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शैक्षणिक उत्कृष्टता और साक्ष्य-आधारित नीति नेतृत्व के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई
भुवनेश्वर। नवकृष्ण चौधरी विकास अध्ययन केंद्र (एनसीडीएस), भुवनेश्वर ने योजना एवं समन्वय विभाग, ओडिशा सरकार के अधीन भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के सहयोग से आयोजित 10 दिवसीय उन्नत शोध पद्धति पाठ्यक्रम का सफलतापूर्वक समापन किया। 2 से 11 फरवरी 2026 तक चले इस कार्यक्रम ने संस्थान की शैक्षणिक उत्कृष्टता, अंतर्विषयक अनुसंधान और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण के प्रति प्रतिबद्धता को पुनः रेखांकित किया।
देशभर से 70 शोधार्थियों की भागीदारी
इस पाठ्यक्रम में देश के लगभग 20 राज्यों से आए 70 शोधार्थियों और पेशेवरों ने भाग लिया, जिनमें 35 प्रतिभागी ऑफलाइन तथा 35 ऑनलाइन माध्यम से जुड़े। हाइब्रिड प्रारूप ने राष्ट्रीय स्तर पर समावेशी सहभागिता सुनिश्चित की और विभिन्न संस्थानों के बीच शैक्षणिक संवाद को सशक्त बनाया।
शोध डिजाइन से डेटा एनालिटिक्स तक गहन प्रशिक्षण
प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत प्रतिभागियों को शोध डिजाइन, व्यवस्थित साहित्य समीक्षा, सांख्यिकीय विश्लेषण, अर्थमितीय मॉडलिंग और उन्नत सामाजिक-आर्थिक डेटा विश्लेषण का संरचित प्रशिक्षण प्रदान किया गया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, उत्कल विश्वविद्यालय, मुंबई विश्वविद्यालय, अमृता विश्वविद्यालय और एनसीडीएस के प्रतिष्ठित संकाय सदस्यों ने सत्रों का संचालन किया। विशेष तकनीकी मॉड्यूल जैसे पायथन प्रोग्रामिंग, अनुप्रयुक्त अर्थमिति और कम्प्यूटेशनल शोध उपकरणों ने प्रतिभागियों को डेटा-आधारित अनुसंधान की समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप दक्ष बनाया।
एआई और मशीन लर्निंग पर विशेष फोकस
सामाजिक विज्ञान अनुसंधान के बदलते परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम में डेटा एनालिटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग को शोध पद्धति के साथ जोड़ा गया। पीआरआईएसएमए पद्धति, शोध वित्तपोषण रणनीतियां, एआई युग में शोध नैतिकता और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के नीति-दृष्टिकोण जैसे विषयों पर विशेषज्ञ व्याख्यान आयोजित किए गए। पाठ्यक्रम में तकनीकी नवाचार के साथ-साथ नैतिक जिम्मेदारी, लैंगिक संवेदनशीलता और गुणात्मक दृष्टिकोण के संतुलन पर विशेष बल दिया गया।
राष्ट्रीय शोध क्षमता सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
कार्यक्रम की सफल पूर्णता को राष्ट्रीय शोध क्षमता को सुदृढ़ करने, सहयोगात्मक और प्रौद्योगिकी-सक्षम अनुसंधान को बढ़ावा देने तथा नीति-प्रासंगिक अकादमिक सहभागिता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
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