल्ड्रेन विंग (सीएडब्ल्यू एंड सीडब्ल्यू) तथा नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी ओडिशा के सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स (सीसीआर) के संयुक्त तत्वावधान में 18 और 19 मई को भुवनेश्वर में “एसेंशियल्स ऑफ चाइल्ड प्रोटेक्शन” विषय पर दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य ओडिशा पुलिस के अग्रिम पंक्ति के पुलिस कर्मियों और सीएडब्ल्यू एंड सीडब्ल्यू अधिकारियों को बाल संरक्षण से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर संवेदनशील और व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करना है।
बच्चों के प्रति संवेदनशील पुलिसिंग पर विशेष जोर
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पुलिस बल के भीतर बाल हितैषी दृष्टिकोण को मजबूत करना तथा बाल अधिकारों, बाल संरक्षण कानूनों, मानसिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप, प्रतिकूल बचपन अनुभव (एडवर्स चाइल्डहुड एक्सपीरियंस) और कानून से संघर्षरत बच्चों, अपराध के शिकार बच्चों तथा देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों से संबंधित प्रक्रियाओं की समझ विकसित करना है।
कार्यक्रम को इस प्रकार तैयार किया गया है कि इसमें कानूनी समझ के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टिकोण को भी शामिल किया गया है। विशेष रूप से जिला स्तर पर कार्यरत प्रथम प्रतिक्रिया देने वाले पुलिस अधिकारियों और राज्य स्तर के पर्यवेक्षण अधिकारियों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
पहले दिन 131 पुलिस अधिकारियों को दिया गया प्रशिक्षण
भुवनेश्वर स्थित पुलिस भवन के कन्वेंशन हॉल में आयोजित प्रशिक्षण के पहले दिन कुल 131 पुलिस अधिकारियों ने भाग लिया। इनमें 24 अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, 38 उप पुलिस अधीक्षक, 65 इंस्पेक्टर, 3 सब-इंस्पेक्टर और 1 सहायक सब-इंस्पेक्टर शामिल रहे।
कार्यक्रम का दूसरा दिन रसूलगढ़ स्थित सीएडब्ल्यू एंड सीडब्ल्यू मुख्यालय के कॉन्फ्रेंस हॉल में आयोजित किया जाएगा। इसमें राज्य स्तर के पर्यवेक्षण अधिकारियों के साथ महिला एवं बाल विकास विभाग, श्रम विभाग तथा स्कूल एवं जन शिक्षा विभाग के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
डीजीपी ने कहा- हर बच्चे में अपने बच्चे को देखें पुलिसकर्मी
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में विनयतोष मिश्रा ने अध्यक्षीय संबोधन देते हुए पुलिस अधिकारियों से अपील की कि वे जिन बच्चों से अपने कार्य के दौरान मिलते हैं, उनमें अपने बच्चों का हित और भविष्य देखें। उन्होंने कहा कि बच्चों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण बेहद जरूरी है।
शाइनी एस ने बताई ओडिशा पुलिस की रणनीति
शाइनी एस ने प्रशिक्षण कार्यक्रम की परिकल्पना मुख्यमंत्री चेयर प्रोफेसर-सह-निदेशक, सीसीआर, एनएलयूओ प्रो बिराज स्वाईं के साथ मिलकर तैयार की। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण का उद्देश्य पुलिस बल के अग्रिम और पर्यवेक्षण स्तर के अधिकारियों को यह समझाना है कि जांच प्रक्रिया के दौरान हर बच्चे के साथ अत्यंत संवेदनशीलता और देखभाल के साथ व्यवहार किया जाए।
उन्होंने बताया कि ओडिशा में हर गुमशुदा बच्चे की रिपोर्ट को अपहरण के रूप में दर्ज किया जा रहा है और बच्चों को सुरक्षित वापस लाने के लिए पूरी गंभीरता से कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि कानून से संघर्षरत बच्चों के मामलों में राज्य में 100 प्रतिशत केस निस्तारण हो रहा है, जबकि वयस्क अपराधियों के मामलों में दोषसिद्धि दर लगभग 20 प्रतिशत ही है।
बाल अधिकारों को कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रखा जा सकता : प्रो बिराज
