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2036 तक बनेगा रेशम उद्योग का बड़ा केंद्र
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20 हेक्टेयर में बेकार जमीन पर लौटी हरियाली
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टाटा स्टील फाउंडेशन ने ओडिशा के जंगलों में फिर जगाई टसर सिल्क की खोई विरासत
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सुकिंदा की मूल ‘इकोरेस’ टसर प्रजाति को पुनर्जीवित करने की अनोखी पहल
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एक साथ हो रहा टसर, वन और पक्षी का संरक्षण
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17,600 तक पहुंचा जंगली कोकून
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ग्रामीण आजीविका और जंगल संरक्षण दोनों को मिला नया जीवन
भुवनेश्वर। विकसित ओडिशा की राह में सुकिंदा आज एक ऐतिहासिक बदलाव का साक्षी बन रहा है, जहां टसर और वन संरक्षण, 20 हेक्टेयर बंजर भूमि पर लौटी हरियाली, आदिवासी समुदाय की मूल आजीविका का पुनर्जीवन और पक्षियों की वापस गूंजती चहचहाहट, इन सभी का दुर्लभ संगम एक साथ आकार ले रहा है।
टाटा स्टील फाउंडेशन की अनोखी पहल से ‘इकोरेस’ जैसी मूल टसर प्रजाति का पुनर्जीवन, 17,600 जंगली कोकून का पुनरुत्थान और ग्रामीण आजीविका में नई सांस भरने वाली पहल ने न सिर्फ ओडिशा की खोई रेशम विरासत को वापस लौटायी है, बल्कि 2036 तक इसे देश के प्रमुख तसर केंद्र के रूप में स्थापित करने की नींव भी मजबूत कर दी है।
ओडिशा के जाजपुर जिले के सुकिंदा की शांत धरती इन दिनों एक ऐसे परिवर्तन की गवाही दे रही है, जिसकी चमक आने वाले वर्षों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण और राज्य के उद्योग जगत को नई दिशा देगी। जहां कभी टसर के सुनहरे धागों का साम्राज्य था, वहीं औद्योगिक बदलाव और जंगलों के क्षरण ने इस पारंपरिक रेशम को लगभग विलुप्त कर दिया था। मूल सुकिंदा इकोरेस टसर प्रजाति पड़ोसी जिलों की ओर पलायन कर गई थी। आदिवासी परिवारों की आजीविका टूट गई, जंगलों की जैवविविधता कमजोर हुई और पक्षियों की चहचहाहट भी कम होती गई।
लेकिन आज तस्वीर बदल रही है। यह बदलाव किसी एक प्रयास का परिणाम नहीं, यह तीन समानांतर संरक्षण मॉडलों का अनूठा संगम है। पहला संरक्षण टसर की मूल सुकिंदा इकोरेस प्रजाति का पुनरुत्थान, दूसरा 20 हेक्टेयर बेकार जमीन पर वन संरक्षण का नया अध्याय रचा गया है। तीसरा संरक्षण इन क्षेत्रों में पक्षियों का सुरक्षित प्राकृतिक आवास का निर्माण मान कर लौटना है।
यह तीन-स्तरीय मॉडल सुकिंदा को 2036 तक “इको-इंडस्ट्रियल और आजीविका हब” बनाने की क्षमता रखता है और विकसित ओडिशा की दिशा में एक बड़ा कदम।
टसर संरक्षण बन रहा संघर्ष और उम्मीद का धागा
2015 में टाटा स्टील फाउंडेशन ने बामनीपाल से टसर संरक्षण कार्यक्रम की शुरुआत की। यह शुरुआत सिर्फ 450 जंगली कोकून से हुई और आज यह संख्या 17,600 तक पहुंच चुकी है। अगले 4-5 वर्षों में एक लाख सीड कोकून उत्पादन तक पहुंचने का लक्ष्य है।
सुकिंदा-जाजपुर क्षेत्र में टसर के लिए अनुकूल 26 हेक्टेयर वन क्षेत्र विकसित किए जा चुके हैं, जिन्हें 180 हेक्टेयर तक ले जाने की तैयारी है।
बदल रहा लोगों का जीवन
लेकिन इन आंकड़ों से भी बड़ी कहानी है लोगों की, जिनका जीवन बदल रहा है। 20 किसान अब सीधे टसर उत्पादन में जुड़े हैं, जबकि 1,200 से अधिक ग्रामीण सहायक कार्यों से स्थायी आय पा रहे हैं।
एक किसान ने भावुक होकर कहा कि टसर पालन ने केवल हमारी गरीबी नहीं मिटाई, हमारी पहचान लौटा दी। बच्चे पढ़ पा रहे हैं, घर संभल रहा है और जंगल हमारे साथी बन गए हैं।
जंगल, जीवन और जन-समृद्धि का नया मॉडल
सुकिंदा में विकसित 20 हेक्टेयर का हरियाली वन क्षेत्र केवल हरियाली नहीं उगा रहा है, बल्कि यह आशा, रोजगार और संरक्षण की नई संस्कृति उगा रहा है।
