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Dharmendra Pradhan धर्मेंद्र प्रधान

धर्मेंद्र प्रधान ने 55 विद्वत ग्रंथों का विमोचन किया

  • ओड़िया साहित्य और संस्कृति जगत के लिए एक गौरवमय क्षण बताया

भुवनेश्वर। भारत की भाषायी विरासत और शास्त्रीय भाषाओं के संवर्धन के दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने नई दिल्ली में मंगलवार को कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, ओड़िया, तमिल और सांकेतिक भाषा में तैयार 55 विद्वत ग्रंथों का विमोचन किया।

उन्होंने इस अवसर पर कहा कि भारत की भाषायी विरासत को आगे बढ़ाने और शास्त्रीय भाषाओं को सुदृढ़ करने की दिशा में आज 55 विद्वत ग्रंथों का विमोचन राष्ट्र की बौद्धिक चेतना के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, ओड़िया, तमिल एवं सांकेतिक भाषा में प्रस्तुत ये कृतियाँ भारत की भाषायी विरासत को शिक्षा, अनुसंधान और सांस्कृतिक स्वाभिमान के केंद्र में प्रतिष्ठित करती हैं। तिरुक्कुरल का सांकेतिक भाषा में भावार्थ समावेशी भारत की उस दृष्टि को सशक्त करता है, जहां ज्ञान की पहुंच सभी तक सुनिश्चित हो। यह विमोचन कार्य भारत के बौद्धिक वाङ्मय में एक मूल्यवान योगदान है। ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ भारतीय भाषा आधारित शिक्षा की परिकल्पना को आगे बढ़ाती है। भारत विविधता में एकता का जीवंत उदाहरण है, जहाँ भाषा कभी बाधा नहीं, समाज को जोड़ने का माध्यम रही है। औपनिवेशिक काल की मेकाले सोच के विपरीत, हमारी सभ्यता ने सदैव भाषाओं को संवाद और सांस्कृतिक समरसता का सेतु माना है।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह विचार कि भारत की सभी भाषाएँ राष्ट्रभाषाएँ हैं, लोकतांत्रिक भारत की आत्मा को अभिव्यक्त करता है।

धर्मेंद्र प्रधान ने भारतीय भाषाओं के संवर्धन के इस प्रेरक और दूरदर्शी प्रयास के लिए भारतीय भाषा समिति, तथा सेंट्रल इन्स्टीट्य़ूट आफ क्लैसिकल तमिल को बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं दी है।

प्रधान ने कहा कि ओड़िया भाषा की शास्त्रीय मान्यता को मजबूत करने और इसकी समृद्ध परंपरा को विश्व स्तर पर पहुंचाने के उद्देश्य से ‘शास्त्रीय ओड़िया भाषा अध्ययन केंद्र’ द्वारा 10 प्राचीन और शोधपूर्ण पुस्तकों का विमोचन किया गया, जो अत्यंत हर्ष का अवसर है। इन पुस्तकों में चर्यापद से लेकर मादलापांजी तक, ओड़िया भाषा के समृद्ध शब्द भंडार को एक नई पहचान मिलेगी।

विशेष रूप से, ‘मादलापांजी’ का अंग्रेज़ी और हिंदी अनुवाद और ‘रुद्रसुधानिधि’ का अंग्रेज़ी अनुवाद ओड़िशा के इतिहास और दर्शन को गैर-ओड़िया पाठकों के करीब लाने में सहायक होगा। ये प्रकाशन आगामी पीढ़ी के शोधकर्ताओं और भाषा प्रेमियों के लिए एक मूल्यवान संपत्ति साबित होंगे। उन्होंने सभी शोधकर्ताओं और अनुवादकों को बधाई दी है।

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