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जनजातीय अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का आह्वान

  •     धर्मांतरण के बाद अनुसूचित जनजाति दर्जे पर स्पष्ट कानून बनाने की उठी मांग

भुवनेश्वर। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के अवसर पर 24 मई को नई दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में आयोजित जनजाति समागम-2026 को जनजातीय अस्मिता, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक राष्ट्रीय अभियान बताया गया।

इसकी जानकारी रविवार को भुवनेश्वर में आयोजित एक पत्रकार सम्मेलन में जनजाति सुरक्षा मंच के पदाधिकारियों ने दी। उन्होंने कहा कि देशभर के 500 से अधिक जनजातीय समुदायों के लाखों लोगों की भागीदारी वाला यह समागम केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की लंबे समय से लंबित मांगों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का मंच बना।

पत्रकार सम्मेलन में बताया गया कि समागम में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने जनजातीय समाज की प्रकृति-पूजा, जल, जंगल और जमीन से जुड़े जीवन-दर्शन को भारत की सांस्कृतिक आत्मा का अभिन्न हिस्सा बताते हुए कहा कि यह आयोजन आने वाले समय में जनजातीय समाज के महाकुंभ के रूप में याद किया जाएगा। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से आए जनजातीय समुदायों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा, लोकनृत्य, लोकगीत और वाद्ययंत्रों के माध्यम से सांस्कृतिक विविधता का प्रदर्शन किया।

1950 में आवश्यक संशोधन अथवा स्पष्ट वैधानिक प्रावधान जरूरी

जनजाति सुरक्षा मंच ने पत्रकार सम्मेलन में कहा कि उसकी प्रमुख मांग यह है कि संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में आवश्यक संशोधन अथवा स्पष्ट वैधानिक प्रावधान किया जाए। मंच का कहना है कि जो व्यक्ति धर्मांतरण के बाद अपनी पारंपरिक जनजातीय आस्था, संस्कृति, रीति-रिवाज और सामुदायिक जीवन-पद्धति का परित्याग कर देता है, उसे अनुसूचित जनजाति का संवैधानिक दर्जा और उससे जुड़े लाभ नहीं मिलने चाहिए। मंच का तर्क है कि आस्था का त्याग संस्कृति का त्याग है और संस्कृति का त्याग पहचान का त्याग है।

धर्मांतरण के बाद जनजातीय स्थिति का परीक्षण जरूरी

मंच के प्रतिनिधियों ने कहा कि विभिन्न न्यायालयों ने भी अपने निर्णयों में यह माना है कि धर्मांतरण के बाद यदि कोई व्यक्ति अपनी पारंपरिक जनजातीय पहचान और सामाजिक जीवन से पूरी तरह अलग हो जाता है, तो उसकी जनजातीय स्थिति का परीक्षण सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया जाना चाहिए। हालांकि, वर्तमान व्यवस्था में प्रत्येक मामले को अलग-अलग न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जो सामान्य जनजातीय नागरिक के लिए कठिन और व्यावहारिक नहीं है। इसलिए इस विषय पर स्पष्ट और प्रभावी वैधानिक व्यवस्था की आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से भी की गई मुलाकात

मंच ने बताया कि 28 मई 2026 को उसके प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर तीन प्रमुख मांगें रखीं। इनमें अनुसूचित जनजाति की स्पष्ट वैधानिक परिभाषा, धर्मांतरण के बाद जनजातीय दर्जे पर कानूनी स्पष्टता तथा जनजातीय सांस्कृतिक अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक संशोधन शामिल हैं।

मंच का दावा है कि देश में अनुमानित 1.5 से 2 करोड़ धर्मांतरित जनजातीय व्यक्तियों में से कई अनुसूचित जनजाति आरक्षण और अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं, दोनों का लाभ प्राप्त कर रहे हैं, जिससे संवैधानिक समानता और सामाजिक न्याय प्रभावित होता है। मंच ने केंद्र सरकार से इस विषय पर शीघ्र निर्णय लेने की मांग करते हुए कहा कि यह केवल आरक्षण का नहीं, बल्कि करोड़ों जनजातीय लोगों की सांस्कृतिक पहचान, परंपरा और अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा है।

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