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मुनाफे के समय कर के रूप में सरकार को मिलती है लाभ की हिस्सेदारी
सवाल कर्ज माफी का नहीं, रिश्ते की बराबरी का है-जब किसी कंपनी की सफलता में सरकार कर के रूप में हिस्सेदार होती है, तो क्या संकट के समय व्यवस्था की जिम्मेदारी केवल वसूली तक सीमित रहनी चाहिए?
क्या किसी कंपनी का वर्षों का कर योगदान, रोजगार सृजन और अर्थव्यवस्था में भूमिका उसके संकट के समय उसके प्रति नीति और व्यवहार तय करने में कोई महत्व नहीं रखती?
वर्षों तक हजारों करोड़ का कर देने वाली कंपनियां जब संकट में आती हैं तो क्या सरकार को केवल कर वसूलने तक सीमित रहना चाहिए?
हेमन्त कुमार तिवारी भुवनेश्वर।

जब भी किसी बड़े कार्पोरेट का कर्ज माफ करने या उसे संकट से उबारने की बात सामने आती है, सवालों और विरोध की आवाजें तेज हो जाती हैं। आरोप लगते हैं कि आखिर बड़े उद्योगपतियों को राहत क्यों दी जा रही है? लेकिन क्या बहस का दूसरा पहलू भी उतनी ही गंभीरता से देखा जाता है-जिस कंपनी ने वर्षों तक सरकार के खजाने में हजारों करोड़ रुपये आयकर और अन्य करों के रूप में दिए, रोजगार पैदा किया, निवेश किया और अर्थव्यवस्था को गति दी, उसके योगदान का मूल्यांकन संकट की घड़ी में क्यों नहीं होता?
मुनाफे के दौर में कार्पोरेट सरकार के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी होता है, लेकिन जैसे ही संकट आता है, वही मुर्गी बोझ क्यों बन जाती है? सवाल यह भी है कि क्या सरकार की जिम्मेदारी केवल कंपनियों से कर वसूलने तक सीमित है, या संकट के समय उन्हें संभालने और आर्थिक ढांचे को बचाने की भी है? यदि सरकार किसी कंपनी की सफलता से कर के रूप में अपनी हिस्सेदारी लेती है, तो उसकी विफलता के जोखिम में हिस्सेदारी लेने से क्यों पीछे हटे? यह सवाल किसी एक कंपनी का नहीं, बल्कि उस पूरे आर्थिक मॉडल का है, जिसमें सफलता का लाभ साझा किया जाता है, लेकिन संकट का बोझ अकेले कंपनी के कंधों पर डाल दिया जाता है।
किसी भी बड़े कारोबारी समूह और सरकार के बीच संबंध को केवल करदाता और कर वसूलने वाली संस्था के रूप में देखना शायद पूरी तस्वीर नहीं है। जब कोई कंपनी मुनाफा कमाती है तो वह नियमानुसार सरकार को कॉरपोरेट आयकर देती है। मुनाफे का एक हिस्सा सीधे कर के रूप में सरकारी खजाने में जाता है और शेष राशि कंपनी, उसके शेयरधारकों तथा कारोबार के विस्तार के लिए बचती है। लेकिन जब वही कंपनी आर्थिक संकट, नकदी संकट, कर्ज के दबाव या कारोबारी मंदी में फंस जाती है, तब सवाल उठता है कि सरकार की भूमिका केवल कर लेने तक सीमित होनी चाहिए या उस कंपनी और उससे जुड़े रोजगार, निवेशकों तथा पूरे कारोबारी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा की भी कोई जिम्मेदारी बनती है?
