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न मंत्रिमंडल का विस्तार, न बोर्ड-निगमों में नियुक्तियां
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मेहनत करने वाले नेताओं की अनदेखी से बढ़ रहा अंदरूनी असंतोष
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सम्मान और अवसर की अनदेखी कई बार बन चुकी है बड़े बदलावों की वजह
हेमंत कुमार तिवारी, भुवनेश्वर।
ओडिशा में मोहन चरण माझी सरकार ने अपने कार्यकाल के दो वर्ष पूरे कर लिए हैं, लेकिन भाजपा के हजारों नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए राजनीतिक इंतजार अब भी जारी है। अब उनके सामने सिर्फ तीन साल का कार्यकाल ही बचा है, क्योंकि इन दो सालों में न मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ, न ही बोर्ड-निगमों और आयोगों के सैकड़ों पदों पर नियुक्तियां हो सकीं।
चुनाव में दिन-रात मेहनत करने वाले कई नेताओं के बीच यह भावना गहराने लगी है कि उनके योगदान को अपेक्षित सम्मान नहीं मिल रहा। राजनीतिक इतिहास बताता है कि सम्मान और अवसर की अनदेखी कई बार बड़े बदलावों की वजह बनती है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ऐसे उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी पूर्व पार्टियों में उपेक्षा महसूस करने के बाद नया राजनीतिक रास्ता चुना और बाद में नई पहचान बनाई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ओडिशा भाजपा समय रहते अपने समर्पित कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को पूरा कर पाएगी, या फिर बढ़ता असंतोष भविष्य में नए राजनीतिक समीकरणों को जन्म देगा।
ओडिशा में मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी सरकार अपने कार्यकाल के दो वर्ष पूरे पर अपनी उपलब्धियों का लेखा-जोखा जनता के सामने रख रही है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के भीतर एक अलग तरह की चर्चा भी जोर पकड़ रही है। चर्चा इस बात की है कि चुनाव के दौरान दिन-रात मेहनत करने वाले अनेक नेता और कार्यकर्ता आज भी संगठन और सरकार में उचित जिम्मेदारी मिलने का इंतजार कर रहे हैं।
लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भाजपा को ऐतिहासिक जीत दिलाने के लिए हजारों कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव जाकर अभियान चलाया, बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत किया और जनता के बीच पार्टी का संदेश पहुंचाया। स्वाभाविक रूप से ऐसे कार्यकर्ताओं और नेताओं को यह उम्मीद रहती है कि उनकी मेहनत का सम्मान होगा और उन्हें सरकार या संगठन में उचित अवसर मिलेगा। लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी न तो मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ है और न ही विभिन्न बोर्डों, निगमों, आयोगों और प्राधिकरणों में बड़ी संख्या में अध्यक्ष एवं सदस्यों के पद भरे गए हैं।
सैकड़ों पद अब भी खाली, इंतजार में बैठे नेता
ओडिशा में विभिन्न बोर्डों, निगमों, विकास प्राधिकरणों और आयोगों में चेयरमैन, उपाध्यक्ष और अन्य महत्वपूर्ण पदों की संख्या सैकड़ों में है। परंपरागत रूप से इन पदों पर संगठन के अनुभवी और समर्पित कार्यकर्ताओं को अवसर देकर उनके योगदान का सम्मान किया जाता रहा है। इससे न केवल कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ता है, बल्कि स्थानीय स्तर पर पार्टी का जनाधार भी मजबूत होता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी जिले या क्षेत्र का स्थानीय नेता किसी बोर्ड या निगम का अध्यक्ष बनता है, तो उसे केवल व्यक्तिगत सम्मान के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उस क्षेत्र के मतदाताओं और कार्यकर्ताओं के सम्मान के रूप में भी माना जाता है। इससे जनता को यह संदेश जाता है कि उनके क्षेत्र को सरकार में प्रतिनिधित्व मिला है। लेकिन यदि लंबे समय तक ऐसी नियुक्तियां नहीं होतीं, तो धीरे-धीरे कार्यकर्ताओं के बीच निराशा और अंदरूनी असंतोष पनपने लगता है।
सत्ता का लाभ किसे?
