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राजस्थान की संस्कारी मिट्टी से भुवनेश्वर तक का सफर
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष
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उद्योग, समाज सेवा और महिला सशक्तिकरण में सक्रिय भूमिका निभा रहीं अंजना भुरा
कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों तो दूरियां भी मंजिल बनने लगती हैं। राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के छोटे से गांव सूरतगढ़ में जन्मी अंजना भुरा की जीवन यात्रा इसी विश्वास की कहानी है। एक ऐसी यात्रा की कहनी है, जिसमें परिवार, समाज और व्यवसाय तीनों क्षेत्रों में संतुलन बनाकर उन्होंने अपनी अलग पहचान स्थापित की।
24 अप्रैल 1985 को विवाह के बाद बीकानेर जिले के नोखा से जुड़े भुरा परिवार की बहू बनकर अंजना ने अपने नए जीवन की शुरुआत की। पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ उन्होंने समाज और उद्योग दोनों क्षेत्रों में सक्रिय रहने का संकल्प लिया। यही कारण है कि वर्ष 1992 से उत्कल बिल्डर्स में वरिष्ठ निदेशक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने अपने नेतृत्व और प्रबंधन कौशल से एक मजबूत पहचान बनाई।
उत्कल बिल्डर्स आज ओडिशा के रीयल एस्टेट क्षेत्र में एक भरोसेमंद और प्रतिष्ठित ब्रांड के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। गुणवत्ता, पारदर्शिता और ग्राहकों के विश्वास को प्राथमिकता देने वाली इस कंपनी ने वर्षों के समर्पित कार्य के माध्यम से लोगों के सपनों को साकार करने का काम किया है। केवल इमारतें खड़ी करना ही इसका उद्देश्य नहीं है, बल्कि हर परिवार के लिए एक ऐसा घर तैयार करना है, जहां खुशियां, सुरक्षा और अपनापन एक साथ बस सकें। यही कारण है कि आज उत्कल बिल्डर्स का नाम ओडिशा में विश्वास और विश्वसनीयता का पर्याय बनता जा रहा है।
इस यात्रा को सशक्त दिशा देने में कंपनी की वरिष्ठ निदेशक अंजना भुरा की सौम्य, सकारात्मक, सामाजिक और पारिवारिक सोच की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके मार्गदर्शन में कंपनी केवल व्यवसाय तक सीमित नहीं रही, बल्कि परिवारों के सपनों को समझते हुए उन्हें खुशियों से भरा घर देने की भावना के साथ आगे बढ़ रही है। उनके नेतृत्व में उत्कल बिल्डर्स आज ऐसे आवासीय प्रकल्पों का निर्माण कर रहा है, जो केवल मकान नहीं बल्कि जीवन की नई शुरुआत और खुशहाल भविष्य की नींव बनते हैं।
भुवनेश्वर में रहते हुए अंजना भुरा ने सामाजिक गतिविधियों को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लिया। वह तेरापंथ महिला मंडल, भुवनेश्वर की उपाध्यक्ष, जैन इंटरनेशनल ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (जीतो) की उपाध्यक्ष तथा फ्रेंड्स ऑफ ट्राइबल्स सोसाइटी (एफटीएस) की कार्यकारी सदस्य के रूप में सक्रिय हैं। आप अनुज हिन्दी वाचनालय की संस्थापक हैं।
इन मंचों के माध्यम से वह महिलाओं के सशक्तिकरण, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के कार्यों में लगातार योगदान दे रही हैं।
बड़े और प्रतिष्ठित पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाली अंजना भुरा की शादी सुभाष भुरा के साथ हुई। बेटी मोनिका बैद, बहू अंशिका और बेटा अनुज भुरा के साथ उनका संयुक्त परिवार हैं। उनके जीवन की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि महिलाएं यदि संकल्प और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें, तो वे परिवार की जिम्मेदारियों के साथ समाज और उद्योग दोनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर अंजना भुरा की यह प्रेरक कहानी कई महिलाओं को अपने सपनों को साकार करने की प्रेरणा देती है।
इनका मानना है :
· “तेजी से बदलती डिजिटल और एआई की दुनिया में भी समाज की असली ताकत वहीं है-जहां परिवार के संस्कार, आपसी विश्वास और मानवीय रिश्तों की गर्माहट अभी भी जीवित है।”
· “समय बदल रहा है, तकनीक आगे बढ़ रही है, लेकिन एक सशक्त समाज की नींव आज भी मजबूत परिवार, संस्कार और संवेदनशील पीढ़ी पर ही टिकी हुई है।”
· “आज की बेटियां केवल अपने सपनों की उड़ान नहीं भर रहीं, वे आने वाले समाज की सोच, संस्कार और परिवार की दिशा भी तय कर रही हैं।”
· “आधुनिकता की तेज रफ्तार के बीच सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि हम अपने संस्कारों की जड़ों को इतना मजबूत रखें कि बदलाव भी उन्हें कमजोर न कर सके।”
पेश हैं उनके साथ की गई बातचीत के विशेष अंशः-
सवाल: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आप क्या कहना चाहेंगी?