यहां लगाए गए पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं, बल्कि ये वही होस्ट प्लांट हैं जिन पर टसर की मूल प्रजाति फलती-फूलती है।
शांत माहौल पर फिदा हुए पक्षी
इसी क्षेत्र में शांत माहौल पर पक्षी भी फिदा हो गए हैं और यह पक्षियों के लिए सुरक्षित आवास भी बन गया है। यहां अब पक्षियों का एक झुंड ने अपने बसेरा बनाए हुए है।
एक कोकून से निकलता है दो किलोमीटर लंबा धागा
टसर की प्राकृतिक विलासिता इसी तथ्य से समझी जा सकती है कि एक अकेले कोकून से लगभग 2 किलोमीटर लंबा रेशम धागा निकलता है। यह अद्भुत प्राकृतिक प्रक्रिया टसर को इंटरनेशनल मार्केट में सबसे प्रतिष्ठित रेशमों में शामिल करती है। ओडिशा के पुनर्जीवित टसर उद्योग से ग्रामीण महिलाओं, विशेषकर आदिवासी परिवारों, को नई आर्थिक स्वतंत्रता मिल रही है।
2036 होगा सुकिंदा की नई पहचान का वर्ष
ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने 2036 तक ओडिशा को एक विकसित राज्य के रूप में स्थापित करने का सपना देखा है। ओडिशा एक आदिवासी बहुल प्रदेश है। ऐसी स्थिति में जाजपुर का सुकिंदा आदिवासियों लोगों को उनके मौलिक रोजगार से जोड़कर रेशम उद्योग को एक नया रूप दे रहा है और साल 2036 सुकिंदा के लिए एक नई पहचान का साल होगा। उम्मीद जताई जा रही है कि 2036 तक सुकिंदा रेशम उद्योग का एक बड़ा केंद्र के रूप में उभर जाएगा और यहां के उत्पाद विदेश बाजारों में अपनी पहुंच बनाएगा। इसके साथ ही वन संरक्षण जलवायु परिवर्तन के खिलाफ प्रभावी ढाल बनेगा तथा पक्षी संरक्षण से जैव विविधता का पुनरुत्थान होगा। सामुदायिक भागीदारी विकसित ओडिशा की सबसे बड़ी ताकत होगी।
सिर्फ भारत में होता है चारों रेशम का उत्पादन
भारत दुनिया का एकमात्र देश है, जो चार प्रमुख प्रकार के प्राकृतिक रेशम, मलबरी, टसर, एरी और मूगा, का उत्पादन करता है। इनमें से टसर रेशम ओडिशा की पारिस्थितिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। प्राकृतिक सुनहरे रंग और उच्च गुणवत्ता वाला यह टसर सिल्क दशकों पहले तक सुकिंदा के जंगलों में पनपता था। लेकिन वन कटाव, औद्योगिक विस्तार और पर्यावरणीय क्षरण ने इसकी संख्या को तेजी से घटा दिया। अब इसे पुनर्जीवित करने के लिए टाटा स्टील फाउंडेशन ने 2015 में केन्दुझर के बामनीपाल से तसर संवर्धन कार्यक्रम की शुरुआत की।
विस्तृत रोडमैप के तहत हुआ काम
सेंट्रल टसर रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट और सेंट्रल सिल्क बोर्ड के सहयोग से सुकिंदा इकोरेस को संरक्षित करने के लिए एक विस्तृत रोडमैप तैयार किया गया। प्रशिक्षित किसानों को बीज उत्पादन, होस्ट प्लांट प्रबंधन और वैज्ञानिक पालन तकनीकें सिखाई गईं। आज इन किसानों के चेहरे खिल उठे हैं।
ग्रामीण सशक्तिकरण और समावेशी विकास को भी बढ़ावा
टाटा स्टील फ़ाउंडेशन के क्लस्टर हेड देवांजन मुखर्जी ने कहा कि सुकिंदा इकोरेस का पुनरुत्थान समुदाय आधारित संरक्षण मॉडल को मजबूत करता है, जो आजीविका को स्थायी बनाते हुए पारिस्थितिक संतुलन पुनर्स्थापित करता है। पारंपरिक ज्ञान और विज्ञान के संयोजन से हम न केवल एक अनोखे आनुवांशिक संसाधन को बचा रहे हैं, बल्कि ग्रामीण सशक्तिकरण और समावेशी विकास को भी बढ़ावा दे रहे हैं।
यह पहल संयुक्त राष्ट्र के कई सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स, महिला सशक्तिकरण, सम्मानजनक कार्य, जलवायु संरक्षण और भूमि पर जीवन, में भी योगदान कर रही है। प्रकृति-आधारित समाधानों (एनबीएस) के लिए आईयूसीएन वैश्विक मानक के अनुरूप इस मॉडल ने स्थानीय स्वामित्व, क्षमता निर्माण और शासन को प्राथमिकता दी। वित्त वर्ष 26 में हुए आकलन में इसे 61% स्कोर मिला, जो एनबीएस मान्यता की न्यूनतम सीमा 25% से कहीं अधिक है।
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