सुभाष चंद्रा से जुड़े एस्सेल समूह और उसकी प्रमुख कंपनियों का उदाहरण इस बहस को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। समूह की प्रमुख सूचीबद्ध कंपनियों के उपलब्ध वित्तीय रिकॉर्ड बताते हैं कि अच्छे वर्षों में इन कंपनियों ने सरकार को बड़ी मात्रा में आयकर का भुगतान अथवा आयकर प्रावधान दर्ज किया। हालांकि यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि वार्षिक रिपोर्ट में दर्ज “Provision for Taxation”, “Current Tax” और वास्तव में सरकार को भुगतान किया गया “Income Tax Paid” एक ही चीज नहीं हैं। इसलिए उपलब्ध आंकड़ों को सीधे सरकारी खजाने में जमा हुई अंतिम राशि कहना उचित नहीं होगा।
उदाहरण के तौर पर Zee Entertainment Enterprises की वित्तीय रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2024-25 में 9,261 मिलियन रुपये यानी करीब 926.1 करोड़ रुपये का समेकित कर-पूर्व लाभ और 2,387 मिलियन रुपये यानी करीब 238.7 करोड़ रुपये का कर प्रावधान दर्ज है। वित्त वर्ष 2023-24 में भी 3,811 मिलियन रुपये के कर-पूर्व लाभ के मुकाबले 1,819 मिलियन रुपये यानी करीब 181.9 करोड़ रुपये का कर प्रावधान दर्ज किया गया था।
यही तस्वीर बताती है कि लाभ कमाने वाली बड़ी कंपनियां केवल अपने मालिकों या शेयरधारकों के लिए ही आर्थिक मूल्य नहीं बनातीं, बल्कि सरकार के लिए भी प्रत्यक्ष कर राजस्व का स्रोत होती हैं। Zee Entertainment की वेबसाइट पर वित्त वर्ष 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट भी उपलब्ध है और कंपनी लगातार अपने वित्तीय परिणाम तथा नियामकीय रिपोर्ट सार्वजनिक करती रही है।
मुनाफे का एक चौथाई कर में चला जाए तो निवेशक के पास क्या बचता है?
कॉरपोरेट टैक्स को समझने के लिए एक सरल उदाहरण लिया जा सकता है। मान लीजिए किसी निवेशक ने किसी व्यवसाय में 100 करोड़ रुपये लगाए और उस व्यवसाय ने एक साल में 25 करोड़ रुपये का कर-पूर्व मुनाफा कमाया। यदि उस लाभ पर 25 प्रतिशत कर लागू होता है तो करीब 6.25 करोड़ रुपये कर के रूप में चले जाएंगे और करीब 18.75 करोड़ रुपये कर के बाद बचेंगे। यानी कंपनी ने 25 करोड़ रुपये का लाभ कमाया, लेकिन उस लाभ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सार्वजनिक राजस्व में चला गया।
इसी तरह यदि किसी निवेशक को अपने निवेश पर 20 प्रतिशत का वास्तविक लाभ कमाना हो तो 100 करोड़ रुपये के निवेश पर 20 करोड़ रुपये का लाभ प्राप्त करना होगा। 25 प्रतिशत प्रतिफल हासिल करने के लिए 100 करोड़ रुपये के निवेश पर 25 करोड़ रुपये का लाभ अर्जित करना होगा। दूसरे शब्दों में, 20 प्रतिशत लाभ कमाने के लिए 1 करोड़ रुपये का लाभ अर्जित करने में लगभग 5 करोड़ रुपये का निवेश चाहिए, जबकि 25 प्रतिशत लाभ के लिए 1 करोड़ रुपये का लाभ अर्जित करने में लगभग 4 करोड़ रुपये का निवेश चाहिए।
यह केवल गणितीय उदाहरण है। वास्तविक कारोबार में पूंजी की लागत, ब्याज, वेतन, किराया, तकनीक, विपणन, कच्चा माल, अवमूल्यन, जोखिम और बाजार की परिस्थितियां भी शामिल होती हैं। इसलिए किसी कंपनी का 20 या 25 प्रतिशत लाभ केवल निवेश की राशि देखकर तय नहीं किया जा सकता।
सरकार का निवेश कहां है?
यहीं से इस पूरे मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है। किसी निजी कंपनी में निवेश करने वाला व्यक्ति अपनी पूंजी जोखिम में डालता है। कंपनी सफल होती है तो उसे लाभ मिलता है और कंपनी असफल होती है तो पूंजी का बड़ा हिस्सा डूब भी सकता है। सरकार आम तौर पर उस कंपनी में शेयरधारक की तरह पूंजी नहीं लगाती, लेकिन सफल होने पर कंपनी से कर प्राप्त करती है।
इस दृष्टि से देखें तो कर व्यवस्था में सरकार को कंपनी के मुनाफे में हिस्सेदारी मिलती है, जबकि कंपनी के नुकसान का पूरा जोखिम सरकार नहीं उठाती। यही कारण है कि संकट के समय किसी कंपनी को सरकारी सहायता देने का सवाल बेहद संवेदनशील हो जाता है।
हर संकटग्रस्त कंपनी को बचाना चाहिए?
