Home / Odisha / नहीं रहे पद्मश्री विख्यात न्यूरो सर्जन डॉ अशोक कुमार महापात्र

नहीं रहे पद्मश्री विख्यात न्यूरो सर्जन डॉ अशोक कुमार महापात्र

  •     73 वर्ष की आयु में एम्स दिल्ली में ली अंतिम सांस

  •     एम्स भुवनेश्वर के संस्थापक निदेशक के रूप में निभाई थी अहम भूमिका

  •     जगन्नाथ और बलिया नाम से चर्चित जुड़वां बच्चों को अलग करने वाली ऐतिहासिक सर्जरी का किया था नेतृत्व

  •  मुख्यमंत्री के साथ अन्य मंत्रियों और नेताओं ने गहरा शोक जताया

भुवनेश्वर। देश के प्रख्यात न्यूरो सर्जन, पद्मश्री सम्मानित और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भुवनेश्वर के संस्थापक निदेशक प्रोफेसर (डॉ) अशोक कुमार महापात्र का सोमवार शाम निधन हो गया। वे 73 वर्ष के थे। उन्होंने नई दिल्ली स्थित एम्स में उपचार के दौरान अंतिम सांस ली। उनके निधन से चिकित्सा जगत, विशेषकर ओडिशा में शोक की लहर दौड़ गई है। मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी के साथ अन्य मंत्रियों और नेताओं ने गहरा शोक जताया है।

29 दिसंबर 1952 को ओडिशा के पुरी में जन्मे डॉ महापात्र को तेज सिरदर्द की शिकायत के बाद भुवनेश्वर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। स्वास्थ्य में गिरावट आने पर 2 अक्टूबर को उन्हें एम्स नई दिल्ली स्थानांतरित किया गया था। वहां न्यूरो सर्जरी विभाग में उनका उपचार चल रहा था। बताया जा रहा है कि मस्तिष्क संबंधी जटिलताओं के कारण उनका निधन हुआ।

जगन्नाथ और बलिया को अलग करने पर मिली राष्ट्रीय पहचान

डॉ महापात्र को पूरे देश में विशेष पहचान वर्ष 2017 में मिली, जब उन्होंने ओडिशा के कंधमाल जिले के सिर से जुड़े जुड़वां बच्चों जगन्नाथ और कालिया (जगा और बलिया) को अलग करने वाली ऐतिहासिक सर्जरी का नेतृत्व किया था।

नई दिल्ली स्थित एम्स में कई चरणों में हुई इस जटिल सर्जरी में लगभग 30 विशेषज्ञ चिकित्सकों की बहुविषयक टीम शामिल थी। भारत में अपनी तरह की यह पहली सफल सर्जरी थी। इस उपलब्धि ने भारतीय चिकित्सा विज्ञान और न्यूरो सर्जरी के क्षेत्र में एक नया इतिहास रचा। डॉ. महापात्र स्वयं इस सर्जरी को अपने चिकित्सा जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक मानते थे।

एम्स भुवनेश्वर की स्थापना में निभाई ऐतिहासिक भूमिका

ओडिशा की धरती से गहरा जुड़ाव रखने वाले डॉ महापात्र ने ब्रह्मपुर स्थित एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की थी। इसके बाद उन्होंने एम्स नई दिल्ली से एमएस और न्यूरो सर्जरी में एमसीएच की डिग्री हासिल की।

करीब चार दशक तक एम्स नई दिल्ली से जुड़े रहे डॉ महापात्र ने न्यूरो सर्जरी विभागाध्यक्ष, न्यूरोसाइंसेज सेंटर के प्रमुख और अनुसंधान अधिष्ठाता जैसे महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दीं।

वर्ष 2012 में उन्हें एम्स भुवनेश्वर का संस्थापक निदेशक नियुक्त किया गया। उनके नेतृत्व में इस संस्थान की शुरुआती संरचना और विकास को दिशा मिली। इसके अलावा उन्होंने लखनऊ स्थित संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के निदेशक तथा भुवनेश्वर स्थित शिक्षा ‘ओ’ अनुसंधान विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में भी सेवाएं दीं। हाल के वर्षों में वे इसी विश्वविद्यालय में स्वास्थ्य विज्ञान के प्रधान सलाहकार के रूप में कार्यरत थे।

पद्मश्री सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से हुए सम्मानित

चिकित्सा और अनुसंधान के क्षेत्र में उनके योगदान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। उन्होंने सैकड़ों शोध पत्रों और कई पुस्तकों के माध्यम से चिकित्सा विज्ञान को समृद्ध किया। उन्होंने नई पीढ़ी के अनेक न्यूरो सर्जनों को प्रशिक्षित किया और विशेष रूप से बाल न्यूरो सर्जरी के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।

वर्ष 2022 में उन्हें ओडिशा बिग्यान अकादमी की ओर से सीवी रमन वैज्ञानिक उत्कृष्टता पुरस्कार प्रदान किया गया। चिकित्सा क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2024 में उन्हें पद्मश्री सम्मान देने की घोषणा की थी। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने वर्ष 2025 में उन्हें यह सम्मान प्रदान किया था।

चिकित्सा जगत में अपूरणीय क्षति

डॉ महापात्र को ऐसे चिकित्सक के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने मरीजों को नया जीवन देने के लिए अपनी विशेषज्ञता और अनुभव का भरपूर उपयोग किया। वे चिकित्सा उत्कृष्टता के साथ-साथ संस्थान निर्माण की दूरदर्शिता और मानवीय संवेदनशीलता के लिए भी जाने जाते थे।

उनके निधन पर चिकित्सा जगत, शिक्षाविदों, राजनीतिक नेतृत्व और देशभर के शुभचिंतकों ने शोक व्यक्त किया है। जुड़वां बच्चों को अलग करने वाली ऐतिहासिक सर्जरी और एम्स भुवनेश्वर की स्थापना में उनके योगदान के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। भारतीय न्यूरो सर्जरी के इतिहास में उनका नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज रहेगा।

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