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ओडिशा की कला को वैश्विक पहचान दिलाने का आह्वान

  •     कला भूमि का 8वां स्थापना दिवस मना

  •     मुफ्त प्रवेश के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम

  •     ओडिशा की हस्तशिल्प विरासत को दुनिया तक पहुंचाने पर जोर

भुवनेश्वर। ओडिशा क्राफ्ट्स म्यूजियम-कला भूमि का 8वां स्थापना दिवस गांडमुण्डा स्थित परिसर में धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर दर्शकों के लिए संग्रहालय में प्रवेश पूरी तरह निःशुल्क रखा गया। कार्यक्रम में आगंतुकों के मनोरंजन के लिए सितार और तबला वादन के साथ-साथ ओडिशी और संबलपुरी लोक नृत्य प्रस्तुत किए गए, जिससे माहौल पूरी तरह सांस्कृतिक रंग में रंग गया।

विभागीय अधिकारियों की उपस्थिति, विकास यात्रा पर चर्चा

इस अवसर पर हस्तशिल्प निदेशक निवेदिता पृष्टि, वस्त्र एवं हथकरघा निदेशक सोमेश कुमार उपाध्याय तथा सिडैक की सदस्य सचिव चिन्मयी बिस्वाल सहित कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। बैठक में कला भूमि की स्थापना से लेकर अब तक की विकास यात्रा और उपलब्धियों को विस्तार से प्रस्तुत किया गया। साथ ही, इस संस्थान को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के लिए सामूहिक प्रयास का आह्वान किया गया।

राज्य की समृद्ध कला का जीवंत प्रदर्शन

कला भूमि ओडिशा के कारीगरों की उत्कृष्ट शिल्पकला को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया है। यहां टेराकोटा, पारंपरिक चित्रकला, पत्थर नक्काशी और धातु शिल्प की अलग-अलग दीर्घाएं हैं, जो राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं।

देश-विदेश के दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र

22 मार्च 2018 से अब तक लगभग 2,922 दिनों में कला भूमि ने देश-विदेश के छात्रों, शोधकर्ताओं, क्यूरेटर और संग्रहालय प्रेमियों का स्वागत किया है। यह संस्थान शिक्षा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन चुका है।

तोशाली मेला में बना विश्व रिकॉर्ड

हाल ही में आयोजित 20वें भव्य तोशाली मेले में 1,000 से अधिक टेराकोटा कलाकारों ने भाग लेकर विश्व रिकॉर्ड बनाया। इन कलाकारों की कलाकृतियों को कला भूमि में प्रदर्शित किया गया, जो दर्शकों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।

परंपरा का संरक्षण ही प्रगति की पहचान

कार्यक्रम के अंत में संग्रहालय की मुख्य कार्यकारी अधिकारी सस्वती साहू ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर यह संदेश भी दिया गया कि परंपरा का संरक्षण ही वास्तविक प्रगति की पहचान है। कला और संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। इनके संरक्षण से ही हमारी पहचान आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकती है।

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