क्या सरकार को हर संकटग्रस्त कंपनी को बचाना चाहिए? इसका उत्तर निश्चित रूप से “हां” ही होना चाहिए। चाहे किसी कंपनी की परेशानी उसके प्रबंधन की गंभीर गलतियों, अत्यधिक कर्ज, वित्तीय अनियमितताओं या जानबूझकर लिए गए जोखिमों का परिणाम संकट क्यों ना हो, बशर्ते उसने अतीत में कर दिया हो।
असाधारण परिस्थिति के कारण संकट में आती है और उसके साथ हजारों कर्मचारी, छोटे आपूर्तिकर्ता, निवेशक, बैंक, मनोरंजन उद्योग तथा अन्य कारोबारी संस्थाएं जुड़ी हैं, तो सरकार के सामने व्यापक आर्थिक हितों की रक्षा का प्रश्न जरूर खड़ा होना चाहिए है।
करदाता कंपनियों को संरक्षण का मतलब मुफ्त राहत नहीं
यहां “सरकारी संरक्षण” और “सरकारी बेलआउट” के बीच अंतर करना जरूरी है। संरक्षण का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि सरकार कंपनी का नुकसान अपने ऊपर ले ले। इसका अर्थ यह हो सकता है कि संकट के समय पुनर्गठन की सुविधा दी जाए, वैधानिक भुगतान के लिए समय मिले, रोजगार बचाने वाली योजनाओं पर विचार हो, बैंकिंग व्यवस्था के माध्यम से व्यवहार्य कारोबार को पुनर्जीवित करने का रास्ता बनाया जाए और ऐसी कंपनियों को अस्थायी राहत दी जाए जिनका मूल कारोबार मजबूत है।
ऐसी सहायता भी शर्तों के साथ हो सकती है। मसलन, स्वतंत्र ऑडिट, प्रमोटर की जवाबदेही, वित्तीय पारदर्शिता, ऋण पुनर्गठन, संपत्तियों की उचित कीमत पर बिक्री, प्रबंधन में आवश्यक बदलाव और कर्मचारियों तथा छोटे निवेशकों के हितों की सुरक्षा जैसी शर्तें लगाई जा सकती हैं।
इस मॉडल में सरकार कंपनी को “बचाती” नहीं, बल्कि एक संभावित रूप से व्यवहार्य व्यवसाय को अचानक ढहने से रोकने का प्रयास करती है।
एस्सेल समूह का उदाहरण क्यों महत्वपूर्ण है?
सुभाष चंद्रा से जुड़े समूह की कंपनियों के उपलब्ध वित्तीय आंकड़ों को देखते हुए यह बहस इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि समूह की प्रमुख कंपनियां लंबे समय तक भारतीय पूंजी बाजार और मीडिया उद्योग में बड़ी कारोबारी उपस्थिति रखती रही हैं। Zee Entertainment आज भी एक बड़ी मीडिया कंपनी है और उसकी वार्षिक रिपोर्ट में टेलीविजन, डिजिटल, फिल्म और संगीत सहित विभिन्न कारोबारों का उल्लेख मिलता है। वित्त वर्ष 2024-25 में कंपनी की समेकित परिचालन आय करीब 8,294.1 करोड़ रुपये रही थी।
इसलिए सवाल केवल किसी एक कारोबारी परिवार का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत की कर और औद्योगिक नीति में सफल कंपनियों को केवल राजस्व देने वाली इकाइयों के रूप में देखा जाए या संकट के समय रोजगार, निवेश और आर्थिक गतिविधि के केंद्र के रूप में भी?