जवाब: मेरे विचार से महिलाएं अनादिकाल से ही सशक्त रही हैं। आज समाज में जिस महिला सशक्तिकरण की चर्चा हो रही है, वह वास्तव में उस क्षमता और नेतृत्व का औपचारिक स्वीकार है, जो महिलाओं में सदैव से मौजूद रहा है। मां दुर्गा, मां सरस्वती, मां काली समेत विभिन्न देवियां शक्ति स्वरूपा हैं। इन्होंने पहले भी नेतृत्व किया और आज भी महिलाएं समाज में अपनी भूमिका को निर्वहन कर रही हैं।
ओडिशा इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से लेकर राज्य की विधानसभा अध्यक्ष सुरमा पाढ़ी, उपमुख्यमंत्री प्रभाती परिडा, राज्य की पहली महिला मुख्य सचिव अनु गर्ग और अतिरिक्त मुख्य सचिव (एसीएस), आवास और शहरी विकास विभाग, ओडिशा सरकार तथा चेयरपर्सन, ओडिशा इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (इडको) उषा पाढ़ी जैसी कई महिलाएं महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए नेतृत्व और क्षमता का परिचय दे रही हैं। मेरी भतीजी पारूल पटावरी सहित अनेक महिलाएं विभिन्न प्रशासनिक और सामाजिक क्षेत्रों में अपनी मजबूत भूमिका निभा रही हैं, जो सशक्त महिला नेतृत्व की प्रतीक हैं।
इसी प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर भी महिलाओं की भागीदारी अत्यंत प्रभावशाली है। केंद्र सरकार में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के कंधों पर देश की अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, जिसे वह सफलतापूर्वक निभा रही हैं। यह दर्शाता है कि आज महिलाएं हर क्षेत्र में नेतृत्व करते हुए देश और समाज की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
सवाल: घरेलू जिम्मेदारियों के साथ कारोबार और सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन आप कैसे करती हैं?
जवाब: मेरे अनुसार महिलाएं स्वयं ऊर्जा और प्रेरणा का स्रोत होती हैं। हमारे संस्कार और परंपराएं हमें बचपन से ही जिम्मेदारियों को निभाने की सीख देती हैं, इसलिए जीवन में जब भी नई जिम्मेदारियां आती हैं, हम उन्हें सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं।
इन जिम्मेदारियों को निभाने में सबसे बड़ी ताकत परिवार का प्रेम और सहयोग होता है। परिवार का विश्वास और समर्थन ही हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। जब परिवार साथ खड़ा होता है, तो महिलाएं न केवल घर की जिम्मेदारियां बेहतर तरीके से संभालती हैं, बल्कि समाज सेवा और व्यवसाय जैसे क्षेत्रों में भी अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से निभा पाती हैं।
मेरे अनुभव में परिवार को संभालने से हमें एक अलग ऊर्जा और आत्मविश्वास मिलता है। यही ऊर्जा हमें समाज के लिए कुछ करने और अपने कार्यक्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करती है। प्यार, अनुशासन और संस्कार-इन तीन मूल्यों के आधार पर महिलाएं पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक जिम्मेदारियों का संतुलन बनाते हुए अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करती हैं।
सवाल: आपके प्रेरणा स्रोत कौन रहे हैं?
