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जमानत पर दलित-आदिवासी आरोपियों से थाने साफ कराने पर लगी रोक

  •     अपमानजनक शर्तों पर सुप्रीम कोर्ट हुआ सख्त

  •     स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई में ओडिशा न्यायपालिका को कड़ी फटकार

  •     प्रथा को अमानवीय, अपमानजनक और कानून के खिलाफ बताया

भुवनेश्वर। सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा की निचली अदालतों द्वारा जमानत के बदले आरोपियों, खासकर दलित और आदिवासी समुदाय के लोगों से पुलिस थाने साफ कराने जैसी शर्तें लगाने पर कड़ी आपत्ति जताई है। अदालत ने इस प्रथा को अमानवीय, अपमानजनक और कानून के खिलाफ बताते हुए तत्काल प्रभाव से इसे बंद करने का निर्देश दिया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बाग्ची की पीठ ने समाचार रिपोर्टों के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए यह आदेश जारी किया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस तरह की शर्तें पूरी तरह शून्य (नल एंड वॉयड) हैं और इनका कोई कानूनी आधार नहीं है।

जातिगत पूर्वाग्रह पर सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के आदेश पूर्वाग्रह से ग्रसित प्रतीत होते हैं और इनसे न्यायपालिका पर जातिगत पक्षपात के गंभीर आरोप लगते हैं। अदालत ने कहा कि यह प्रथा न केवल अमानवीय है, बल्कि मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन भी है और आरोपियों की गरिमा को ठेस पहुंचाती है।

पीठ ने कहा कि किसी भी आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक उसका अपराध साबित न हो जाए, लेकिन इस तरह की शर्तें लगाकर कुछ न्यायिक अधिकारी आरोपियों को पहले ही दोषी मान रहे हैं, जो न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

गरीब और कमजोर वर्ग पर ही लागू शर्तें

कोर्ट ने कहा कि हम बहुत निराश और हताश हैं और ओडिशा ज्यूडिशियरी ने जिस तरह से पिछड़ी सोच दिखाई है, उससे हम सख्त नाराजगी जताते हैं, जो साफ तौर पर ह्यूमन राइट्स का उल्लंघन है और आरोपी की इज्जत पर चोट करता है। बेंच ने कहा कि ओडिशा ज्यूडिशियरी के कुछ ज्यूडिशियल ऑफिसर कुछ आदिवासी समुदायों के आरोपियों पर सिर्फ़ आरोपों के आधार पर उन्हें दोषी मानकर ऐसी बोझिल और अमानवीय शर्तें लगा रहे हैं। यह भी देखा गया कि अमीर लोगों को जमानत देते समय ऐसी शर्तें नहीं लगाई जातीं। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों को ऐसी शर्तों को हटाने के लिए हाई कोर्ट जाने की भी आजादी दी।

हाईकोर्ट जाने की छूट

सुप्रीम कोर्ट ने प्रभावित आरोपियों को ओडिशा उच्च न्यायालय का रुख करने की अनुमति देते हुए कहा कि ऐसी सभी शर्तों को तुरंत हटाया जाए और उनकी जगह कोई समान प्रकृति की शर्त भी न लगाई जाए।

देशभर की अदालतों के लिए निर्देश

शीर्ष अदालत ने अपने आदेश को देशभर की न्यायपालिका के लिए उदाहरण के रूप में जारी करते हुए कहा कि किसी भी राज्य में इस प्रकार की जातिगत या अपमानजनक शर्तें नहीं लगाई जानी चाहिए, क्योंकि इससे सामाजिक तनाव और भेदभाव को बढ़ावा मिलता है।

मानव गरिमा सर्वोपरि

अदालत ने दोहराया कि न्याय प्रणाली का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करना है और ऐसे आदेश न्यायिक व्यवस्था की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं।

बॉक्साइट माइनिंग के खिलाफ प्रदर्शन से जुड़ा है मामला

यह विवाद वेदांता ग्रुप द्वारा बॉक्साइट माइनिंग के लिए जमीन अधिग्रहण के विरोध प्रदर्शनों से शुरू हुआ। आरोप है कि ये विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए, जिसमें दलित और आदिवासी समुदायों के प्रदर्शनकारियों पर वेदांता के अधिकारियों पर कुल्हाड़ियों से हमला करने का आरोप लगा। लगभग 40 लोगों को गिरफ़्तार किया गया, और कुछ को ओडिशा हाई कोर्ट और निचली अदालतों से जमानत मिल गई।

हालांकि, कुछ मामलों में जमानत की शर्तों में एक ऐसी शर्त भी शामिल थी, जो पहले कभी नहीं देखी गईं थीं। इसमें कहा गया था कि आरोपियों को दो महीने तक पुलिस थानों की सफ़ाई करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उसे जमीन अधिग्रहण की वैधता या आपराधिक आरोपों की सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि उसे जमानत की शर्तों के स्वरूप से सरोकार है।

रायगड़ा में एक जिला जज ने भी इसी तरह के दिए थे आदेश

कोर्ट ने पाया कि रायगड़ा में एक जिला जज ने भी इसी तरह के आदेश दिए थे और सेशन कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के इसी रवैये का पालन किया था। कोर्ट ने यह भी पाया कि मई 2025 से जनवरी 2026 के बीच ऐसे कई आदेश जारी किए गए थे, जिससे न्यायपालिका के भीतर जाति-आधारित भेदभाव को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं।

सुविधा-संपन्न वर्गों के लोगों पर ऐसी शर्तें नहीं

आरोपियों के वकील ने दलील दी कि समाज के ज़्यादा सुविधा-संपन्न वर्गों के लोगों पर ऐसी शर्तें नहीं लगाई जाती हैं। कोर्ट ने माना कि मीडिया रिपोर्टों और आरोपों में “कुछ दम” लगता है।

संवैधानिक सिद्धांतों पर जोर देते हुए कोर्ट ने कहा कि भारत का समानता का वादा ही उसकी सबसे बड़ी गारंटी है। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का ज़िक्र किया, जो समानता सुनिश्चित करते हैं और अनुच्छेद 17 का भी ज़िक्र किया, जो छुआछूत को ख़त्म करता है। बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि न्यायपालिका का यह दायित्व है कि वह इन गारंटियों की रक्षा करे और कमज़ोर समुदायों को सुरक्षा प्रदान करे।

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