पार्टी के भीतर यह भी चर्चा है कि वर्षों तक संगठन के लिए संघर्ष करने वाले अनेक नेताओं की तुलना में कुछ चुनिंदा लोगों या हाल के वर्षों में अन्य दलों से आए नेताओं को अधिक प्राथमिकता मिली है। हालांकि इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं है, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसी चर्चाएं लगातार सुनाई दे रही हैं। कई पुराने कार्यकर्ता मानते हैं कि संगठन के प्रति उनकी निष्ठा और वर्षों की मेहनत का उचित प्रतिफल अभी तक नहीं मिला है।
राजनीति में सम्मान की अहम भूमिका
भारतीय राजनीति में केवल पद ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि सम्मान और भागीदारी की भावना भी उतनी ही मायने रखती है। जब किसी नेता या कार्यकर्ता को यह महसूस होता है कि उसके योगदान की उपेक्षा हो रही है, तो उसके मन में असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है। यही असंतोष समय के साथ बड़े राजनीतिक बदलावों का कारण भी बन सकता है।
इसके उदाहरण देश की राजनीति में पहले भी देखने को मिले हैं। असम के वर्तमान मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और पश्चिम बंगाल में भाजपा के प्रमुख नेताओं में शामिल शुभेंदु अधिकारी ऐसे नेताओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने अपनी पूर्व पार्टियों में अपेक्षित सम्मान और भूमिका नहीं मिलने की भावना के बाद नया राजनीतिक रास्ता चुना और बाद में भाजपा में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया। इन उदाहरणों का अक्सर यह संदेश देने के लिए उल्लेख किया जाता है कि राजनीति में सम्मान और अवसर की अनदेखी दूरगामी परिणाम ला सकती है।
समय का चक्र हमेशा चलता रहता है
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि संगठन के समर्पित कार्यकर्ताओं और नेताओं की अपेक्षाओं पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो अंदरूनी असंतोष भविष्य में बड़ी चुनौती का रूप ले सकता है। राजनीति में समय का चक्र निरंतर बदलता रहता है और आज जो कार्यकर्ता उपेक्षित महसूस कर रहा है, वही कल किसी नए राजनीतिक समीकरण का केंद्र भी बन सकता है।
आने वाले तीन साल होंगे निर्णायक
मोहन सरकार के सामने अभी तीन वर्ष का कार्यकाल शेष है। ऐसे में मंत्रिमंडल विस्तार, बोर्ड-निगमों में नियुक्तियां और संगठन के समर्पित कार्यकर्ताओं को उचित जिम्मेदारियां देना केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन और संगठनात्मक मजबूती का भी महत्वपूर्ण विषय बन गया है। यदि सरकार और पार्टी नेतृत्व समय रहते इन अपेक्षाओं को संबोधित करता है, तो इससे न केवल कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा बल्कि संगठन की जड़ों को भी और मजबूती मिलेगी। वहीं, यदि यह इंतजार लंबा खिंचता है, तो राजनीतिक गलियारों में उठ रहे असंतोष के स्वर और तेज हो सकते हैं।
मोहन की शुभकामनाओं पर समर्थकों का छलका गुस्सा
राज्यसभा के लिए देवाशीष सामंतराय के निर्विरोध चुने जाने के बाद मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी द्वारा सोशल मीडिया पर दिए गए शुभकामना संदेश पर लोगों का गुस्सा भी खुलकर सामने आया। यह मौका मोहन सरकार के दो साल पूरे होने का रहा है। मोहन माझी के पोस्ट पर कमेंट करते हुए सोशल मीडिया यूजर ने अपनी नाराजगी व्यक्त की। सवाल उठाए कि पार्टी में वर्षों से मेहनत करने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं को आखिर कब अवसर मिलेगा। कई लोगों ने टिप्पणी करते हुए आरोप लगाया कि संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने वाले पुराने कार्यकर्ताओं की लगातार अनदेखी हो रही है।
उपेक्षा से बढ़ रहा असंतोष
समर्थकों का कहना है कि चुनाव के दौरान बूथ स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक दिन-रात मेहनत करने वाले कार्यकर्ताओं की स्वाभाविक अपेक्षा होती है कि उनकी निष्ठा और परिश्रम का सम्मान होगा तथा उन्हें संगठन या सरकार में उचित अवसर मिलेगा। लेकिन जब महत्वपूर्ण पदों और राजनीतिक जिम्मेदारियों में उन्हें प्राथमिकता नहीं मिलती, तो उनके भीतर निराशा और असंतोष पनपने लगता है। कई प्रतिक्रियाओं में नेतृत्व से आग्रह किया गया कि यदि पार्टी को दीर्घकाल तक मजबूत बनाए रखना है, तो समर्पित कार्यकर्ताओं के योगदान को पहचानते हुए उन्हें भी उचित प्रतिनिधित्व और जिम्मेदारी देनी होगी, क्योंकि यही कार्यकर्ता किसी भी राजनीतिक संगठन की वास्तविक ताकत होते हैं।
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