जवाब: मेरे जीवन में प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत मेरा परिवार रहा है। जब मैं केवल छह वर्ष की थी, तब मैंने अपने पिता को खो दिया। यह जीवन का बहुत कठिन समय था, लेकिन संयुक्त परिवार की परंपरा ने मुझे कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया। मेरे बड़े पिताजी, चाचा और बड़े भाइयों ने हमेशा मेरा मार्गदर्शन किया और मुझे आगे बढ़ने के लिए हर संभव सहयोग दिया। उनके स्नेह, संरक्षण और प्रोत्साहन ने ही मुझे जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति दी।
मैं मानती हूं कि संयुक्त परिवार केवल एक सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक मजबूत आधार होता है, जो व्यक्ति को संस्कार, आत्मविश्वास और सहयोग की भावना देता है। यदि मुझे संयुक्त परिवार का यह सहारा न मिला होता, तो शायद मैं आज इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाती।
आज के दौर में जब हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, तब हमारे सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती संयुक्त परिवार की परंपरा को बचाए रखने की भी है। सशक्त होने का अर्थ केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि जिम्मेदारियों को निभाना, पारिवारिक मूल्यों को बनाए रखना और आपसी विश्वास, सहनशीलता तथा संस्कारों को मजबूत करना भी है। यही मूल्य महिलाओं को वास्तव में सशक्त बनाते हैं और समाज को भी मजबूत आधार प्रदान करते हैं।
सवाल: सशक्तिकरण को आप किस रूप में देखती हैं?
जवाब: आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हर जगह महिला सशक्तिकरण की चर्चा हो रही है। मेरे विचार से महिलाओं का सशक्तिकरण केवल अधिकारों या उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जिम्मेदारियों के व्यापक दायरे से भी जुड़ा हुआ है। महिलाएं जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाती हैं, जिनमें मातृत्व सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण दायित्वों में से एक है।
मैं मानती हूं कि महिलाएं स्वभाव से ही सशक्त होती हैं। परिवार, समाज और आने वाली पीढ़ियों के निर्माण में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इसलिए सशक्तिकरण का अर्थ केवल आगे बढ़ना नहीं, बल्कि उन जिम्मेदारियों को भी समझना और निभाना है, जो हमारी परंपराओं और मूल्यों से जुड़ी हुई हैं।
आज की महिलाओं के सामने अवसरों के नए द्वार खुल रहे हैं और उन्हें इन अवसरों का लाभ उठाकर आगे बढ़ना चाहिए। साथ ही यह भी आवश्यक है कि हम अपनी पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों को संतुलन के साथ निभाएं। आगे बढ़ने का वास्तविक अर्थ यही है कि हम अपनी पारंपरिक जिम्मेदारियों और आधुनिक अवसरों-दोनों को साथ लेकर समाज और राष्ट्र के विकास में सकारात्मक योगदान दें। मैं माताओं और बहनों से कहना चाहती हूं कि आगे बढ़ने के मतलब यह नहीं है कि हम अपनी पिछली जिम्मेदारियों को छोड़ते जाएं।
सवाल: आप सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन कैसे करती हैं?
जवाब: मैं सामाजिक जिम्मेदारियों को एक सेवा भाव के रूप में देखती हूं। इन जिम्मेदारियों की शुरुआत मैं अपने परिवार से करती हूं और फिर समाज तक जाती हूं। तेरापंथ महिला मंडल, भुवनेश्वर, जैन इंटरनेशनल ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (जीतो) तथा फ्रेंड्स ऑफ ट्राइबल्स सोसाइटी (एफटीएस) जैसे संगठनों के माध्यम से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने का अवसर मुझे मिलता है। इन संस्थाओं की गतिविधियों और उद्देश्यों के अनुरूप जो भी जिम्मेदारियां मुझे सौंपी जाती हैं, उसे मैं अपने परिवार के सहयोग और समर्थन के साथ पूरी निष्ठा से निभाने का प्रयास करती हूं।
मेरे अनुभव में सामाजिक सेवा केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि आत्मिक संतोष का भी माध्यम है। जब कोई कार्य पूरी निष्ठा और दिल से किया जाता है, तो उससे एक अलग प्रकार का आनंद और संतुष्टि प्राप्त होती है। समाज के लिए कुछ करने की भावना व्यक्ति को भीतर से समृद्ध बनाती है और जीवन को एक सकारात्मक दिशा देती है।
मैं हमेशा यह मानती हूं कि सेवा की शुरुआत अपने घर और परिवार से ही होनी चाहिए। यदि हम अपने परिवार के वरिष्ठ सदस्यों का सम्मान और सेवा करते हुए उनके अनुभवों से सीखें, तो वही संस्कार आगे चलकर समाज सेवा के कार्यों में भी दिखाई देते हैं। इसलिए मेरा सभी से आग्रह है कि सेवा की भावना को जीवन का हिस्सा बनाएं और इसकी शुरुआत अपने परिवार से ही करें।
सवाल: आज के दौर में महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां आप क्या देखती हैं?
