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कहा- तभी नई शिक्षा नीति का प्रभावी क्रियान्वयन संभव
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सामान्य, तकनीकी और कृषि शिक्षा को अलग-अलग मंत्रालयों में बांटने से समन्वय की कमी
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विशेषज्ञों को साथ लेकर एकीकृत शिक्षा व्यवस्था बनाने की जरूरत
भुवनेश्वर। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रोफेसर रघुराज किशोर तिवारी ने देश की शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधार की आवश्यकता बताते हुए कहा कि सभी प्रकार की शिक्षा को एक ही मंत्रालय के अधीन लाया जाना चाहिए, ताकि शिक्षा नीतियों का प्रभावी और समान रूप से क्रियान्वयन हो सके। उन्होंने कहा कि वर्तमान में सामान्य शिक्षा शिक्षा मंत्रालय के अधीन है, तकनीकी शिक्षा अलग व्यवस्था में संचालित होती है तथा कृषि शिक्षा कृषि मंत्रालय के अधीन आती है। इससे शिक्षा व्यवस्था में समन्वय की कमी दिखाई देती है।
विशेष बातचीत के दौरान तिवारी ने कहा कि यदि सभी शिक्षाओं को एकीकृत कर एक मंत्रालय के अधीन लाया जाए और उसमें विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया जाए, तो योजनाओं को लागू करने में काफी आसानी होगी। इससे शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता आएगी और विद्यार्थियों को भी बेहतर अवसर मिल सकेंगे।
उन्होंने कहा कि भारत की शिक्षा व्यवस्था केवल डिग्री आधारित न होकर ज्ञान और कौशल आधारित होनी चाहिए। भारतीय ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा कोई शब्द नहीं जिससे मंत्र नहीं बन सकता, यह भारत की गहरी वैचारिक और वैज्ञानिक परंपरा को दर्शाता है। उन्होंने चरक संहिता का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत में प्राचीन काल से चिकित्सा, विज्ञान, दर्शन और जीवन पद्धति पर गंभीर अनुसंधान होता रहा है। इसलिए भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
सभी अच्छे विषय और पाठ्यक्रम सभी विश्वविद्यालयों में लागू हो
तिवारी ने कहा कि देश के सभी अच्छे विषय और पाठ्यक्रम सभी विश्वविद्यालयों में लागू होने चाहिए। कई बार देखा जाता है कि कुछ चुनिंदा संस्थानों में ही बेहतर पाठ्यक्रम और संसाधन उपलब्ध होते हैं, जबकि अन्य विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी उससे वंचित रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करना आवश्यक है।
शिक्षकों की भारी कमी पर चिंता व्यक्त
उन्होंने उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों की भारी कमी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि स्थायी शिक्षकों और योग्य संकाय सदस्यों की कमी शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रही है। कई विश्वविद्यालय और महाविद्यालय अतिथि शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं, जिससे विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पा रही।
निजी विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए
तिवारी ने निजी विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि निजी विश्वविद्यालय केवल डिग्री बांटने का अड्डा नहीं बनने चाहिए। शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए सख्त मान्यता और मूल्यांकन व्यवस्था आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मान्यता प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाया जाना चाहिए ताकि केवल गुणवत्तापूर्ण संस्थानों को ही मान्यता मिल सके।
चॉइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम प्रभावी बने
उन्होंने कहा कि स्नातक स्तर की शिक्षा को अधिक व्यवस्थित और उपयोगी बनाने की आवश्यकता है। इसके लिए चॉइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम को स्पष्ट और प्रभावी तरीके से परिभाषित किया जाना चाहिए, ताकि विद्यार्थियों को विषय चयन में वास्तविक स्वतंत्रता मिल सके और वे अपनी रुचि एवं कौशल के अनुसार अध्ययन कर सकें।
मजबूत डिजिटल मंच उपलब्ध होना चाहिए
तिवारी ने शिक्षा के डिजिटलीकरण पर जोर देते हुए कहा कि विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए मजबूत डिजिटल मंच उपलब्ध होना चाहिए। डिजिटल शिक्षा व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ेगी और अध्ययन सामग्री तक सभी की समान पहुंच सुनिश्चित हो सकेगी। उन्होंने कहा कि आज के समय में तकनीक आधारित शिक्षा व्यवस्था बेहद जरूरी हो गई है।
शैक्षणिक संस्थानों में फर्जी उपस्थिति पर चिंता जताई
उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों में फर्जी उपस्थिति की समस्या पर भी चिंता जताई। तिवारी ने कहा कि कई स्थानों पर वास्तविक पढ़ाई के बजाय केवल उपस्थिति और औपचारिकताओं पर ध्यान दिया जाता है। इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है।
साथ मिलकर करना होगा काम
उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के माध्यम से देश में समग्र, कौशल आधारित और अनुसंधान उन्मुख शिक्षा व्यवस्था विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ शिक्षा संस्थानों, शिक्षकों और समाज को मिलकर काम करना होगा। तभी भारत को फिर से ज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में विश्व नेतृत्व दिलाया जा सकेगा।
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