
तन्मय सिंह, राजगांगपुर
क्या अपनी ही पार्टी में वरिष्ठ नेता मंगला किसान की पकड़ ढीली पड़ने लगी है? यह सवाल इन दिनों चर्चा का विषय बन गया है. बीते लगभग 50 सालों से सक्रिय राजनीति से जुड़े रहे भूतपूर्व कैबिनेट मंत्री मंगला किसान के पिछले विधानसभा चुनाव हारने के बाद से ही पार्टी में उनकी पकड़ ढीली पड़ती दिख रही है. साल 1985 से लगातार चार बार राजगांगपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने जाने के बाद 2004 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. हालांकि इस दौरान तक किसान राज्यस्तरीय तथा कैबिनेट स्तर के कई विभागीय मंत्री के रुप में कार्यभार संभाल चुके थे. तब तक किसान ओडिशा की राजनीति के साथ-साथ राज्य के बीजू जनता दल संगठन में एक लड़ाकू अदिवासी नेता के रूप में अपनी एक मजबूत जगह बना चुके थे. सुन्दरगढ़ जिला एक अदिवासी बहुल ज़िला होने के नाते पार्टी में संतुलन कायम रखने हेतु बीजद मुखिया नबीन पटनायक ने उन्हें 2008 में राज्यसभा में सांसद बनाकर भेजा. फिर राज्यसभा सांसद का कार्यकाल समाप्त होने के बाद 2014 ओडिशा विधानसभा चुनाव में एकबार फिर से उम्मीदवार बनाये गये और भारी मतों से जीत भी हासिल की, लेकिन 2019 के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा.
वैसे भी जन कहावत है कि जब बुरा वक्त आता है, तो दोस्त भी मुँह मोड़ लेते हैं. किसान के साथ कुछ ऐसा ही हुआ. विधायकी हारने के बाद लंबे अरसे से आसीन संगठन के जिला अध्यक्ष पद भी गंवना पड़ा. हालही में जिला संगठन के विभिन्न पदों के लिए चुनाव हुआ था. आलम यह रहा कि सलाहकार समिति में भी मंगला किसान को जगह नसीब नहीं हुई. यह बात स्थानीय इलाके में चर्चा का विषय बन गयी है. हालांकि इस संदर्भ में जब मंगला किसान से संपर्क साधा गया, तो उन्होंने कुछ भी कहने से मना कर दिया.
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