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 दिव्यांगों की भागीदारी के बिना लोकतंत्र अधूरा – सुरमा पाढ़ी

  •  केप टाउन में  सीपीए सम्मेलन में ओडिशा विधानसभा अध्यक्ष ने कहा—तकनीक बदल सकती है, लेकिन हर नागरिक की समानता का सिद्धांत नहीं

केप टाउन/भुवनेश्वर। ओडिशा विधानसभा की अध्यक्ष सुरमा पाढ़ी ने केप टाउन में आयोजित राष्ट्रमंडल संसदीय संघ (सीपीए) के सम्मेलन में दिव्यांगजनों की लोकतांत्रिक भागीदारी और संसद को सभी के लिए सुलभ बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र अपने काम करने के तरीके और तकनीक बदल सकता है, लेकिन हर नागरिक के लिए समानता उसका मूल दायित्व है और इसमें बदलाव नहीं किया जा सकता।
सीपीए के प्रमुख सम्मेलन में ‘सुलभ संसद : दिव्यांगजनों का समावेश’ विषय पर आयोजित सत्र में बोलते हुए सुरमा पाढ़ी ने कहा कि दुनिया तेजी से बदल रही है और तकनीक संसद तथा विधानसभाओं के कामकाज को नए रूप में ढाल रही है। ऐसे में डिजिटल बदलाव का उद्देश्य किसी भी नागरिक को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दूर करना नहीं, बल्कि भागीदारी के नए रास्ते खोलना होना चाहिए।
अष्टावक्र का उदाहरण देकर बताई समान भागीदारी की अहमियत
सुरमा पाढ़ी ने अपने संबोधन की शुरुआत कानूनों और नियमों से नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा के उदाहरण से की। उन्होंने ऋषि अष्टावक्र का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय सभ्यता ने लंबे समय से यह स्वीकार किया है कि शारीरिक अक्षमता का अर्थ योगदान देने की क्षमता का अभाव नहीं है।
उन्होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं में भी दिव्यांगजन अपनी भागीदारी निभाते रहे हैं और देश की प्रगति में योगदान देते रहे हैं। उन्होंने 2024 के आम चुनाव का उल्लेख करते हुए बताया कि 90 लाख से अधिक दिव्यांगजन मतदाता के रूप में पंजीकृत थे। उनके अनुसार, यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में दिव्यांगजनों की भागीदारी और राजनीतिक जुड़ाव के व्यापक स्तर को दर्शाता है।
कानून को संसदीय व्यवहार में बदलने पर जोर
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि संसद और विधानसभाओं का तेजी से हो रहा डिजिटलीकरण दिव्यांगजनों की भागीदारी को और व्यापक बना सकता है, बशर्ते शुरुआत से ही डिजिटल और भौतिक व्यवस्थाओं को सभी के लिए सुलभ बनाया जाए।
उन्होंने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून ने समानता, सुगम्यता और भागीदारी के लिए आवश्यक कानूनी ढांचा उपलब्ध कराया है। अब आवश्यकता इस बात की है कि इन कानूनी प्रावधानों को रोजमर्रा के संसदीय और प्रशासनिक कामकाज का हिस्सा बनाया जाए।
ओडिशा की योजनाओं का भी किया उल्लेख
सुरमा पाढ़ी ने ओडिशा में दिव्यांगजनों के लिए संचालित योजनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने बानिश्री छात्रवृत्ति और भीम भोई दिव्यांग सशक्तीकरण अभियान को शिक्षा और सशक्तीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।
उन्होंने कहा कि राज्य में दिव्यांगजनों को सहायक उपकरण, कौशल विकास, पुनर्वास, विशेष शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, खेल और आजीविका के क्षेत्र में भी सहायता दी जा रही है। उनके अनुसार, समावेशी समाज के निर्माण के लिए ये व्यवस्थाएं बुनियादी आधार का काम करती हैं।
विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने लिया हिस्सा
केप टाउन में आयोजित चर्चा में झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो, राज्यसभा सांसद सी. सदानंदन मास्टर और महाराष्ट्र विधान परिषद के सभापति प्रो. राम शिंदे ने भी भाग लिया। ओडिशा विधानसभा के उपाध्यक्ष भवानी शंकर भोई और विधानसभा सचिव सत्यव्रत राउत भी अध्यक्ष सुरमा पाढ़ी के साथ सम्मेलन में मौजूद रहे।
यह कार्यक्रम 69वें राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन का हिस्सा है, जिसमें राष्ट्रमंडल देशों के विधानसभा अध्यक्ष, सांसद और संसदीय अधिकारी लोकतंत्र के सामने उभर रही चुनौतियों पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।
अपने संबोधन में सुरमा पाढ़ी ने सुलभता को केवल दिव्यांगजनों से जुड़ा विशेष विषय मानने के बजाय लोकतंत्र की व्यापक जिम्मेदारी के रूप में प्रस्तुत किया। उनका संदेश स्पष्ट था कि संसद और लोकतांत्रिक संस्थाएं आधुनिक हो सकती हैं, उनकी तकनीक बदल सकती है, लेकिन समान नागरिकता और समान भागीदारी का मूल वादा नहीं बदलना चाहिए।
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