जवाब: आज के दौर में महिलाएं तेजी से नई जिम्मेदारियां और अवसरों को अपनाते हुए हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। हालांकि इस भागदौड़ भरे जीवन में एक चुनौती यह भी देखने को मिल रही है कि महिलाएं धीरे-धीरे पारंपरिक पारिवारिक भूमिकाओं, विशेषकर रसोईघर से दूर होती जा रही हैं। इसका प्रभाव परिवार के स्वास्थ्य और जीवनशैली पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है।
मेरे विचार से नई जिम्मेदारियां और अवसर मिलना निश्चित रूप से सकारात्मक है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि हम अपनी पारंपरिक जिम्मेदारियों से पूरी तरह दूर हो जाएं। जहां तक संभव हो, परिवार के साथ मिलकर रसोईघर की परंपरा और घर के भोजन की संस्कृति को बनाए रखना भी आवश्यक है, क्योंकि यह केवल भोजन से नहीं बल्कि परिवार के स्वास्थ्य, संस्कार और आपसी जुड़ाव से भी जुड़ा हुआ है।
साथ ही आज के समय में यह भी समझने की जरूरत है कि जिन क्षेत्रों से हम दूर हो रहे हैं, वही क्षेत्र नए अवसरों का रूप भी ले सकते हैं। उदाहरण के तौर पर आज “क्लाउड किचन” जैसे मॉडल तेजी से उभरते हुए और लाभकारी व्यवसाय बन चुके हैं। इसलिए रसोईघर केवल एक पारिवारिक जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि महिलाओं के लिए उद्यमिता और आर्थिक सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण अवसर भी बन सकता है। ऐसे में आवश्यक है कि हम रसोईघर की गरिमा, पारंपरिक मूल्यों और आधुनिक अवसरों-तीनों के बीच संतुलन बनाए रखें।
सवाल: परिवार विघटन और एकांकी परिवार की बढ़ती प्रवृत्ति को लेकर आप क्या कहना चाहेंगी?
जवाब: आज के समय में परिवार विघटन और एकांकी परिवार की बढ़ती प्रवृत्ति एक ऐसी सामाजिक चुनौती बनती जा रही है, जो लगभग हर परिवार को किसी न किसी रूप में प्रभावित कर रही है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हम इस प्रवृत्ति को किस प्रकार संतुलित और नियंत्रित कर सकते हैं। इसके लिए परिवार के भीतर आपसी सहयोग, विश्वास और संवाद को मजबूत बनाना अत्यंत आवश्यक है।
परिवार को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए प्रत्येक सदस्य को एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए और उन्हें समझते हुए आगे बढ़ना चाहिए। अक्सर छोटी-छोटी बातों को लेकर मतभेद बढ़ जाते हैं, जबकि यदि हम उन्हें समय रहते नजरअंदाज कर दें या आपसी संवाद से सुलझा लें, तो कई समस्याओं से बचा जा सकता है।
मेरे विचार से संयुक्त परिवार भारतीय समाज की एक महत्वपूर्ण ताकत रहा है। संयुक्त परिवार में हमेशा कोई न कोई ऐसा होता है जो कठिन परिस्थितियों में मार्गदर्शन, संरक्षण और सहयोग प्रदान करता है तथा परिवार को संतुलित बनाए रखने में मदद करता है। इसके विपरीत, एकांकी परिवारों में कई बार ऐसे सहारे का अभाव महसूस होता है। इसलिए भारतीय संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए संयुक्त परिवार की भावना को संरक्षित और प्रोत्साहित करना आज के समय की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
सवाल: डिजिटल लाइफ को लेकर आप क्या कहेंगी?
जवाब: आज का समय डिजिटल युग का समय है, लेकिन इसके साथ एक गंभीर सामाजिक चुनौती भी सामने आ रही है। डिजिटल दुनिया ने जहां जीवन को सुविधाजनक बनाया है, वहीं यह धीरे-धीरे लोगों को वास्तविक दुनिया से दूर भी ले जा रही है। आज अक्सर देखा जाता है कि एक ही स्थान पर बैठे लोग आपस में संवाद करने के बजाय अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त रहते हैं।
यह स्थिति केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक जिम्मेदारियों पर भी पड़ रहा है। यदि समय रहते इस पर संतुलन नहीं बनाया गया, तो डिजिटल निर्भरता हमारे संबंधों और जीवनशैली को और अधिक प्रभावित कर सकती है।
मैंने कहीं पढ़ा था कि आज के समय में लोग प्रतिदिन औसतन चार से छह घंटे मोबाइल पर व्यतीत कर रहे हैं। यह वह समय है जो पहले परिवार, समाज और अन्य जिम्मेदारियों को दिया जाता था। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि हम डिजिटल माध्यमों का उपयोग संतुलित तरीके से करें और अपने वास्तविक संबंधों को भी उतना ही महत्व दें।
मुझे लगता है कि इस दिशा में महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। परिवार की केंद्रबिंदु होने के नाते महिलाएं ऐसा वातावरण बना सकती हैं, जहां परिवार के सदस्य डिजिटल दुनिया के साथ-साथ वास्तविक जीवन के संवाद, रिश्तों और सामूहिक समय को भी महत्व दें। यही संतुलन स्वस्थ और सशक्त परिवार की आधारशिला बन सकता है।
सवाल: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर आपके क्या विचार हैं?