प्रो बिराज स्वाईं ने तकनीकी सत्र की शुरुआत करते हुए बाल संरक्षण की मूल अवधारणा और बाल अधिकारों के व्यापक दायरे पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि बाल संरक्षण को केवल कानून-व्यवस्था के मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे बच्चों के अधिकारों और उनके जीवन के अवसरों के संदर्भ में समझना जरूरी है।
मीडिया की भूमिका पर भी सवाल
उन्होंने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि मुख्यधारा मीडिया हिंसक अपराधों और यौन अपराधों को अधिक महत्व देता है, जबकि बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण जैसे रोजमर्रा के महत्वपूर्ण मुद्दों की अनदेखी करता है। उन्होंने बताया कि देश की कुल आबादी में बच्चों की हिस्सेदारी लगभग 37 प्रतिशत है, लेकिन समाचारों में बाल अधिकारों को मात्र 3 से 4 प्रतिशत स्थान मिलता है।
अमोद कंठ ने किशोर न्याय कानूनों की दी विस्तृत जानकारी
अमोड कंठ ने दूसरे तकनीकी सत्र में किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2015, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 और बाल श्रम संशोधन अधिनियम 2016 सहित विभिन्न बाल संरक्षण कानूनों की विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि मीडिया द्वारा बच्चों की पहचान उजागर करने वाली रिपोर्टिंग बच्चों के भविष्य को गंभीर रूप से प्रभावित करती है और सामाजिक कलंक को बढ़ाती है। सत्र के दौरान पुलिस अधिकारियों ने अपने क्षेत्रीय अनुभव और चुनौतियों को भी साझा किया।
मानसिक स्वास्थ्य और ट्रॉमा आधारित पुलिसिंग पर विशेष सत्र
तीसरे तकनीकी सत्र का संचालन प्रो कल्पना पुरुषोत्तमन ने किया। उन्होंने बच्चों में मानसिक तनाव के लक्षणों की पहचान, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में सहायता और प्रतिकूल बचपन अनुभवों की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने पुलिस अधिकारियों को ट्रॉमा-इन्फॉर्म्ड पुलिसिंग, अधिकार आधारित जांच प्रक्रिया और पूछताछ के बजाय बच्चों की बात ध्यान से सुनने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों की “अपराध कहानी” से ज्यादा उनकी “जीवन कहानी” को समझना जरूरी है।
पॉक्सो कानून और प्रक्रियात्मक प्रावधानों पर हुई चर्चा
चौथे तकनीकी सत्र में पॉक्सो अधिनियम 2012, समर्थन व्यक्तियों की भूमिका, प्रक्रियात्मक प्रोटोकॉल और इसके क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा की गई। यह सत्र सीसीआर-एनएलयूओ की टीम के डॉ. स्वागतिका सामल और डॉ प्रदीप्त के षाड़ंगी द्वारा संचालित किया गया।
दूसरे दिन संस्थागत समन्वय पर फोकस
कार्यक्रम के दूसरे दिन राज्य स्तर के पर्यवेक्षण अधिकारियों और बाल संरक्षण से जुड़े विशेष इकाइयों के बीच संस्थागत समन्वय और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया गया।
बाल सुरक्षा और मानव तस्करी रोकने में सक्रिय है सीएडब्ल्यू एंड सीडब्ल्यू
क्राइम अगेंस्ट वूमेन एंड चिल्ड्रेन विंग, ओडिशा पुलिस की एक विशेष इकाई है, जो महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों की सुरक्षा, सम्मान और कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए कार्य करती है। यह इकाई राज्य में मानव तस्करी रोकने के प्रयासों में भी सक्रिय भूमिका निभा रही है।
बाल अधिकारों पर शोध और नीति निर्माण में सक्रिय है सीसीआर
सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी ओडिशा का सबसे पुराना केंद्र है और देश के प्रमुख बाल अधिकार शोध एवं नीति संस्थानों में शामिल है। यह केंद्र बाल अधिकारों से जुड़े शोध, शिक्षा, नीति निर्माण और जनजागरूकता के क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है।
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