एक कंपनी जब मुनाफा कमाती है तो वह कर देती है। उसके कर्मचारी आयकर और अन्य कर देते हैं। उसके आपूर्तिकर्ता जीएसटी और अन्य कर देते हैं। उसके शेयरधारक लाभांश और पूंजीगत लाभ पर कर दे सकते हैं। कंपनी का कारोबार जितना बड़ा होता है, उसके चारों तरफ उतना ही बड़ा आर्थिक तंत्र विकसित होता है।
इसलिए किसी बड़ी कंपनी का अचानक पतन केवल उसके मालिक की समस्या नहीं होता। इसका असर कर्मचारियों, निवेशकों, बैंकों, विज्ञापनदाताओं, उत्पादन कंपनियों, तकनीकी सेवा प्रदाताओं और सरकार के भविष्य के कर राजस्व पर भी पड़ सकता है।
संकटग्रस्त कंपनियों के लिए एक समान और पारदर्शी नीति जरूरी
असल बहस यह होनी चाहिए कि सरकार संकटग्रस्त कंपनियों के लिए एक समान और पारदर्शी नीति बनाए।
यदि किसी कंपनी को बचाने से बड़े पैमाने पर रोजगार बचता है, निवेशकों की संपत्ति सुरक्षित रहती है और भविष्य में कर राजस्व बना रहता है, तो सीमित और शर्तबद्ध सरकारी हस्तक्षेप आर्थिक दृष्टि से उचित हो सकता है।
असली सवाल-लाभ में साझेदार, संकट में भागीदार?
यही इस पूरे मामले का मूल प्रश्न है। मुनाफे के वर्षों में सरकार को कंपनी के लाभ से कर मिलता है। कंपनी और निवेशक आर्थिक जोखिम उठाते हैं और सरकार उस गतिविधि से राजस्व प्राप्त करती है। संकट आने पर यदि सरकार केवल यह कहकर पीछे हट जाए कि कारोबार निजी है, तो यह बाजार व्यवस्था की स्वाभाविक प्रतिक्रिया हो सकती है। लेकिन यदि उसी कंपनी के संकट का असर रोजगार, बैंक, निवेशक और अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से पर पड़ने लगे, तब सरकार के लिए निष्क्रिय रहना भी हमेशा सबसे अच्छा विकल्प नहीं हो सकता।
इसलिए भविष्य की नीति का सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “क्या भारत के पास ऐसी स्पष्ट नीति है जिसके तहत वर्षों तक कर देने वाली लेकिन अस्थायी संकट में फंसी व्यवहार्य कंपनियों को पारदर्शी, शर्तबद्ध और समयबद्ध सहायता मिल सके?”
यह सहायता कंपनी के मालिक के लिए नहीं, बल्कि रोजगार, निवेशकों, बैंकिंग व्यवस्था, आपूर्तिकर्ताओं और भविष्य के कर राजस्व की रक्षा के लिए होनी चाहिए।
और अंततः यही बाजार अर्थव्यवस्था और कल्याणकारी राज्य के बीच संतुलन का प्रश्न है-लाभ में सरकार हिस्सेदार है तो क्या संकट के समय वह केवल दर्शक बनी रहे, या जिम्मेदार नियामक और आर्थिक संरक्षक की भूमिका भी निभाए?
हालांकि, इस बहस में एक तथ्य हमेशा स्पष्ट रहना चाहिए कि उपलब्ध वार्षिक रिपोर्टों में दर्ज “कर प्रावधान” को सीधे “सरकार को जमा कुल आयकर” नहीं माना जा सकता। Zee की सार्वजनिक वित्तीय रिपोर्टिंग स्वयं कर प्रावधान और अन्य वित्तीय मदों को अलग-अलग दर्शाती है। इसलिए एस्सेल समूह की कंपनियों द्वारा दशकों में दिए गए वास्तविक आयकर का अंतिम आंकड़ा निकालने के लिए प्रत्येक कंपनी के वर्षवार “Income Tax Paid” आंकड़ों को अलग से जोड़ना आवश्यक होगा।
खबर में दिए गए वित्तीय एवं कर संबंधी आंकड़े सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित हैं और केवल विषय को समझाने के उद्देश्य से हैं। इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि इंडो एशियन टाइम्स द्वारा नहीं की गई है।
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