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अक्टूबर में चार बड़े तूफानों ने छोड़े हैं विनाश के निशान

  • 1999 के महाचक्रवात से लेकर 2024 के दाना तक ने रची है बर्बादी

  • कई बार प्रकृति के प्रकोप का सामना कर चुका है ओडिशा का तटीय क्षेत्र

हेमन्त कुमार तिवारी, भुवनेश्वर।

बंगाल की खाड़ी में चक्रवाती तूफान की आशंका के बीच ओडिशा के लिए अक्टूबर का महीना एक बार फिर चिंता बढ़ा रहा है। इतिहास गवाह है कि अक्टूबर में ओडिशा के तटीय इलाकों को कई विनाशकारी चक्रवातों का सामना करना पड़ा है। वर्ष 1999 के महाचक्रवात से लेकर 2013 के फैलिन, 2018 के तितली और 2024 के दाना तक, इन तूफानों ने राज्य के तटीय क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई। इन घटनाओं ने आपदा प्रबंधन, समय पर चेतावनी और प्रशासनिक तैयारी के महत्व को भी रेखांकित किया है।

1999 का महाचक्रवात: ओडिशा के इतिहास की भयावह त्रासदी

29 अक्टूबर 1999 को आए महाचक्रवात ने ओडिशा के तटीय क्षेत्रों में अभूतपूर्व तबाही मचाई थी। जगतसिंहपुर जिले के एरसमा और पारादीप सहित कई इलाके इसकी चपेट में आए। तूफान के दौरान हवा की गति 260 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक बताई गई थी। इस आपदा में हजारों लोगों की जान चली गई और व्यापक स्तर पर मकानों, फसलों तथा बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा। यह घटना आज भी ओडिशा के आपदा इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में गिनी जाती है।

फाइलिन ने मचाई थी व्यापक तबाही

अक्टूबर 2013 में चक्रवात फाइलिन ने गोपालपुर के निकट ओडिशा के तट पर दस्तक दी थी। इसकी हवा की गति लगभग 200 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच गई थी। तेज हवाओं और भारी बारिश से कई जिलों में जनजीवन प्रभावित हुआ। हालांकि, बड़े पैमाने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की प्रशासनिक कार्रवाई ने संभावित जनहानि को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

तितली से गजपति और रायगड़ा में भारी नुकसान

अक्टूबर 2018 में चक्रवात तितली ने ओडिशा के दक्षिणी हिस्सों को प्रभावित किया। इसका असर विशेष रूप से गजपति और रायगड़ा जिलों में देखने को मिला, जहां भारी बारिश के कारण भूस्खलन और बाढ़ जैसी परिस्थितियां पैदा हुईं। कई क्षेत्रों में सड़क संपर्क प्रभावित हुआ और लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इस चक्रवात ने स्पष्ट किया कि समुद्र तट से दूर स्थित पहाड़ी जिलों में भी चक्रवाती बारिश गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।

दाना के दौरान प्रशासनिक तैयारी से टली बड़ी जनहानि

अक्टूबर 2024 में चक्रवात दाना ने भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान के आसपास के तटीय क्षेत्र में दस्तक दी थी। इसके प्रभाव से ओडिशा के आठ तटीय जिले प्रभावित हुए। प्रशासन ने पहले से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने, राहत केंद्र तैयार रखने और आपातकालीन सेवाओं को सक्रिय करने जैसे कदम उठाए थे। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इन तैयारियों के बीच चक्रवात के कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु नहीं हुई। यह अनुभव बताता है कि समय पर चेतावनी, व्यापक निकासी और प्रशासनिक समन्वय आपदा के दौरान जनजीवन की रक्षा में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

इतिहास से सबक, सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव

ओडिशा में अक्टूबर के दौरान आए इन चक्रवातों का इतिहास बताता है कि बंगाल की खाड़ी में विकसित होने वाली मौसम प्रणालियों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। हालांकि, प्रत्येक चक्रवात की दिशा, तीव्रता और प्रभाव अलग-अलग होते हैं, इसलिए पुराने अनुभवों के आधार पर वर्तमान तूफान की गंभीरता का अनुमान निश्चित रूप से नहीं लगाया जा सकता।

वर्तमान चक्रवाती खतरे के बीच मौसम विभाग की चेतावनियों पर ध्यान देना, प्रशासन के निर्देशों का पालन करना और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित स्थानों पर जाना बेहद जरूरी है। 1999 की त्रासदी से लेकर दाना के दौरान मिली सीख तक, ओडिशा का अनुभव यही बताता है कि समय रहते तैयारी और सतर्कता से जनहानि के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

 

 

 

 

 

 

 

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