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रजिस्ट्रार से तहसीलदार तक मिलीभगत, भूमाफियाओं का नेटवर्क बेखौफ
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में फर्जी जमीन रजिस्ट्री के मामले अब महज अनियमितता नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध का रूप ले चुके हैं। रजिस्ट्रार कार्यालयों से लेकर तहसील और जिला स्तर तक फैला राजस्व तंत्र इस गोरखधंधे का मौन भागीदार बनता दिख रहा है। भूमाफियाओं का यह जंजाल इतने सुनियोजित ढंग से फल-फूल रहा है कि वर्षों पहले बिक चुकी जमीनों को दोबारा बेचा जा रहा है और असली मालिक दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
जांच में सामने आ रहा है कि कई मामलों में पुराने दस्तावेजों से छेड़छाड़ की गई है। कहीं खसरा-खतौनी बदली जा रही है तो कहीं फाइलों से अहम पन्ने गायब हैं। रिकॉर्ड रूम से दस्तावेजों का रहस्यमय तरीके से लापता होना इस बात की ओर इशारा करता है कि यह खेल बिना अंदरूनी सहयोग के संभव नहीं। जिला स्तर तक के रिकॉर्ड में हेरफेर कर फर्जी रजिस्ट्री कराई जा रही है, जिससे पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
गाजीपुर, बलिया, वाराणसी समेत पूर्वांचल के कई जिलों से लगातार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां जमीन के वास्तविक मालिक को भनक तक नहीं लगी और उसकी संपत्ति किसी और के नाम दर्ज कर दी गई। कई पीड़ितों ने शिकायत की है कि जब वे तहसील या रजिस्ट्री कार्यालय पहुंचे तो उन्हें टाल दिया गया, जबकि फर्जी खरीदारों को सभी औपचारिकताएं आसानी से पूरी करा दी गईं।
विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्व विभाग की कमजोर निगरानी, डिजिटल रिकॉर्ड की अपूर्णता और भ्रष्ट अधिकारियों की सांठगांठ ने भूमाफियाओं को खुला मैदान दे दिया है। जब तक रजिस्ट्री प्रक्रिया की गहन जांच, रिकॉर्ड रूम का ऑडिट और दोषी अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह समस्या और गहराने की आशंका है।
फर्जी जमीन रजिस्ट्री का यह बढ़ता संकट न केवल आम नागरिकों की संपत्ति पर हमला है, बल्कि कानून व्यवस्था और शासन की साख पर भी सीधा सवाल खड़ा करता है। अब निगाहें सरकार पर टिकी हैं कि वह इस जड़ तक फैले घोटाले पर कब और कैसे लगाम कसती है।
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