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कर्नाटक की ईंट भट्टी से नुआपड़ा के 10 बंधुआ मजदूर मुक्त

  • दलाल के जरिए ले जाए गए थे सभी ओड़िया श्रमिक

  •  अमानवीय हालात में कराया जा रहा था काम

भुवनेश्वर। कर्नाटक के बगलाकोट जिले में एक ईंट भट्टी से ओडिशा के नुआपड़ा जिले के 10 बंधुआ मजदूरों को प्रशासन ने मुक्त कराया है। यह कार्रवाई शोषण और बंधुआ मजदूरी की शिकायत मिलने के बाद की गई। मुक्त कराए गए सभी मजदूरों को बाद में नुआपड़ा जिला प्रशासन को सौंप दिया गया।

सिनापाली प्रखंड से गए थे कर्नाटक

मुक्त कराए गए मजदूर सिनापाली प्रखंड के अंतर्गत भरुआमुंडा पंचायत के जारेलपड़ा गांव के रहने वाले हैं। ये सभी मजदूर तीन परिवारों से संबंधित हैं, जिन्हें काम दिलाने का झांसा देकर कर्नाटक ले जाया गया था।

शिकायत के बाद शुरू हुई जांच

अधिकारियों ने बताया कि 9 जनवरी 2026 को गुलेड़गुड्डा तालुका के मुराड़ी गांव स्थित ईंट भट्टी में कार्रवाई की गई। प्रशासन को शिकायत मिली थी कि यहां काम कर रहे पांच मजदूरों के साथ गंभीर दुर्व्यवहार किया जा रहा है।

जांच के दौरान खुलासा हुआ कि एक दलाल के माध्यम से 5 महिलाएं और 5 पुरुषों को कर्नाटक लाया गया था और उन्हें जबरन बंधुआ मजदूरी में झोंक दिया गया।

रकम का लालच, लेकिन पूरा नहीं हुआ वादा

मजदूरों ने बताया कि प्रत्येक परिवार को शुरुआत में 10 हजार रुपये की अग्रिम राशि दी गई थी और भट्टी पहुंचने पर 40 हजार रुपये देने का वादा किया गया था।

हालांकि, भट्टी पहुंचने के बाद न तो वादा की गई रकम दी गई और न ही उन्हें वापस जाने की अनुमति मिली।

12 घंटे से अधिक काम

जांच में सामने आया कि ईंट भट्टी मालिकों ने मजदूरों से 12 घंटे से अधिक काम कराया। उन्हें कठिन और अमानवीय परिस्थितियों में रखा गया और लगातार शोषण व प्रताड़ना झेलनी पड़ी।

कानून उल्लंघन, नियोक्ता पर मामला दर्ज

जांच के बाद अधिकारियों ने बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम के तहत नियमों के उल्लंघन की पुष्टि की और ईंट भट्टी के नियोक्ता के खिलाफ मामला दर्ज किया।

बगलाकोट के सहायक आयुक्त और उप-विभागीय दंडाधिकारी ने बताया कि मजदूरों ने अपने गांव लौटने की इच्छा जताई थी।

नुआपड़ा प्रशासन से समन्वय, सुरक्षित वापसी

इसके बाद प्रशासन ने मजदूरों को भट्टी से मुक्त कराते हुए नुआपड़ा जिला प्रशासन से समन्वय किया, ताकि सभी मजदूरों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जा सके।

मुक्ति प्रमाणपत्र जारी

अंततः सभी 10 मुक्त कराए गए मजदूरों को मुक्ति प्रमाणपत्र प्रदान किया गया, जिससे उन्हें कानूनी रूप से बंधुआ मजदूरी से मुक्त श्रमिक के रूप में मान्यता मिल गई।

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