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कहा- अज्ञान के अंधकार को दूर करते हैं गुरु
भुवनेश्वर। ‘उपनिषद ज्ञानामृत’ प्रवचन श्रृंखला के नौवें दिन जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की प्रमुख प्रचारिका रासेश्वरी देवी ने भगवद्-प्राप्ति की यात्रा में गुरु की अनिवार्य भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संसारिक आसक्तियों से बंधा मन सीधे भगवान की शरण में नहीं जा सकता, इसलिए मनुष्य के लिए पहले किसी तत्वदर्शी गुरु की शरण ग्रहण करना आवश्यक है।
रासेश्वरी देवी ने बताया कि गुरु अज्ञान के अंधकार को दूर करते हैं, साधक को आध्यात्मिक मार्ग पर प्रेमपूर्वक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, शंकाओं का समाधान करते हैं और साधना में दृढ़ता से स्थापित होने में सहायता करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि गुरु कभी कठोर भी प्रतीत हों, तो वह शिष्य के अंतःकरण की शुद्धि और उसके आध्यात्मिक कल्याण के लिए ही होता है।
विषय को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने सच्चे गुरु की पहचान के लक्षणों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वास्तविक गुरु न तो सांसारिक लाभ का प्रलोभन देता है और न ही प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए अलौकिक शक्तियों का प्रदर्शन करता है। सच्चा गुरु वही होता है जो श्रोत्रिय (शास्त्रों का ज्ञाता) और ब्रह्मनिष्ठ (स्वयं ईश्वर का साक्षात्कार करने वाला) हो। उन्होंने चेतावनी दी कि केवल बौद्धिक तर्कों के आधार पर गुरु का मूल्यांकन करना भ्रामक हो सकता है। इसके स्थान पर शास्त्रों में वर्णित संकेत-जैसे अष्ट सात्त्विक भाव-गुरु की पहचान के विश्वसनीय आधार हैं।
रासेश्वरी देवी ने यह भी कहा कि गुरु की वास्तविक परीक्षा उनके सान्निध्य में होने वाले आंतरिक परिवर्तन से होती है। संसार के आकर्षणों से बढ़ती विरक्ति और भगवान के प्रति बढ़ता प्रेम, किसी सच्चे आध्यात्मिक गुरु के सान्निध्य का सबसे स्पष्ट प्रमाण है।
प्रवचन के समापन सत्र में उन्होंने ईश्वर-प्राप्ति के तीन वैदिक मार्गों-कर्म, ज्ञान और भक्ति-की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि यद्यपि कर्म और ज्ञान का अपना महत्व है, लेकिन भक्ति के बिना दोनों अधूरे हैं। उन्होंने भक्ति को सबसे सरल, सुरक्षित और सीधा मार्ग बताया, क्योंकि यह व्यक्तिगत प्रयासों पर नहीं, बल्कि शरणागति और दिव्य कृपा पर आधारित है।
अपने संबोधन का समापन करते हुए रासेश्वरी देवी ने कहा कि जब साधक के भीतर भगवान के प्रति सच्ची व्याकुलता जागृत होती है, तब ईश्वरीय कृपा उसे एक सच्चे गुरु तक ले जाती है, जिनके मार्गदर्शन में जीव भक्ति प्राप्त कर भगवान से नित्य मिलन के लक्ष्य को सिद्ध करता है।
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