जवाब: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने वास्तव में परिवर्तन के एक नए युग की शुरुआत कर दी है। इतिहास गवाह है कि जब भी कोई नई तकनीक या परिवर्तन आता है, तो वह अपने साथ नई संभावनाएं और कुछ चुनौतियां दोनों लेकर आता है। एआई भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।
मेरे विचार से मूल प्रश्न तकनीक का नहीं, बल्कि उसके उपयोग का है-हम उसका प्रयोग किस उद्देश्य और किस दृष्टिकोण से करते हैं। यदि एआई का उपयोग सकारात्मक और रचनात्मक कार्यों के लिए किया जाए, तो यह शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और प्रशासन जैसे अनेक क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है और मानव जीवन को अधिक सरल व प्रभावी बना सकता है।
हालांकि, हर नई तकनीक की तरह इसके साथ कुछ जोखिम और दुरुपयोग की संभावनाएं भी जुड़ी होती हैं। इसलिए यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसकी अच्छाइयों को अपनाएं और संभावित दुष्प्रभावों से बचने के लिए जागरूक रहें।
मेरा मानना है कि एआई का जिम्मेदारीपूर्ण और संतुलित उपयोग अत्यंत आवश्यक है। इसके साथ-साथ समाज और सरकार दोनों स्तरों पर ऐसे प्रभावी नियम और नीतियां बननी चाहिए, जो इसके दुरुपयोग को रोकें और इसे मानवता के हित में उपयोग करने की दिशा सुनिश्चित करें। यदि ऐसा किया गया, तो एआई आने वाले समय में विकास और नवाचार का एक अत्यंत शक्तिशाली माध्यम सिद्ध हो सकता है।
सवाल: युवतियों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
जवाब: आज की बेटियां ही कल की सशक्त महिलाएं हैं, इसलिए आने वाले समाज और राष्ट्र का भविष्य काफी हद तक उनके कंधों पर निर्भर करता है। वर्तमान समय तेजी से बदलती तकनीक और विशेष रूप से एआई के युग का है, ऐसे में युवतियों की जिम्मेदारियां पहले की तुलना में और अधिक बढ़ गई हैं।
मेरा मानना है कि आज की युवा पीढ़ी के सामने सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी अतीत की मूल्यवान परंपराओं और भविष्य की आधुनिक सोच के बीच संतुलन स्थापित करने की है। यदि युवतियां इन दोनों को सही तरीके से जोड़ पाती हैं, तो वे न केवल अपने जीवन को सफल बना सकती हैं, बल्कि एक सशक्त, संस्कारी और संतुलित समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
इसलिए मेरा संदेश यही है कि युवतियां शिक्षा, आत्मनिर्भरता और आधुनिक सोच के साथ-साथ अपने संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों को भी संजोकर रखें। जब आधुनिकता और परंपरा का यह संतुलन कायम रहता है, तभी एक मजबूत परिवार, सशक्त समाज और उज्ज्वल भविष्य का निर्माण संभव होता है।
“ओडिशा की सभी ‘लखपति दीदी’, किसी न किसी रूप में समाज का नेतृत्व कर रही नारी शक्ति को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर मेरी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। आप सभी ने अपने परिश्रम, आत्मविश्वास और संकल्प से यह सिद्ध कर दिया है कि जब महिलाएं आत्मनिर्भर बनती हैं तो वे न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे समाज की प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती हैं। आपकी सफलता हजारों महिलाओं के लिए प्रेरणा है और यह एक सशक्त, आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। मैं कामना करती हूं कि आपकी यह प्रेरणादायी यात्रा आगे भी नई ऊंचाइयों को छूती रहे।”
– अंजना भुरा
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