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कहा- ओडिशा की संस्कृति जीवन का अभिन्न हिस्सा
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संस्कृति तभी फलती-फूलती है जब वह मानवीय मूल्यों से जुड़ी हो
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उत्कल सांस्कृतिक विश्वविद्यालय के 27वें स्थापना दिवस पर पूर्व उपराष्ट्रपति ने किया संबोधित
भुवनेश्वर। भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने कहा कि संस्कृति का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब वह सामाजिक सौहार्द, पर्यावरणीय संतुलन, श्रम की गरिमा और समावेशी विकास जैसे मानवीय सरोकारों से जुड़ी हो। वे यहां उत्कल सांस्कृतिक विश्वविद्यालय के 27वें स्थापना दिवस के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
इस अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए नायडू ने कहा कि भारत की सभ्यतागत कथा में ओडिशा का स्थान विशिष्ट है, जहां संस्कृति को हमेशा सामूहिक जीवन को दिशा देने वाली जीवंत शक्ति माना गया है। उन्होंने कहा कि ओडिशा में अनुष्ठान, परंपराएं, वास्तुकला, साहित्य, संगीत, नृत्य और शिल्पकला-सभी दैनिक जीवन में गहराई से रची-बसी हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि राज्य में देश का पहला केवल संस्कृति को समर्पित विश्वविद्यालय स्थापित होना अत्यंत उपयुक्त है।
छात्र भविष्य के सांस्कृतिक निर्माता
छात्रों को संबोधित करते हुए पूर्व उपराष्ट्रपति ने कहा कि वे न केवल समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के उत्तराधिकारी हैं, बल्कि उसके भविष्य के निर्माता भी हैं। उन्होंने परंपरा का सम्मान करते हुए नवाचार को अपनाने का आह्वान किया और कहा कि शिक्षा का उद्देश्य युवाओं को प्रश्न करने, सृजन करने और समाज की सेवा के लिए सक्षम बनाना होना चाहिए।
संस्कृति से कटकर विकास खोखला
नायडू ने कहा कि आज का दौर गति और तकनीक से संचालित है, ऐसे समय में उत्कल सांस्कृतिक विश्वविद्यालय जैसे संस्थान यह याद दिलाते हैं कि प्रगति को पहचान, नैतिकता और साझा स्मृति से जुड़ा रहना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि सांस्कृतिक आधार से विहीन विकास अंततः खोखला साबित होता है।
संरक्षण से आगे पुनर्व्याख्या की जिम्मेदारी
संस्कृति को गतिशील और निरंतर विकसित होने वाली बताते हुए नायडू ने कहा कि विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी केवल संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि शोध, प्रलेखन, रचनात्मक प्रयोग और अकादमिक संवाद के माध्यम से परंपराओं की सार्थक पुनर्व्याख्या भी आवश्यक है। उन्होंने विश्वविद्यालय की अंतरविषयी दृष्टि, जनसंपर्क गतिविधियों और सामुदायिक सहभागिता की सराहना की तथा शिक्षकों को ज्ञान, नैतिकता और रचनात्मक संवेदनशीलता के संतुलन के ध्वजवाहक बताया।
संस्कृति से नवाचार और रोजगार के अवसर – राज्यपाल
समारोह को संबोधित करते हुए ओडिशा के राज्यपाल डॉ हरि बाबू कंभमपाटि ने कहा कि तेजी से बदलती, तकनीक आधारित दुनिया में संस्कृति को नवाचार, उद्यम और सतत आजीविका का माध्यम मानकर देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के छात्र और पूर्व छात्र केवल परंपरा के संरक्षक ही नहीं, बल्कि संभावित सांस्कृतिक उद्यमी और नवोन्मेषक भी हैं।
ओडिशा की सभ्यतागत विरासत का गौरव
राज्यपाल ने कहा कि संस्कृति केवल संरक्षित करने की वस्तु नहीं, बल्कि एक जीवंत संसाधन है, जो रोजगार सृजन, सामाजिक एकता और सतत विकास में योगदान दे सकती है। उन्होंने ओडिशा की समृद्ध सभ्यतागत विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि यह संस्कृति संवाद, समन्वय और विविधता के माध्यम से युगों-युगों तक जीवंत रही है। कलिंग युद्ध के संदर्भ में उन्होंने सम्राट अशोक के परिवर्तन को शांति और मानवतावाद का शाश्वत संदेश बताया, वहीं खारवेल के शासन को साहस, सांस्कृतिक दृष्टि और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रतीक कहा। उन्होंने ओडिशा की मंदिर स्थापत्य कला, जगन्नाथ संस्कृति तथा शास्त्रीय, लोक और जनजातीय कलाओं का भी उल्लेख किया।
राष्ट्र निर्माण में संस्कृति और शिक्षा की भूमिका
राज्यपाल ने पूर्व उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू को सत्यनिष्ठा, सरलता और लोकतांत्रिक व सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध एक प्रतिष्ठित राजनेता बताते हुए कहा कि उनकी उपस्थिति ने समारोह की गरिमा बढ़ाई है और राष्ट्र निर्माण में संस्कृति व शिक्षा की भूमिका को पुनः रेखांकित किया है।
इस अवसर पर उच्च शिक्षा, खेल एवं युवा सेवा तथा ओड़िया भाषा, साहित्य एवं संस्कृति मंत्री सूर्यबंशी सूरज, प्रख्यात लेखिका एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रतिभा राय, कुलपति प्रो प्रसन्न कुमार स्वाईं और कुलसचिव अनामिका अधिकारी सहित अनेक गणमान्य उपस्थित थे।
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