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1 मई के बजाय 17 सितंबर को राष्ट्रीय श्रम दिवस की मान्यता देने की मांग
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बादल महाराणा बोले—विश्वकर्मा जयंती श्रमिकों, कारीगरों और कौशल आधारित भारत के स्वाभिमान का प्रतीक
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राज्य के 25 जिलों और 15 उद्योगों में श्रम दिवस मना
भुवनेश्वर। भारतीय मजदूर संघ, ओडिशा ने विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर 17 सितंबर को राष्ट्रीय श्रम दिवस के रूप में मनाया। संगठन के प्रदेश अध्यक्ष बादल महाराणा ने ओडिशा के सभी कामकाजी भाई-बहनों को राष्ट्रीय श्रम दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि 17 सितंबर केवल विश्वकर्मा पूजा का दिन नहीं, बल्कि देश के करोड़ों श्रमिकों, कारीगरों, तकनीशियनों, इंजीनियरों और निर्माण से जुड़े लोगों के श्रम, कौशल, स्वाभिमान और संकल्प का प्रतीक है। राज्य के 25 जिलों और 15 उद्योगों में 1 मई के बजाय 17 सितंबर को श्रम दिवस मनाया गया।
भारतीय मजदूर संघ, ओडिशा के अध्यक्ष बादल महाराणा ने कहा कि भारतीय मजदूर संघ पिछले 74 वर्षों से 17 सितंबर, विश्वकर्मा जयंती को भारत के राष्ट्रीय श्रम दिवस के रूप में मान्यता देने की मांग करता रहा है। उनके अनुसार कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाने वाली विश्वकर्मा जयंती भारतीय संस्कृति और परंपरा में शिल्प, निर्माण और तकनीकी कौशल से जुड़े समाज के लिए विशेष महत्व रखती है।
उन्होंने कहा कि भारतीय मान्यता में भगवान विश्वकर्मा को आदि शिल्पी और प्रथम इंजीनियर माना जाता है। पौराणिक परंपराओं में द्वारिका, इंद्रप्रस्थ, स्वर्ण लंका, पुष्पक विमान और इंद्र के वज्र जैसे निर्माणों का संबंध भगवान विश्वकर्मा से जोड़ा गया है। इसी कारण देश के बढ़ई, लोहार, कुम्हार, बुनकर, मूर्तिकार, ठठेरे तथा विभिन्न प्रकार के कुशल कारीगर विश्वकर्मा को अपने आराध्य और आदर्श के रूप में देखते हैं।
विश्वकर्मा सेक्टर को मजबूत करने पर जोर
महाराणा ने कहा कि भारत में आत्मनिर्भरता की मजबूत परंपरा रही है। ओडिशा के प्राचीन नौ-वाणिज्य और समुद्री व्यापार का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ओडिशा के साधव व्यापारी बोइत लेकर जावा, सुमात्रा, बोर्नियो, बाली और श्रीलंका तक व्यापार करते थे। इन जहाजों के निर्माण से लेकर विभिन्न हस्तशिल्प और उत्पाद तैयार करने में स्थानीय कारीगरों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
उन्होंने कहा कि बढ़ई, कुम्हार, बुनकर, लोहार, ठठेरे और मिट्टी-पत्थर के शिल्पकार जैसे लाखों आत्मनिर्भर कारीगर देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। संगठन के अनुसार इस क्षेत्र के योगदान का समुचित आकलन और सरकारी योजनाओं का लाभ अभी व्यापक स्तर पर इन लोगों तक पहुंचाने की आवश्यकता है।
भारतीय मजदूर संघ ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को सफल बनाने के लिए पारंपरिक कौशल और आधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण को साथ लेकर चलना होगा। केवल डिग्री आधारित शिक्षा के बजाय युवाओं को व्यावहारिक कौशल और स्वरोजगार के अवसरों से जोड़ने की आवश्यकता है। संगठन ने सरकार से कुशल कारीगरों के लिए आधुनिक प्रशिक्षण, प्रोत्साहन और उनके उत्पादों के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध कराने की मांग की।
1 मई के बजाय 17 सितंबर को राष्ट्रीय श्रम दिवस बनाने की मांग
बादल महाराणा ने कहा कि वर्तमान में 1 मई को अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन भारतीय मजदूर संघ का मानना है कि भारतीय परंपरा और श्रम-संस्कृति के संदर्भ में 17 सितंबर को राष्ट्रीय श्रम दिवस के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि 17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंती के रूप में देश के विभिन्न हिस्सों में श्रमिक और कारीगर समुदाय लंबे समय से मनाता आ रहा है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार 15 सितंबर को भारत में इंजीनियर्स डे के रूप में सर एम. विश्वेश्वरैया की जयंती मनाई जाती है, उसी प्रकार श्रम, शिल्प और निर्माण के प्रतीक भगवान विश्वकर्मा की जयंती को राष्ट्रीय श्रम दिवस के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
भारतीय मजदूर संघ, ओडिशा ने कहा कि 17 सितंबर को राष्ट्रीय श्रम दिवस की सरकारी मान्यता मिलने से देश के पारंपरिक व्यवसायों, श्रम और कौशल को नई पहचान मिलेगी। संगठन ने केंद्र और ओडिशा सरकार से इस संबंध में विधिवत सरकारी मान्यता प्रदान करने की मांग की।
ओडिशा में रायगड़ा, नाल्को भुवनेश्वर, कलाहांडी, जाजपुर, दामनजोड़ी, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड कोरापुट, पारादीप पोर्ट, बड़ामाल आयुध कारखाना, हिंडाल्को हीराकुद, निखिल उत्कल विद्युत कर्मचारी संघ तथा आईआरई गंजाम सहित विभिन्न औद्योगिक और श्रमिक संगठनों से जुड़े श्रमिकों ने भी विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर श्रम और कौशल के सम्मान का संदेश दिया।
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